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Kasturba Gandhi Death Anniversary 2021: कस्तूरबा गांधी की 77वीं पुण्य-तिथि (22 फरवरी) पर विशेष!

कस्तूरबा गांधीः एकआदर्श पत्नी, कर्तव्यनिष्ठ मां, ओजस्वी वक्ता, वीरांगना एवं रोल मॉडल शादी के बाद महात्मा गांधी के साथ आंदोलनों से जुड़ने के साथ ही कस्तूरबा गांधी 'बा' के नाम से लोकप्रिय होने लगी थीं.

Kasturba Gandhi Death Anniversary 2021: कस्तूरबा गांधी की 77वीं पुण्य-तिथि (22 फरवरी) पर विशेष!
कस्तूरबा गांधी (Photo Credits: Wikimedia Commons)
कस्तूरबा गांधीः एकआदर्श पत्नी, कर्तव्यनिष्ठ मां, ओजस्वी वक्ता, वीरांगना एवं रोल मॉडल शादी के बाद महात्मा गांधी के साथ आंदोलनों से जुड़ने के साथ ही कस्तूरबा गांधी 'बा' के नाम से लोकप्रिय होने लगी थीं. बा एक कर्तव्यनिष्ठ एवं आदर्श पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि पति के साथ विभिन्न आंदोलनों का हिस्सा बनने के साथ वे एक ओजस्वी वक्ता एवं वीरांगना के रूप में भी उभरीं.
गांधी जी जब भी जेल जाते, किसी आंदोलन का नेतृत्व करते, अथवा अनशन करते, बा हर कदम, हर पल उनके साथ रहती थीं. कई बार वह जेल इसलिए गईं क्योंकि गांधी जी जेल में थे, और वहां उन्होंने अनशन किया हुआ था. बा ने हर मोड़ पर जीवन संगिनी का रोल बखूबी निभाया. कहा जा सकता है कि बा सही मायने में महिलाओं की रोल मॉडल थीं. आइये जानते हैं कस्तूरबा गांधी के प्रेरक जीवन के बारे में... यह भी पढ़े: kasturba Gandhi Death Anniversary 2020: कस्तूरबा गांधी की 76वीं पुण्यतिथि पर जानें आखिर क्यों ‘बा’ के बिना अधूरी है ‘बापू’ की कहानी
जन्म एवं विवाह
 कस्तूरबा गांधी का जन्म 11 अप्रैल 1869 में पोरबंदर के कठियावाड़ी व्यवसायी गोकुलदास कपाड़ियां के यहां हुआ था. हांलाकि उनके शुरुआती जीवन के बारे में कम लोग ही जानते हैं. कहा जाता है गोकुलदास के एक मित्र के माध्यम से कस्तूरबा कपाड़िया का विवाह साल 1882 में मोहनदास करमचंद्र गांधी से मात्र 13 वर्ष की उम्र में हो गया था. उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी. उनकी शादी के संदर्भ में गांधी जी ने अपने एक संस्मरण में लिखा था कि उन दिनों हम शादी के अर्थ को नहीं समझते थे. हमारे लिए शादी का मतलब नए कपड़े, जेवर पहनना, मिठाई खाना और रिश्तेदारों के साथ खेलना भर होता था. लेकिन कुछ रश्में निभाने के बाद ही हम लोगों को शादी का अर्थ समझ में आया.

कस्तूरबा गांधीः एकआदर्श पत्नी, कर्तव्यनिष्ठ मां, ओजस्वी वक्ता, वीरांगना एवं रोल मॉडल
  शादी के बाद महात्मा गांधी के साथ आंदोलनों से जुड़ने के साथ ही कस्तूरबा गांधी 'बा' के नाम से लोकप्रिय होने लगी थीं. बा एक कर्तव्यनिष्ठ एवं आदर्श पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि पति के साथ विभिन्न आंदोलनों का हिस्सा बनने के साथ वे एक ओजस्वी वक्ता एवं वीरांगना के रूप में भी उभरीं. गांधी जी जब भी जेल जाते, किसी आंदोलन का नेतृत्व करते, अथवा अनशन करते, बा हर कदम, हर पल उनके साथ रहती थीं. कई बार वह जेल इसलिए गईं क्योंकि गांधी जी जेल में थे, और वहां उन्होंने अनशन किया हुआ था. बा ने हर मोड़ पर जीवन संगिनी का रोल बखूबी निभाया. कहा जा सकता है कि बा सही मायने में महिलाओं की रोल मॉडल थीं. आइये जानते हैं कस्तूरबा गांधी के प्रेरक जीवन के बारे में...
जन्म एवं विवाह
 कस्तूरबा गांधी का जन्म 11 अप्रैल 1869 में पोरबंदर के कठियावाड़ी व्यवसायी गोकुलदास कपाड़ियां के यहां हुआ था. हांलाकि उनके शुरुआती जीवन के बारे में कम लोग ही जानते हैं. कहा जाता है गोकुलदास के एक मित्र के माध्यम से कस्तूरबा कपाड़िया का विवाह साल 1882 में मोहनदास करमचंद्र गांधी से मात्र 13 वर्ष की उम्र में हो गया था. उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी. उनकी शादी के संदर्भ में गांधी जी ने अपने एक संस्मरण में लिखा था कि उन दिनों हम शादी के अर्थ को नहीं समझते थे. हमारे लिए शादी का मतलब नए कपड़े, जेवर पहनना, मिठाई खाना और रिश्तेदारों के साथ खेलना भर होता था. लेकिन कुछ रश्में निभाने के बाद ही हम लोगों को शादी का अर्थ समझ में आया.
प्रतिबंध और तानों के बाद पढ़ाई!
शादी के समय तक कस्तूरबा निरक्षर थीं. वस्तुतः उन दिनों लड़कियों को शिक्षा-दीक्षा का प्रचलन नहीं था. निरक्षर होने के कारण शादी के बाद कस्तूरबा को काफी संघर्ष करना पड़ा. स्वयं गांधी भी अकसर उन्हें अनपढ़ होने के ताने देते थे. कस्तूरबा का ज्यादा सजना-संवरना एवं घर से बाहर निकलन भी गांधी जी को पसंद नहीं था. शादी के शुरुआती दिनों में गांधी जी ने उन पर काफी अंकुश लगाने की भी कोशिश की. धीरे-धीरे गांधी जी को लगा कि कस्तूरबा को शिक्षित करना जरूरी है. तब उन्होंने स्वयं उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया. कस्तूरबा की ग्राह्य क्षमता अच्छी थी. शीघ्र ही उन्होंने हिंदी एवं गुजराती भाषा पर अच्छी पकड़ बना ली. धीरे-धीरे उन्होंने स्पीच देना भी शुरु किया. हांलाकि शादी की घरेलू जिम्मेदारियों के कारण उनकी विधिवत शिक्षा नहीं हो सकी. कस्तूरबा के चार पुत्र क्रमशः हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास पैदा हुए. हरिलाल जब पैदा हुए तब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका गये हुए थे, लिहाजा पुत्र की परवरिश अकेले कस्तूरबा गांधी ने निभाई.
कस्तूरबा ने परिस्थितियों को अपने तरीके से हैंडल किया  
अशिक्षित होने के बावजूद कस्तूरबा शुरु से ही स्वावलंबी एवं एक जिम्मेदार महिला थीं. उन्होंने गांधीजी के तानों-उलाहनों को कभी दिल पर नहीं लिया. क्योंकि वे जानती थीं कि गांधीजी का उठना-बैठना बुद्धिजीवियों के साथ होता था. गांधी जी कस्तूरबा का बाहर निकलना पसंद नहीं करते थे, लेकिन वे जहां इच्छा करती जरूर जातीं, और दुनिया को करीब से और अपने तरीके से समझने की कोशिश करती थीं.
पहली जेल यात्रा
गांधी जी जब वकालत की प्रैक्टिस के लिए दूसरी बार दक्षिण अफ्रीका गये तो अपने साथ कस्तूरबा को भी ले गये थे. उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में एक विचित्र कानून था, कि वहां चर्च में हुई शादियों को ही वैध करार दिया गया था. हिंदू एवं मुस्लिम विधि से की हुई शादियां अवैध मानी जाती थीं, इसके अलावा वहां भारतीय मजदूरों की स्थिति भी काफी चिंताजनक थी. गांधीजी और कस्तूरबा को  इस तरह के कानून और भारतीय मजदूरों पर हो रहा जुल्म पसंद नहीं आया. उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें तीन माह के लिए सश्रम जेल भेज दिया गया. जेल में भी कस्तूरबा को काफी डराया-धमकाया जाता रहा. लेकिन द्दढ़ निश्चय वाली कस्तूरबा को उनकी धमकी का कोई असर नहीं हुआ.
स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रियता 
गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलनों के नेतृत्व व अंग्रेजों के खिलाफ भाषणों ने कस्तूरबा गांधी को बहुत प्रभावित किया. क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत को उन्होंने भी हमेशा से विरोध किया था. इस तरह के आंदोलनों के दौरान जब-जब गांधी जी जेल गए कस्तूरबा ने पति की जगह लोगों के अंदर आजादी के प्रति प्रेरित करने का काम करती थीं, उनके भाषण को लोग बड़ी तन्मयता से सुनते और प्रभावित होते थे. क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के लिए कई बार कस्तूरबा को भी जेल जाना पड़ा.

गांधी जी को मानती थी अपना आदर्श:
कस्तूरबा की कर्तव्यनिष्ठा, पति परायणता और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों से गांधी जी काफी प्रभावित हो गये थे. दोनों के बीच के गहरे रिश्ते से जुड़ा एक प्रसंग आज भी बहुत लोकप्रिय है. दरअसल एक बार कस्तूरबा काफी बीमार पड़ीं तो डॉक्टर ने उनसे नमक नहीं खाने की अपील की, मगर कस्तूरबा को बिना नमक का खाना पसंद नहीं आ रहा था. एक बार जब गांधी जी ने उनसे नमक नहीं लेने की बात की तो कस्तूरबा ने ताना मारते हुए कहा कि एक बार बिना नमक का खाना खाकर दिखाओ तो समझूं. कहते हैं इस पर गांधी जी उनसे कहा कि अब मैं तभी नमक खाऊंगा, जब डॉक्टर तुम्हें नमक खाने को कहेगा. गांधी जी के इस तर्क से कस्तूरबा बहुत प्रभावित हुई थीं. इसके बाद उन्होंने नमकरहित भोजन लेना शुरु कर दिया.वे उन्हें अपना प्रेरणास्त्रोत मानती थीं.
मृत्यु
1942 में गांधी जी के 'भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान जब गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया था. उस दौरान कस्तूरबा गांधी ने मुंबई स्थित शिवाजी पार्क में खुद भाषण देने का फैसला लिया. दरअसल पहले वहीं पर गांधी जी भाषण देने वाले थे. लेकिन कस्तूरबा गांधी जैसे ही पार्क में पहुंचीं, पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. कहा जाता है कि इस गिरफ्तारी के बाद से ही कस्तूरबा बीमार रहने लगी थीं. उनका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता जा रहा था. साल 1944 के प्रारंभ में उन्हें दो बार दिल का दौरा भी पड़ा. अंततः 22 फरवरी 1944 को बा की मृत्यु हो गई.

(The above story first appeared on LatestLY on Feb 22, 2021 08:31 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).