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जंगल में अब जीवित न रह पाने वाली लुप्तप्राय प्रजातियों के जीन में बदलाव करना चाहिए?

दुनिया भर में, कई प्यारी प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है. एक गहन अनुमान के अनुसार, 2050 तक दुनिया की 40% प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं. चिंताजनक रूप से, इनमें से कई की संख्या में गिरावट ऐसे कारणों से आ रही है, जिनके कुछ ही समाधान उपलब्ध हैं.

जंगल में अब जीवित न रह पाने वाली लुप्तप्राय प्रजातियों के जीन में बदलाव करना चाहिए?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits : Pixabay)

मेलबर्न, 26 जनवरी : दुनिया भर में, कई प्यारी प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है. एक गहन अनुमान के अनुसार, 2050 तक दुनिया की 40% प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं. चिंताजनक रूप से, इनमें से कई की संख्या में गिरावट ऐसे कारणों से आ रही है, जिनके कुछ ही समाधान उपलब्ध हैं. कई प्रजातियां अब अपने अस्तित्व के लिए संरक्षण प्रजनन कार्यक्रमों पर निर्भर हैं. लेकिन ये कार्यक्रम आम तौर पर प्रजातियों को जलवायु परिवर्तन और बीमारी जैसे अचूक खतरों के साथ-साथ जंगल में अनुकूलन और जीवित रहने के लिए प्रभावी नहीं होते हैं. इसका मतलब है कि कुछ प्रजातियां अब जंगल में अपना अस्तित्व बचाए नहीं रह सकतीं, जो पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा प्रभाव डालती हैं. उदाहरण के लिए, विचार करें कि कोरल के बिना एक कोरल रीफ को अपने अस्तित्व के लिए कैसे संघर्ष करना पड़ेगा.

अगर कोई और रास्ता होता तो क्या होता? मैंने और मेरे सहयोगियों ने एक ऐसी विधि विकसित की है जिसका उद्देश्य लुप्तप्राय प्रजातियों को वे आनुवंशिक विशेषताएं देना है जिनकी उन्हें जंगल में जीवित रहने के लिए आवश्यकता है. सिद्धांत को व्यवहार में लाना पीढ़ियों से, प्राकृतिक चयन प्रजातियों को खतरों के अनुकूल होने में सक्षम बनाता है. लेकिन आज ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें, जिस तेजी से खतरे विकसित हो रहे हैं, वह प्रजातियों की अनुकूलन करने की क्षमता को पीछे छोड़ रहे हैं. यह समस्या विशेष रूप से वन्यजीवों में उभरती संक्रामक बीमारियों जैसे उभयचरों में चिट्रिडिओमाइकोसिस, और जलवायु-प्रभावित प्रजातियों जैसे कोरल में स्पष्ट रूप से नजर आती है. मेरे सहयोगियों और मेरे द्वारा विकसित टूलकिट को ‘‘लक्षित आनुवंशिक हस्तक्षेप’’ या टीजीआई कहा जाता है. यह आनुवंशिक विशेषताओं की घटना या आवृत्ति को बढ़ाकर काम करता है जो खतरे की उपस्थिति में किसी जीव की फिटनेस को प्रभावित करते हैं. हमने हाल के एक शोध पत्र में इस पद्धति की रूपरेखा तैयार की है.

टूलकिट में कृत्रिम चयन और सिंथेटिक जीव विज्ञान शामिल है. ये उपकरण कृषि और चिकित्सा में अच्छी तरह से स्थापित हैं लेकिन संरक्षण साधन के रूप में अपेक्षाकृत अप्रयुक्त हैं. हम उन्हें नीचे और अधिक विस्तार से समझाते हैं. हाल के दशकों में संरक्षण के क्षेत्र में हमारे टीजीआई टूलकिट में कई उपकरणों पर सिद्धांत रूप में चर्चा की गई है. लेकिन जीनोम अनुक्रमण और सिंथेटिक जीव विज्ञान में तेजी से विकास का मतलब है कि अब कुछ व्यवहार में संभव है. विकास ने उन विशेषताओं के आनुवंशिक आधार को समझना आसान बना दिया है जो एक प्रजाति को अनुकूलन करने और उनमें हेरफेर करने में सक्षम बनाती हैं.

कृत्रिम चयन क्या है?

मनुष्यों ने साहचर्य या भोजन के लिए तैयार किए गए जानवरों और पौधों में वांछनीय विशेषताओं को बढ़ावा देने के लिए लंबे समय से कृत्रिम (या फेनोटाइपिक) चयन का उपयोग किया है. इस आनुवंशिक परिवर्तन ने कुछ नयी प्रजातियों का विकास किया है, जैसे कि घरेलू कुत्ते और मक्का, जो अपने जंगली पूर्वजों से नाटकीय रूप से भिन्न हैं. पारंपरिक कृत्रिम चयन से ऐसे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं, जैसे उच्च अंतःप्रजनन दर, जो जीव के स्वास्थ्य और लचीलेपन को प्रभावित करते हैं और संरक्षण के लिए अवांछनीय हैं. यदि आपके पास कभी कुत्ते की शुद्ध प्रजाति रही है, तो आप इनमें से कुछ अनुवांशिक विकारों से अवगत हो सकते हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Jan 26, 2022 02:04 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).