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Independence Day 2023: 15 अगस्त 1947 की पूर्व संध्या की वह काली रात? जानें यह कालिमा कैसे बनी खुशनुमा?

15 अगस्त 1947 भारत के इस सुखद सवेरे को देखने की लालसा में हजारों क्रांतिकारियों ने शहादत दी, सरेआम फांसी पर लटकाया गया, कोड़े खाए, जेल में आम कैदियों से ज्यादा जुल्म सहे. आजादी की वह सुबह किसी भी भारतीय के लिए सर्वाधिक गौरवशाली दिन कहा जायेगा.

Independence Day 2023: 15 अगस्त 1947 की पूर्व संध्या की वह काली रात? जानें यह कालिमा कैसे बनी खुशनुमा?
Independence Day 2023

15 अगस्त 1947 भारत के इस सुखद सवेरे को देखने की लालसा में हजारों क्रांतिकारियों ने शहादत दी, सरेआम फांसी पर लटकाया गया, कोड़े खाए, जेल में आम कैदियों से ज्यादा जुल्म सहे. आजादी की वह सुबह किसी भी भारतीय के लिए सर्वाधिक गौरवशाली दिन कहा जायेगा. हर किसी की आंखें इस दिन को देखने के लिए तरस गई थीं, लेकिन क्या आप जानते हैं, इस सुखद सूर्योदय से पूर्व की उस काली रात को क्या-क्या हुआ? आइये जानते हैं, दुख-दर्द और भयावह भरी काली रात को भोगते हुए आजादी की खुशनुमा सुबह की मर्मस्पर्शी कहानी..

ब्रिटेन पीएम क्लीमेंट एटली ने दिया आजादी के संकेत

14 अगस्त 1947 को भारतीय इतिहास का सर्वाधिक काला दिन कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. इस दिन भारत की संस्कृति, समाज, इतिहास और भूगोल सबके टुकड़े हो गये. दरअसल अंग्रेजी हुकूमत की समाप्ति की गाथा 1947 के प्रारंभ से ही लिखनी शुरू हो गई थी. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली 03 जून 1947 को अपनी कॉलर बचाते हुए ऑल इंडिया रेडियो पर घोषणा की, -हमारी सरकार ने सदियों से बिखरे भारत को एक सूत्र में बांधा, हमें उम्मीद थी कि यह एकता भारत की आजादी के बाद भी बनी रहेगी. लेकिन कुछ हिंदुस्तानी नेताओं को यह मंजूर नहीं है. आज हमारे पास भारत के बंटवारा के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

बंटवारे का षड्यंत्र!

3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये अखंड भारत के विभाजन की घोषणा की. ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के नक्शे पर लकीर खींचने के लिए लंदन के वकील सिरिल रेडक्लिफ को भारत भेजा गया. सिरील इससे पूर्व न कभी भारत आये थे और ना ही यहां की संस्कृति एवं आबोहवा से परिचित थे. उन्हें अहसास नहीं होगा, कि उनका फैसला कितनों को बेघर और कितनों की जघन्य हत्या करने वाला साबित होगा. बटवारे के फैसले से लाखों लोग अपने मकान, दुकान संपत्ति से बेदखल होकर सड़क पर आ गये.

आजादी के जश्न में नहीं आये गांधीजी

अंग्रेजी हुकूमत द्वारा 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी की घोषणा के बाद नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गांधीजी को पत्र लिखा, -15 अगस्त हमारा पहला स्वतंत्रता दिवस होगा. आप बतौर राष्ट्रपिता इस समारोह में शामिल होकर हम सभी को आशीर्वाद दें. गांधीजी उस समय बंगाल के नोआखली सदर में हिंदू-मुस्लिम के बीच छिड़े हिंसा के खिलाफ अनशन पर बैठे थे. गांधी ने जवाब दिया, -जब कलकत्ता में हिंदू-मुस्लिम एक दूसरे की जान के प्यासे हो रहे हैं, ऐसे में किसी भी जश्न में शामिल होना मेरी अंतरात्मा को स्वीकार्य नहीं.

लाहौर में हिंदू-सिख इलाकों में वॉटर-सप्लाई बंद किया

14 अगस्त 1947 की शाम नेहरू अपने 17 यार्ड वाले आवास पर बेटी इंदिरा और पद्मजा नायडू के साथ बैठे थे, तभी लाहौर से फोन आया कि लाहौर के नये प्रशासन ने हिंदु-सिख बहुल इलाकों की पानी की सप्लाई रोक दिया है. जो औरतें या बच्चे पानी के लिए बाहर निकल रहे थे, उन्हें मार दिया जा रहा था. नेहरू ने इंदिरा को सारी सिचुएशन बताते हुए कहा, लाहौर जल रहा है, ऐसे में 15 अगस्त को भाषण देना क्या मुनासिब होगा?

मध्य रात्रि में संसद में आजादी की घोषणा

14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की पांचवीं बैठक रात साढ़े ग्यारह बजे शुरू हुई. संविधान सभा अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् गाया. राजेंद्र प्रसाद का अध्यक्षीय भाषण हुआ. डॉ राधाकृष्णन ने संविधान सभा के सामने आजादी का प्रस्ताव रखा. राजेंद्र प्रसाद ने प्रस्ताव रखा, कि वायसराय को सूचित किया जाए, कि भारत के संविधान सभा ने सत्ता संभाल ली है. रात 11.55 बजे संसद भवन में नेहरू ने भाषण दिया. जिसे ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (A Tryst with Destiny) के नाम से जाना जाता है. इसका आशय कि हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम उस वादे को पूरा करें. नेहरू के वक्तव्य के बाद सदस्य मेजें थपथपाकर खुशी जताने लगे. स्वागत एक नये भारत, एक नये राष्ट्र का था, जिसके सपने अब अपने होंगे,

गांधी की अनुपस्थिति में ‘महात्मा गांधी जिंदाबाद’ की गूंज!

भाषण पंडित जवाहर लाल नेहरू का चल रहा था, लेकिन ‘महात्मा गांधी जिंदाबाद’ से संसद का सेंट्रल हाल गूंज रहा था. इसके बाद अल्लामा मो. इकबाल का गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ और बंकिम चंद्र चटर्जी का लिखा ‘वंदे मातरम’ गाया गया, बाद में यह भारत का राष्ट्रगीत बना. नेहरू का भाषण समाप्त होते ही एंग्लो इंडियन नेता फ्रैंक एंटनी ने नेहरू को गले लगा लिया. इस समय संसद के बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन बारिश की परवाह नहीं करते हुए वह भीड़ नेहरू के मुख से वक्तव्य सुनने को बेचैन थी, जैसे पंडित नेहरू संसद से बाहर निकले, पूरी भीड़ ने उन्हें घेर लिया. चारों तरफ बस एक ही स्वर था ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’, ‘जय हिंद’. 200 सालों से गुलामी की जंजीर में जकड़ा भारत आज आजादी के पहले सूर्योदय में दमक रहा था.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 15, 2023 07:14 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).