क्यों छुपाया गया रंगीन मूर्तियों का सच
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जब तक प्राचीन मूर्तियों की खुदाई की गई तब तक उनमें से अधिकतर रंग उड़ चुके थे. इसलिए यह मान लिया गया कि वह हमेशा से बेरंग ही थीं. वहीं से शुरु हुआ ये मिथक.हाल ही में यह मिथक टूटा है कि प्राचीन ग्रीस और रोम की मूर्तियां सफेद हुआ करती थी. बल्कि अब पता चला है कि असल में उस दौर की मूर्तियां रंगीन और खुशबूदार थी. इसके सादा होने के धारणा समय के साथ ऐसी बनाई गई थी, ताकि नस्लवादी विचारों को बढ़ावा दिया जा सके.

प्राचीन ग्रीस और रोम की कला से संबंधित खोजें लगातार सामने आ रही हैं. मार्च में ऑक्सफोर्ड जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजी में प्रकाशित एक डेनिश अध्ययन में पाया गया कि प्राचीन काल की मूर्तियों पर इत्र लगाया जाता था. शोधकर्ताओं ने पुराने ग्रंथों का अध्ययन करते हुए यह पाया कि देवी-देवताओं की मूर्तियों पर इत्र और सुगंधित तेलों का उपयोग किया जाता था ताकि आसपास के लोगों को वे जीवंत महसूस हों.

रोमन लेखक सिसेरो, जिन्होंने ग्रीक देवी आर्टेमिस की मूर्ति के विशेष देख-रेख के बारे में लिखा था और ग्रीक कवि कॉलिमैकस, जिन्होंने मिस्र की रानी बेरेनाइस द्वितीय की मूर्ति का वर्णन किया था. इस संदर्भ में इनके लेखों का हवाला दिया गया.

शोध में डेलोस के तीर्थस्थान से मिले पुरातात्विक प्रमाणों का भी उल्लेख मिलता है. इसमें वहां खोजी गई इत्र बनाने वाली कार्यशालाओं और देवी-देवताओं की मूर्तियों पर इत्र और तेलों के उपयोग करने वाले अभिलेखों का भी जिक्र किया गया. शोध की लेखिका सेसिली ब्रॉन्स का मानना है कि प्राचीन काल में मूर्तियों को देखना केवल एक दार्शनिक अनुभव ही नहीं बल्कि एक सुगंधित अनुभव भी था. यह अध्ययन सालों से प्राचीन कला पर हो रही रिसर्च को भी समर्थन देता है. जिसमें यह पाया गया था कि प्राचीन ग्रीस और रोम की मूर्तियां सफेद नहीं, बल्कि रंगीन थी.

सफेद मूर्तियों का मिथक

प्राचीन समय में जब कोई ग्रीस के अफाया मंदिर की तरफ जाता था तो उसे जीवित प्रतीत होने वाली, सुंदर रंगों से सुसज्जित एक धनुर्धर की मूर्ति दिखाई देती थी. प्राचीन ग्रीक नाटककार यूरिपिड्स के 410 ईसा पूर्व में लिखे गए नाटक "हिप्सीपाइली" में मंदिर का उल्लेख मिलता है. जिसमें उन्होंने लिखा, "आकाश की ओर अपनी नजर उठाओ और मंदिर के शीर्ष पर बनी रंगीन नक्काशी देखो."

प्राचीन लेखों से यह स्पष्ट है कि ग्रीक मूर्तियां सफेद नहीं थी, बल्कि उन पर रंगों की परत चढ़ाई जाती थी. रोमन लेखक प्लिनी-द-एल्डर की किताब में यह उल्लेख देखे जा सकते हैं. आज भी कई लोगों को यह जानकर हैरानी होता है कि प्राचीन मूर्तियां रंगों से सुसज्जित हुआ करती थी. लेकिन कब और कैसे यह सफेद मूर्तियों का मिथक शुरू हुआ?

आर्कियोलॉजिस्ट विंसेंस ब्रिंकमान ने 2020 में डीडब्ल्यू को दिए एक इंटरव्यू में बताया, "सफेद संगमरमर की मूर्तियों की यह अजीब धारणा रेनेसां काल में बनी. जब कलाकारों ने मूर्तियों के आकार को रंगों से ज्यादा महत्व दिया. उन्होंने प्राचीन काल की मूर्तियों को देखा और सोचा यह बेरंग ही हैं और अपनी मूर्तियों को भी उनके अनुसार केवल संगमरमर से बनाया. इस तरह धीरे-धीरे यह मिथक बन गया."

रंगीन मूर्तियों का सच छुपाया गया

ब्रिंकमान ने बताया कि जब तक प्राचीन मूर्तियों की खुदाई की गई तब तक उनमें से अधिकतर रंग उड़ चुके थे. इसलिए यह मान लिया गया कि वह हमेशा से बेरंग ही थीं. लेकिन धीरे-धीरे जब इस बारे में अधिक जानकारियां सामने आई, तो समाज की धारणाओं को बनाये रखने के लिए जानबूझकर सच दबा दिया गया.

ब्रिंकमान के अनुसार, 1503 में रोम में मिली प्रसिद्ध मूर्ति ‘लाओकून और उनके पुत्रों' को देखा जाए तो इस पर रंगों के निशान थे, लेकिन उन्हें जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया क्यूंकि रंगों को अक्सर "बर्बर" जातियों से जोड़कर देखा जाता है.

ब्रिंकमान और उनकी पत्नी, आर्कियोलॉजिस्ट उलरिके कोख-ब्रिंकमान ने "गॉड्स इन कलर" नामक प्रदर्शनी बनाई जो 2003 से लेकर 2023 तक दुनिया भर में देखी गई. इसमें 100 से भी ज्यादा मूर्तियों की नकल थी, जिन्हें गहरे रंगों से रंगा गया था. यह रंग इस आधार पर चुने गए थे कि मूर्तियां प्राचीन काल में कैसी दिखती रही होंगी. आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके मूर्तियों पर रंगों के निशान खोजे गए थे.

18वीं शताब्दी के यूरोप में "एन्लाइटनमेंट" काल के दौरान, सफेद संगमरमर की मूर्तियों को "शुद्धता" और "स्पष्टता" का प्रतीक माना गया था. इसके अलावा, बेरंग मूर्तियां कम संवेदनशील लगती थीं और वह उस समय के ओटोमन साम्राज्य की प्रतीक रंगीन कलाकृतियों से भी अलग दिखती थीं.

परिणामस्वरूप 18वीं और 19वीं शताब्दी में जब खुदाई के दौरान रंगों के निशान वाली प्राचीन मूर्तियां मिलीं तो वैज्ञानिकों ने तो अपने रिकॉर्ड में इसको दर्ज कर लिया लेकिन आम लोगों तक यह जानकारी नहीं पहुंच पाई.

कला को विचारधारा से जोड़ना

18वीं शताब्दी के जर्मन इतिहासकार और आर्कियोलॉजिस्ट योहान विंकलमान को कला इतिहास का जनक भी कहा जाता है. सफेद मूर्तियों की इस गलत धारणा को फैलाने में उनका भी योगदान था. "द न्यू यॉर्कर" पत्रिका के एक लेख के अनुसार, उनका कहना था, "शरीर जितना ज्यादा सफेद है, उतना ज्यादा सुंदर है." और "रंग सुंदरता में योगदान देता है, लेकिन रंग ही सुंदरता नहीं है."

विंकलमान, एन्लाइटनमेंट युग के विचारक थे. यह विज्ञान-आधारित युग था, जिसने आधुनिक नस्लवाद को भी जन्म दिया था. सफेद मूर्तियों को भी उन विचारों से जोड़ा गया, जिससे सफेद रंग को श्रेष्ठ मानने की धारणा और मजबूत हुई.

इंसानों ने कान छिदवाना कब से शुरु किया

एथेंस के एक्रोपोलिस संग्रहालय के निदेशक निकोस स्टैम्पोलिडिस ने डीडब्ल्यू को बताया, "ऐतिहासिक रूप से, समाज अपनी विचारधारा के अनुसार ही दुनिया को देखता है." उन्होंने समझाया कि जब पुरानी मूर्तियों की खुदाई हुई, तब तक उनके रंग मिट चुके थे. उस समय के लोग संगमरमर की सफेदी को सरलता और सुंदरता का प्रतीक मानते थे. यह धारणा उनकी सोच से मेल खाती थी कि सफेद रंग श्रेष्ठता का प्रतीक है.

18वीं शताब्दी में पोम्पेई की खुदाई से यह साफ हो जाना चाहिए था कि प्राचीन काल में मूर्तियों को रंगना एक आम प्रथा थी. पोम्पेई शहर 79 ईस्वी में ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से नष्ट हो गया था. इस वजह से वहां की कई मूर्तियां सुरक्षित बच गई, जिनमें से कुछ पर रंग भी मौजूद थे. जैसे कि ग्रीक देवी आर्टेमिस की एक मूर्ति पर भी रंग के निशान मिले थे. लेकिन "गॉड्स इन कलर" वेबसाइट की जानकारी के अनुसार, "अनुचित शोध विधियां और प्राचीन ग्रंथों की अलग-अलग व्याख्या इस बात को लेकर संदेह पैदा करती हैं कि मूर्तियों को सच में रंगा गया था या नहीं."

75,000 साल पहले निएंडरथाल महिला ऐसी दिखती थी

इसका सबसे अच्छा उदाहरण एथेंस के एक्रोपोलिस संग्रहालय में रखी "पेपलोस कोरे” नामक मूर्ति है. जो 530 ईसा पूर्व की है और ग्रीस के पारोस द्वीप के संगमरमर से बनी है. यह एक युवा महिला की मूर्ति थी और इसके बालों में नारंगी रंग के निशान मिले थे. आर्कियोलॉजिस्टों ने रंग के निशान देखे और उनका दस्तावेजीकरण किया. लेकिन जल्द ही उन्होंने सफेद प्लास्टर से मूर्ति के प्रतिरूप को बनाया और उसे वर्ल्ड फेयर में भेज दिया. इससे प्राचीन ग्रीक मूर्तियों के सफेद होने की धारणा और मजबूत हो गई.

हिटलर और सफेद मूर्तियां

20वीं शताब्दी में, फासीवाद ने प्राचीन श्वेत मूर्तियों को श्वेत वर्चस्वता के प्रतीक के रूप में अपनाया. बेनिटो मुसोलिनी और अडोल्फ हिटलर प्राचीन ग्रीस और रोम की कला और वास्तुकला की बहुत प्रशंसा करते थे. सफेद रंग की मूर्तियां नस्लीय श्रेष्ठता के विचार को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल की गई. नाजी लोगों के लिए इसका मतलब था कि काल्पनिक आर्य जाति की छवि, जिसको वह ग्रीक मूर्तियों से जोड़ते थे.

हालांकि प्राचीन ग्रीक मूर्तियों में कई तरह के रंग अलग-अलग सांस्कृतिक और सामाजिक विचारों से जुड़े हो सकते है. एथेंस के 'एक्रोपोलिस म्यूजियम' ने अपनी प्रदर्शनी "आर्काइक कलर्स" में इसी विचार पर काम किया है.

म्यूजियम के अनुसार, "ग्रीक देवताओं, योद्धाओं और खिलाड़ियों के सुनहरे बाल, ताकत का संकेत माने जाते थे. दूसरी ओर ग्रे त्वचा बहादुरी और हिम्मत का प्रतीक थी और युवा लड़कियों की सफेद त्वचा उनके तेज और निखार को दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाती थी.”

प्राचीन ग्रीक कला में रंगों का इस्तेमाल महिलाओं और पुरुषों में फर्क दिखाने के लिए भी किया जाता था. पुरुषों की त्वचा गहरे रंग की होती थी क्योंकि वह ज्यादातर बाहर काम करते थे, जबकि महिलाओं की त्वचा सफेद रंग की होती थी क्योंकि वह घर के अंदर, धूप से दूर रहती थी.