पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे पर बाहरी मदद की गुहार लगाई है. शुक्रवार को पाकिस्तान ने खुलकर कहा कि अगर अमेरिका या कोई भी दूसरा देश कश्मीर विवाद को सुलझाने में मदद करता है तो वह इसका स्वागत करेगा. यह बयान पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता शफकत अली खान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया.
पाकिस्तान क्यों चाहता है बाहरी मदद?
जब पाकिस्तानी प्रवक्ता से कश्मीर मामले में अमेरिका की दिलचस्पी के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, "हम न केवल अमेरिका, बल्कि किसी भी ऐसे देश की मदद का स्वागत करते हैं जो इस विवाद को हल करने और स्थिति को स्थिर करने में मदद कर सके." उन्होंने जोर देकर कहा कि यह विवाद दक्षिण एशिया में शांति और सुरक्षा के लिए एक बड़ा मुद्दा है.
प्रवक्ता ने यह भी स्वीकार किया कि मई में हुए संघर्ष के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई सीधी बातचीत नहीं हुई है. उन्होंने कहा, "हम कूटनीति का रास्ता अपनाना चाहते हैं, लेकिन भारत को भी इसके लिए मन बनाना होगा."
भारत का दो टूक जवाब: किसी तीसरे की जरूरत नहीं
दूसरी तरफ, भारत का रुख इस मामले पर दशकों से बिल्कुल साफ और अटल है. भारत का मानना है कि कश्मीर का मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय मामला है, यानी इसे दोनों देश ही मिलकर सुलझाएंगे. भारत किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या दखलअंदाजी को स्वीकार नहीं करता है.
यह बात 1972 में हुए ऐतिहासिक शिमला समझौते में भी साफ तौर पर लिखी गई है, जिस पर भारत और पाकिस्तान दोनों ने हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत दोनों देश अपने सभी विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाने के लिए सहमत हुए थे.
भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि पाकिस्तान के साथ भविष्य में कोई बातचीत होती है, तो उसका मुख्य एजेंडा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की वापसी और पाकिस्तान द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद को रोकना होगा.
संक्षेप में कहें तो, जहां एक ओर पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश कर रहा है, वहीं भारत अपने पुराने और स्पष्ट रुख पर मजबूती से कायम है कि यह मामला सिर्फ और सिर्फ दोनों देशों के बीच का है.













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