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6 जनवरी को 100 साल की हुई जर्मन कंपनी लुफ्थांसा

जर्मन विमानन कंपनी लुफ्थांसा ने कहा है कि वह अपनी ‘100वीं वर्षगांठ का इस्तेमाल नाजी काल के दौरान अपनी जिम्मेदारी की गंभीरता से जांच करने और ऐतिहासिक शोध के आधार पर इसकी और गहराई से पड़ताल करने के मौके के रूप में करेगी.

6 जनवरी को 100 साल की हुई जर्मन कंपनी लुफ्थांसा
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मन विमानन कंपनी लुफ्थांसा ने कहा है कि वह अपनी ‘100वीं वर्षगांठ का इस्तेमाल नाजी काल के दौरान अपनी जिम्मेदारी की गंभीरता से जांच करने और ऐतिहासिक शोध के आधार पर इसकी और गहराई से पड़ताल करने के मौके के रूप में करेगी.'जर्मनी की मुख्य एयरलाइन लुफ्थांसा को लगभग सौ साल पुराने अपने इतिहास और विरासत पर बहुत गर्व है. कंपनी अपनी मार्केटिंग में 1920 और 1930 के दशक की तस्वीरों का खूब इस्तेमाल करती है, जिनमें ‘लुफ्तवाफे' द्वारा इस्तेमाल किए गए जुंकर्स जू 52 विमान भी शामिल हैं. इन तस्वीरों के जरिए कंपनी खुद को विमानन जगत की एक ‘अग्रणी' और ऐतिहासिक ब्रैंड के रूप में पेश करती है.

हालांकि, ‘थर्ड राइष' (नाजी शासन) के समय युद्ध की तैयारियों में लुफ्थांसा की क्या भूमिका थी, यह कहानी आज भी दुनिया की नजरों से काफी हद तक छिपी हुई है. इसमें बड़े पैमाने पर जबरन मजदूरी भी शामिल है. पत्रकार डेविड डी जोंग के मुताबिक, लुफ्थांसा उन कई बड़ी कंपनियों और व्यापारिक घरानों में से एक है जिन्होंने नाजी शासन का साथ दिया था. ये आज भी सबके सामने होकर भी अपना ‘सच छिपाए बैठे' हैं.

डेविड डी जोंग की एक किताब ‘नाजी बिलियनेयर्स: द डार्क हिस्ट्री ऑफ जर्मनीज वेल्दिएस्ट डायनेस्टीज' 2022 में प्रकाशित हुई थी. यह किताब बताती है कि कैसे न्यूरेमबर्ग मुकदमे में सजा पाने वाले बड़े नाजी नेताओं और सेना के अफसरों के उलट, उन ज्यादातर कारोबारियों को कभी जवाबदेह नहीं ठहराया गया और सजा नहीं मिली जिन्होंने एडोल्फ हिटलर के शासन का साथ दिया था.

जर्मन एयरलांइस लुफ्थांसा की सबसे लंबी उड़ान

इस किताब में गुंथर क्वांट और उनके बेटे हर्बर्ट का जिक्र है, जिनके परिवार का आज भी बीएमडब्ल्यू कंपनी पर नियंत्रण है. साथ ही इसमें उद्योगपति फ्रीडरिष फ्लिक के बारे में भी बताया गया है, जिन्हें न्यूरेमबर्ग मुकदमे में मजबूर और गुलाम मजदूरों का इस्तेमाल करने का दोषी पाया गया था. लेकिन 1950 में जेल से जल्दी रिहा होने के बाद फ्लिक, डाइमलर-बेंज के सबसे बड़े शेयरहोल्डर बन गए.

डी जोंग ने डीडब्ल्यू को बताया, "पश्चिम जर्मनी के अधिकारियों के पास अपने ही देश के उन लोगों को सजा देने की कोई ठोस वजह नहीं थी, जिन्होंने या तो खुद अपराध किए थे, उनकी जिम्मेदारी ली थी, या फिर वे नाजी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखते थे. जर्मनी के समाज के हर स्तर पर देखा जाए तो ‘डी-नाजीफिकेशन' (नाजीवाद को खत्म करना) सिर्फ एक दिखावा या मिथक ही रहा है.”

माफी कानून से समाज में फिर से शामिल हुए पूर्व नाजी

जर्मनी की हार के बाद, दुनिया का ध्यान बहुत तेजी से शुरू हो रहे शीत युद्ध की ओर मुड़ गया, जिसका मकसद कम्युनिज्म और सोवियत रूस से लड़ना था. पश्चिम जर्मनी को पूंजीवाद के एक मजबूत किले के रूप में देखा गया. इसी वजह से जर्मन व्यापारियों को अपनी संपत्तियां अपने पास रखने की अनुमति दे दी गई. फिर चाहे वे संपत्तियां जायज तरीके से उनकी हों या उन्हें यहूदी व्यापारियों से जबरन छीना गया हो.

इतिहासकार पेटर हेज कहते हैं कि यह सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं था. वे बताते हैं कि कैसे युद्ध के बाद पश्चिम जर्मनी के पहले चांसलर कोनराड आडेनावर ने नाजीकरण खत्म करने की कार्यवाही को रोकने की मांग की थी. आडेनावर का तर्क था कि देश को अनुभवी सरकारी अफसरों और पेशेवरों की जरूरत है. 1950 के दशक की शुरुआत में उनकी सरकार ने माफी के कानून बनाए, जिससे हजारों पूर्व नाजियों को फिर से समाज, सरकारी सेवाओं और न्यायपालिका में शामिल कर लिया गया.

हेज ने डीडब्ल्यू को बताया, "उन्हें बहुत कम सजा मिली, क्योंकि यह मित्र देशों और खुद जर्मन लोगों के हित में था. पश्चिम जर्मनों ने जानबूझकर इतिहास को भुला देना ही बेहतर समझा. यह नाजीवाद को अलग-थलग करने का एक तरीका था. यानी यह कहना कि सारी बुराइयां तो बस मुट्ठी भर कट्टरपंथियों ने की थीं. बाकी हम लोग तो बस उनके बहकावे में आ गए थे. हमसे झूठ बोला गया था. असली अपराधी तो केवल एसएस के लोग और पार्टी के बड़े नेता थे.

हेज ने 2025 में प्रकाशित अपनी किताब ‘प्रॉफिट्स एंड पर्सीक्यूशन: जर्मन बिग बिजनेस इन द नाजी इकॉनमी एंड द होलोकॉस्ट' में लिखा है कि कैसे नामी कंपनियां उस दौर के भयानक अपराधों में शामिल थीं. इसमें ‘आईजी फारबेन' द्वारा ‘जायक्लोन बी' गैस की सप्लाई शामिल है. यह वही गैस है जिसका इस्तेमाल गैस चैंबरों में लोगों को मारने के लिए किया गया था. आज बीएएसएफ और बायर जैसी कंपनियां इसी की उत्तराधिकारी यानी अगली पीढ़ी की कंपनियां हैं. यहां तक कि यातना शिविरों में मारे गए लोगों के मुंह से जबरदस्ती निकाले गए सोने के दांतों को गलाकर इस्तेमाल करने जैसे घिनौने काम भी किए गए. उन्होंने कहा, "वे न सिर्फ जानते थे कि वे किस चीज में हिस्सा ले रहे हैं, बल्कि वे उससे पैसे कमाने की भी कोशिश कर रहे थे.”

नाजी रीआर्मामेंट का मोहरा कैसे बनी लुफ्थांसा

डॉयचे लुफ्ट हंसा (जिसे 1933 से लुफ्थांसा कहा जाने लगा) की शुरुआत 1926 में हुई थी. उस समय सिर्फ कुछ अमीर लोग ही हवाई सफर का खर्च उठा सकते थे. 1930 के दशक की शुरुआत तक यह कंपनी बंद होने की कगार पर थी. जर्मन विमानन इतिहास के विशेषज्ञ लुत्स बुडरास के मुताबिक, नाजियों ने ‘लुफ्थांसा को बचा लिया'. सन 1933 में, हरमन गोएरिंग ने लुफ्थांसा के निदेशक एरहार्ड मिल्ष को नवगठित ‘राइष विमानन मंत्रालय' का स्टेट सेक्रेटरी नियुक्त कर दिया.

प्रथम विश्व युद्ध को खत्म करने वाली ‘वर्साय की संधि' के तहत जर्मनी पर वायुसेना रखने की पाबंदी थी. लेकिन इतिहासकार बुडरास बताते हैं कि चूंकि नागरिक उड्डयन (सिविल एविएशन) पर बहुत कम रोक-टोक थी. इसलिए लुफ्थांसा, नेशनल सोशलिस्ट रीआर्मामेंट के लिए एक मोर्चा बन गया.

1941 के बाद लुफ्थांसा ने फ्रंटलाइन के पीछे से विमानों की मरम्मत करने वाली वर्कशॉप में बड़ी भूमिका निभाई. दूसरी कंपनियों के मुकाबले, लुफ्थांसा सीधे तौर पर मजबूर मजदूरों को काम के लिए ला पाई. इनमें वे बहुत से बच्चे भी शामिल थे जिन्हें पूरे यूरोप के नाजी कब्जे वाले इलाकों से अगवा करके लाया गया था.

नई कंपनी, पुराने लोग और लोगो

जब दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ, तो मित्र देशों ने इस एयरलाइन को जर्मन वायुसेना का ही हिस्सा घोषित कर दिया और 1951 में कंपनी को पूरी तरह बंद कर दिया. आज की ‘डॉयचे लुफ्थांसा', जो कमाई के मामले में दुनिया की चौथी सबसे बड़ी एयरलाइन है, उसकी शुरुआत 1953 में ‘लुफ्टाग' के नाम से हुई थी. बाद में 1954 में इस नई कंपनी ने पुराने ‘लुफ्थांसा' नाम और उसके मशहूर क्रेन वाले लोगो के अधिकार खरीद लिए.

हालांकि, सिर्फ नाम और लोगो ही पुराने नहीं थे, बल्कि मैनेजमेंट बोर्ड में भी वही पुराने लोग लौट आए थे. इनमें कुर्ट वाईगेल्ट भी शामिल थे, जो नाजी पार्टी (एनएसडीएपी) के औपनिवेशिक नीति कार्यालय के आर्थिक विभाग के प्रमुख थे. युद्ध के बाद, उन्हें वांछित युद्ध अपराधियों की सूची में रखा गया था और दो साल की जेल व जुर्माने की सजा भी दी गई थी. पर 1953 तक, वही वाईगेल्ट लुफ्थांसा के सुपरवाइजरी बोर्ड के चेयरमैन बन गए और रिटायर होने पर उन्हें कंपनी का इकलौता ‘मानद बोर्ड सदस्य' बनाया गया.

1990 के दशक के आखिर में, लुफ्थांसा ने खुद बुडरास को ही यह रिसर्च करने के लिए काम पर रखा था कि नाजी दौर में कंपनी ने कैसे मजबूर मजदूरों का इस्तेमाल किया. बुडरास ने 2001 में अपनी स्टडी पूरी कर ली, लेकिन लुफ्थांसा ने उसे 2016 तक दबाए रखा. जब इसे छापा भी, तो कंपनी के चमचमाते इतिहास वाली किताब के पीछे एक छोटे से हिस्से के तौर पर. इसके जवाब में, लुफ्थांसा की मर्जी के खिलाफ, बुडरास ने 2016 में खुद अपनी 700 पन्नों की किताब छापी, जिसका नाम था ‘द ईगल एंड द क्रेन: द हिस्ट्री ऑफ लुफ्थांसा 1926-1955'.

डीडब्ल्यू को दिए एक बयान में, लुफ्थांसा ने जोर देकर कहा कि वह 1926 में बनी कंपनी की कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है. कंपनी ने लिखा कि 'आज की लुफ्थांसा की कानूनी नींव 1953 में रखी गई थी.'

हालांकि, लुफ्थांसा ने यह बात मानी है कि नाजी दौर उसके इतिहास का एक हिस्सा है. कंपनी ने कहा कि वह अपनी ‘100वीं वर्षगांठ का उपयोग नाजी काल के दौरान अपनी जिम्मेदारी की गंभीरता से जांच करने और ऐतिहासिक शोध के आधार पर इसकी ज्यादा गहराई से पड़ताल करने के एक अवसर के रूप में करेगी.'

जबरन मजदूरी के पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हुई

थर्ड राइष के दौरान लुफ्थांसा की भूमिका का मुद्दा 1990 के दशक में फिर से गरमा गया. उस समय अमेरिका में पूर्व मजबूर मजदूरों ने जर्मन कंपनियों के खिलाफ एक के बाद एक कई मुकदमे दायर किए. इन मुकदमों की वजह से यह पूरा मामला आम जनता और दुनिया की नजरों में आ गया.

आखिरकार, जर्मन सरकार और दिग्गज कंपनियों, जैसे कि लुफ्थांसा, क्यूने + नागेल और फॉक्सवागन को अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकना पड़ा. साल 2000 में, उन्होंने ‘फाउंडेशन फॉर रिमेंबरेंस, रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड फ्यूचर (स्टिफ्टुंग ईवीजेड)' नाम का एक फाउंडेशन बनाया, ताकि मजबूर मजदूरों को मुआवजा दिया जा सके.

चूंकि, जर्मन राइष और उसके कब्जे वाले इलाकों में 2 करोड़ से ज्यादा पूर्व जबरन मजदूरों में से ज्यादातर तब तक मर चुके थे. इसलिए, सिर्फ 17 लाख लोगों को ही ईवीजेड से आर्थिक मदद मिली.

अब जर्मनी की बड़ी कंपनियों के लिए यह लगभग आम बात बन गई है कि वे इतिहासकारों को काम पर रखकर नाजी शासन के दौरान अपने कामकाज की जांच कराती हैं. आलियांज, बीएमडब्ल्यू, डॉ. ओटकर , डॉयचे बैंक और फॉक्सवागन इन सभी ने ऐसा किया है.

कड़वे सच नहीं आते सामने

हालांकि, डी जोंग कहते हैं कि इन शोध के नतीजे अक्सर कंपनी के आर्काइव्स में धूल फांकने के लिए छोड़ दिए जाते हैं. कई बार तो इन्हें कभी सार्वजनिक किया ही नहीं जाता. वे कहते हैं, "ग्राहकों को दिखाने के लिए आप कह सकते हैं कि हमने सब कुछ पता लगा लिया है. देखिए किताब अलमारी में रखी है. लेकिन उसके कड़वे सच कभी भी असलियत में जनता के सामने नहीं लाए जाते.”

डी जोंग के मुताबिक, जर्मनी के सबसे अमीर व्यक्ति क्लाउस-मिषाएल क्यूने इस काले इतिहास का ‘सामना करने से इनकार' करने का सबसे बड़ा उदाहरण हैं. लगभग 38.7 बिलियन यूरो की संपत्ति के मालिक क्यूने, ग्लोबल ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स एम्पायर ‘क्यूने + नागेल' के वारिस हैं. वे इत्तफाक से लुफ्थांसा के सबसे बड़े सिंगल शेयरहोल्डर यानी सबसे ज्यादा शेयर रखने वाले व्यक्ति भी हैं.

क्यूने + नागेल की सह-स्थापना उनके दादा ऑगस्ट क्यूने ने 1890 में की थी. इसे 1933 तक उनके परिवार और एक यहूदी पार्टनर एडोल्फ मास ने चलाया. इसके बाद, ऑगस्ट के दोनों बेटे, जो नाजी पार्टी के सदस्य थे, ने कंपनी पर अधिकार जमा लिया.

होलोकॉस्ट के रिसर्चर बताते हैं कि यहूदियों से लूटी गई संपत्ति, जैसे फर्नीचर और कीमती पेंटिंग्स को ढोने का इस कंपनी के पास एकाधिकार था. इससे उसने होलोकॉस्ट के दौरान काफी मुनाफा कमाया. मास की 1944 में आउशवित्स में हत्या कर दी गई थी.

क्लाउस-मिषाएल क्यूने को इन मामलों पर बात करना पसंद नहीं है. उन्होंने मार्च 2025 में ‘डेय श्पीगल' पत्रिका को बताया, "मेरे लिए वह चैप्टर बंद हो गया है और मैं इसे दोबारा नहीं खोलूंगा.” यह विवाद तब और भड़क गया जब यह पता चला कि क्यूने, हैम्बर्ग में एक नए ओपेरा हाउस के लिए पैसा दे रहे हैं. इसके बाद उन पर आरोप लगने लगे कि वे अपनी कंपनी के काले इतिहास को ‘छिपाने' की कोशिश कर रहे हैं.

डी जोंग कहते हैं, "जिन व्यापारियों के बारे में मैंने लिखा है, वे उन संपत्तियों और कंपनियों को अपने पास रखने के लिए जी-जान से लड़े जिन्हें उन्होंने लूटा था. अक्सर वे कामयाब भी हुए. मुझे लगता है कि आज के समय में कम से कम इतनी मांग तो की ही जा सकती है कि वे बस अपने इतिहास की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करें. यह मांग अब पैसों के मुआवजे की नहीं है.”

(The above story first appeared on LatestLY on Jan 07, 2026 12:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).