ट्रंप ने पहले-पहले जब ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी, तब इसे मजाक समझा गया. अब साफ है कि ट्रंप मजाक नहीं कर रहे थे. ट्रंप सरकार ताकत के दम पर या कीमत देकर ग्रीनलैंड हासिल करने पर अड़ी है.ग्रीनलैंड पाने की ट्रंप की जिद, दबाव बनाने के तमाम तरीके आजमा रही है. ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका में मिलाना, बकौल ट्रंप प्रशासन उसकी "विदेश नीति के अहम मकसदों" में से एक है.
अमेरिका, ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए क्या कदम उठाएगा इसपर मिले-जुले संकेत आ रहे हैं. एक तरफ तो जोर आजमाइश ना करने का आश्वासन दिया जा रहा है और साथ-साथ दो वैकल्पिक तरीकों का भी संकेत प्रमुखता से दिया जा रहा है: सैन्य शक्ति का इस्तेमाल और खरीद का रास्ता.
जोर आजमाइश पर ट्रंप प्रशासन की हां भी, ना भी
ट्रंप सरकार सैन्य कार्रवाई की संभावना से इंकार नहीं कर रहा है. बयानों की शृंखला में ताजा बयान व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलाइन लैवेट ने दिया है. 6 जनवरी को उन्होंने बताया कि ट्रंप की टीम "विदेश नीति के इस महत्वपूर्ण लक्ष्य को पूरा करने के लिए कई तरह के विकल्पों पर चर्चा कर रही है. और बेशक, कमांडर इन चीफ के निर्देश पर यूएस की सेना का इस्तेमाल हमेशा ही एक विकल्प है."
ट्रंप बोले, अमेरिका लेने जा रहा ग्रीनलैंड
एक ओर लैवेट का यह बयान है, तो वहीं खबरों में छप रहा विदेश मंत्री मार्को रुबियो का यह आश्वासन भी है कि अमेरिका सैन्य हमला नहीं करेगा. अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पर्दे के पीछे दी गई ब्रीफिंग में रुबियो ने सांसदों को बताया कि हालिया बयानों का यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि अमेरिका हमले का संकेत दे रहा है. विदेश मंत्री रुबियो, ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं.
'न्यू यॉर्क टाइम्स' और 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' इन दोनों अमेरिकी अखबारों ने सूत्रों के हवाले से बताया कि ट्रंप प्रशासन का मकसद ग्रीनलैंड को डेनमार्क से खरीदना है. इसी क्रम में, हालिया चेतावनियों का मकसद डेनमार्क पर दबाव बनाकर उसे बिक्री की बातचीत के लिए तैयार करना है. 'न्यू यॉर्क टाइम्स' ने अधिकारियों के मार्फत खबर दी है कि ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए ट्रंप ने अपने स्टाफ से एक नया प्लान बनाने को कहा है.
यूरोप के लिए वाकई अभूतपूर्व स्थिति
अपने पहले कार्यकाल के दौरान, साल 2019 में ट्रंप ने ग्रीनलैंड हासिल करने का आइडिया सामने रखा था. शुरुआत में डेनमार्क ने ट्रंप की चिरपरिचित शैली और छवि के मुताबिक, किसी मजाकिया बात की तरह इसे खारिज कर दिया. मगर, वक्त के साथ साफ हो गया कि ट्रंप मजाक नहीं कर रहे थे.
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बार-बार इंकार करने के बावजूद वह अपनी मांग दोहराते रहे. मानो, दुनिया 2024-25 से सीधे दो-ढाई सदी पुराने दौर में पहुंच गई हो, जब सन् 1867 में रूस और अमेरिका के बीच अलास्का की खरीद-फरोख्त हुई थी.
मौजूदा कार्यकाल में ट्रंप की ख्वाहिश बस चाहत जताने तक सीमित नहीं रही है. ट्रंप प्रशासन चेतावनी पर चेतावनी दिए जा रहा है कि ग्रीनलैंड, संयुक्त राज्य की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम है और उन्हें वो चाहिए. जबकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड कहते रहे हैं कि वह बिकाऊ नहीं है.
ट्रंप की हालिया चेतावनियों के बाद यूरोप के सात लीडर ग्रीनलैंड के साथ एकजुटता जता चुके हैं. यूरोप खुलकर कह रहा है कि ग्रीनलैंड, ग्रीनलैंड के लोगों का है और भौगोलिक अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए.
यूरोपीय लीडरों ने एक साझा बयान जारी किया, जिसमें लिखा था, "ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है. डेनमार्क और ग्रीनलैंड से जुड़े मुद्दों पर फैसला लेने का हक केवल डेनमार्क और ग्रीनलैंड का ही है." इस संयुक्त बयान पर डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन के नेताओं के दस्तखत थे. इन नेताओं ने संप्रभुता, भौगोलिक अखंडता और सीमाओं की यथास्थिति को लेकर यूएन चार्टर में दर्ज सिद्धांतों के पालन की अहमियत पर जोर दिया.
"अमेरिकी हमला होगा नाटो का अंत"
इस मसले में नाटो भी एक बड़ा जटिल पक्ष है. अमेरिका, नाटो का सबसे बड़ा देश है. डेनमार्क भी नाटो का हिस्सा है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध के अविश्वास और आक्रामकता से भरे दशकों में नाटो ने यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त रहने में सबसे बड़ी मदद दी. हमले की स्थिति में साझा सुरक्षा की गारंटी, आक्रमण और सीधी लड़ाई की आशंका को टालने का सबसे प्रमुख जरिया बना.
यूरोप के लिए सुरक्षा का मुद्दा बन गया है ग्रीनलैंड
मगर अब, नाटो के ही देश डेनमार्क को गठबंधन के अगुआ अमेरिका से खतरा नजर आ रहा है. यूरोपीय नेता ध्यान दिला रहे हैं कि ग्रीनलैंड समेत डेनमार्क नाटो का हिस्सा हैं. और, अमेरिका सहित सभी नाटो सदस्यों को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. आशंका मजबूत होती जा रही है कि कहीं अमेरिका, डेनमार्क पर हमला तो नहीं कर देगा.
ट्रंप प्रशासन की चेतावनियों के मद्देनजर यह संभावना बहुत दूर की कौड़ी नहीं रही. खुद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडेरिकसेन ने इस आशंका के बाबत बयान दिया. उन्होंने चेताया कि किसी अन्य नाटो देश पर अमेरिका का हमला, पश्चिमी देशों के इस सुरक्षा गठबंधन का अंत होगा.
अमेरिका की आंतरिक राजनीति में कितनी सहमति-असहमति
ट्रंप के अप्रत्याशित रवैये को अमेरिकी राजनीति में सर्वसम्मति हासिल नहीं है. इसे कई विशेषज्ञ खुलेआम बुलींग भी कह रहे हैं. अमेरिकी कांग्रेस में भी ट्रंप के रुख की आलोचना की जा रही है. आलोचकों में विपक्षी डेमोक्रैटिक पार्टी के ही नेता नहीं, बल्कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के भी सांसद हैं.
डेमोक्रैटिक पार्टी की सांसद जेन शाहेन और रिपब्लिकन सेनेटर थॉम टिलिस, दोनों अमेरिकी कांग्रेस के ऊपरी सदन 'सेनेट' की विदेश संबंध समिति के सदस्य हैं. इन दोनों ने कहा कि अगर डेनमार्क और ग्रीनलैंड साफ कर चुके हैं कि द्वीप बिकाऊ नहीं है, तो अमेरिका को नाटो के दायित्वों और डेनमार्क की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए.
मादुरो का अपहरण करके ट्रंप का हौसला बुलंद हुआ?
ग्रीनलैंड पाने की अपनी दलील में ट्रंप चीन और रूस का खतरा गिनाते हैं. उनके मुताबिक, दोनों देशों के जहाजों को ग्रीनलैंड की तटरेखा के पास देखा जा सकता है. ट्रंप का दावा है कि बात तेल या खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों की नहीं है, बल्कि यह विषय राष्ट्रीय सुरक्षा का है.
ट्रंप प्रशासन का इशारा, और भी देश आ सकते हैं निशाने पर?
ट्रंप प्रशासन वेनेजुएला पर हमला करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अगवा करना, उन्हें अमेरिका लाकर केस दर्ज करना और मुकदमा चलाना, इन सबको अपने सैन्य प्रभुत्व और शक्ति प्रदर्शन की बड़ी मिसाल मान रहा है. अमेरिका पहले भी कई मौकों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करके अपने हित सुनिश्चित करता रहा है. मगर, इस बार वह एक राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण कर अमेरिकी अदालत में ले आया है.
मादुरो और उनकी पत्नी पर अमेरिका में चलेगा केस, हमले पर बाकी देशों ने क्या कहा
वेनेजुएला के घटनाक्रम से उत्साहित ट्रंप के बयानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन चिंताओं को मजबूत किया है कि अब वो दक्षिण अमेरिका और कैरेबिया के उन देशों को भी निशाना बना सकते हैं जिनके लीडरों को वह पसंद नहीं करते. ट्रंप के बयानों को ही आधार मानें, तो उनकी सूची में सबसे प्रमुख नाम क्यूबा, कोलंबिया और मेक्सिको हैं. यहां तक कि ग्रीनलैंड और डेनमार्क के रूप में यूरोप या नाटो भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप या हमले की आशंका से मुक्त नहीं है.
रेयर अर्थ तत्व क्या होते हैं और क्यों है इनकी इतनी मांग?
ग्रीनलैंड, दुनिया का सबसे विशाल द्वीप है. आर्कटिक सर्कल इससे होकर गुजरता है. बल्कि, ग्रीनलैंड का करीब दो-तिहाई भूभाग आर्कटिक सर्कल में आता है. जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक ना केवल नागरिक, बल्कि सैन्य जहाजों के मार्गों के लिए बहुत अहम होता जा रहा है. ग्रीनलैंड के पास सामरिक दृष्टि से अहम खनिज संसाधनों और रेअर अर्थ का भी भंडार है.













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