जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स लोगों से ज्यादा काम करने की अपील कर रहे हैं. लेकिन कई कामकाजी माता-पिता के लिए बच्चों की देखभाल करना और साथ में फुल-टाइम नौकरी करना संभव ही नहीं है.चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) ने हाल ही में अपनी राष्ट्रीय बैठक की. इसमें 'वर्क-लाइफ बैलेंस' एक मुख्य मुद्दा रहा. मैर्त्स का माना है कि जर्मनी में वर्क-लाइफ बैलेंस को "जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर” देखा जाता है. उनके अनुसार बहुत से लोग पार्ट-टाइम काम कर रहे हैं, लेकिन अगर जर्मनी को आर्थिक रूप से मजबूत बनना है, तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को फुल-टाइम नौकरी करनी होगी. जबकि, इसी दौरान हुए हांस-ब्योकलर फाउंडेशन के आर्थिक और सामाजिक विज्ञान संस्था (डब्ल्यूएसआई) के एक नए अध्ययन में सामने आया है कि जर्मनी में ऐसे माता-पिता की संख्या बढ़ी है, जो पार्ट-टाइम काम करने के लिए मजबूर हैं. यह मजबूरी इसलिए है क्योंकि बच्चों के देखभाल केंद्रों में स्टाफ की कमी हो रही है, वह बंद हो रहे हैं और उनके काम के घंटों में कमी आने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.
जर्मनी के आर्थिक और सामाजिक विज्ञान संस्था (डब्ल्यूएसआई) की डायरेक्टर और इस अध्ययन की लेखिका, बेटीना कोलराउष ने कहा, "मौजूदा हालात में काम करने वाले माता-पिता ठीक से अपने काम की योजना नहीं बना पा रहे हैं और खासकर महिलाओं को यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि क्या वह नौकरी शुरू कर सकती हैं या अपने काम के घंटे बढ़ा सकती हैं. काम को लेकर हो रही मौजूदा बहस अक्सर गलत नजरिए से समझी जाती है. जबकि, सबसे पहले जरूरी है कि चाइल्डकेयर सेंटरों में ज्यादा निवेश किया जाए, ज्यादा स्टाफ की भर्ती हो ताकि छोटे बच्चों की शिक्षा और देखभाल की व्यवस्था मजबूत हो सके. अभी भी बच्चों की देखभाल करने वालों के लिए लाखों जगह खाली हैं."
चाइल्डकेयर में आई अचानक गिरावट
जर्मन यूथ इंस्टिट्यूट के आंकड़ों के अनुसार, जर्मनी में रहने वाले ज्यादातर माता-पिता को बाहरी चाइल्डकेयर सेंटरों की जरूरत होती है. हालांकि, इसमें से केवल 33 फीसदी माता-पिता ही मानते हैं कि उनके पास मौजूद चाइल्डकेयर सुविधाएं उनके काम के पूरे घंटों को कवर करती हैं. जब भी चाइल्डकेयर केंद्रों में स्टाफ की कमी होती है या बीमारियों के कारण कम घंटे चल रहे होते हैं या पूरी तरह बंद हो जाते हैं, तो मजबूरी में खासकर मांओं को ही समझौता करना पड़ता है.
इस रिसर्च में जर्मनी भर से लगभग 900 परिवारों का सर्वे किया गया. इसमें अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों के लोग शामिल थे. स्टडी में पता चला कि 54 फीसदी परिवारों को अचानक से चाइल्डकेयर की समस्या का सामना करना पड़ा. इस समस्या ने कई माता-पिता के काम पर असर डाला, लगभग 30 फीसदी माता-पिता को अपने काम के घंटे घटाने पड़े, जबकि करीब 42 फीसदी माता-पिता को मदद के लिए दोस्तों और रिश्तेदारों पर निर्भर होना पड़ा. जबकि प्रवासी और कम आय वाले परिवारों के लिए इस तरह के विकल्प मौजूद ही नहीं होते हैं.
जर्मनी में हर सातवें बच्चे पर गरीबी का खतरा
कोलोन में काम करने वाली स्कूल टीचर, रेचल को दो साल पहले उनके काम के घंटे कम करने पड़े थे. चूंकि उनके बच्चों का डे-केयर सेंटर स्टाफ की कमी के कारण पहले से जल्दी बंद होने लगा था. उनके बच्चे अब तीन और सात साल के हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "जब तक मेरे दोनों बच्चे हाई स्कूल में नहीं पहुंच जाते, तब तक मैं फुल-टाइम काम नहीं कर सकती."
उन्होंने आगे कहा, "जर्मनी में काम के घंटे कम करना संभव है, इसके लिए वह शुक्रगुजार हैं." उन्होंने आगे कहा, "लेकिन अब जीवन-यापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है, इसलिए अब यह स्थिति संभालना मुश्किल होता जा रहा है. लेकिन फुल-टाइम नौकरी करना सोच भी नहीं सकती क्योंकि हमारे आसपास कोई अन्य परिवार का सदस्य नहीं है और ऐसे में अगर किंडरगार्टन अचानक बंद हो जाए या जल्दी खत्म हो जाए, तो मैं काम पर नहीं हो सकती हूं. "
भारत: क्या डे-केयर में भी सुरक्षित नहीं बच्चे
चाइल्डकेयर में उचित निवेश की कमी
कोलराउष के शोध में यह भी सामने आया, "अविश्वसनीय या अपर्याप्त चाइल्डकेयर व्यवस्था पुरुषों और महिलाओं के बीच बच्चों की देखभाल के काम के असमान बंटवारे को और बढ़ा देती है यानी महिलाओं पर बच्चों की देखभाल की ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है और उनके लिए नौकरी करना मुश्किल हो जाता है. यह वजह, महिलाओं की देश के वर्कफोर्स में भागीदारी बढ़ाने में भी रुकावट बनती है."
जर्मन सरकार लोगों को ज्यादा काम करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, लेकिन चाइल्डकेयर सेक्टर में लगातार निवेश कम हो रहा है. जर्मनी के सरकारी विकास बैंक, केएफडब्ल्यू के अनुसार, अगर हर परिवार को भरोसेमंद और अच्छी चाइल्डकेयर सुविधा तक पहुंच देने के लिए, 2022 से लेकर अब तक पूरे देश में लगभग 10.5 अरब यूरो की कमी है. जर्मनी में पर्याप्त चाइल्डकेयर केंद्र बनाना, उनका खर्च उठाना और कर्मचारियों को ट्रेनिंग देना राज्य और स्थानीय सरकारों की जिम्मेदारी होती है. जर्मन यूथ इंस्टिट्यूट के अनुसार, जर्मनी के 16 अलग राज्यों में चाइल्डकेयर की सुविधा भी काफी अलग-अलग है. कुछ छोटे शहरी राज्य जैसे ब्रेमन में लगभग 23 फीसदी माता-पिता मानते हैं कि चाइल्डकेयर के घंटे पर्याप्त नहीं हैं, जबकि पूर्वी राज्य, सैक्सनी-अनहाल्ट में केवल पांच फीसदी माता-पिता को ऐसी समस्या होती है.
महिलाओं पर जिम्मेदारी का अधिक भार
यहां तक कि पुरुषों और महिलाओं के बीच भी यह समान नहीं है. डब्ल्यूएसआई के अध्ययन के अनुसार, जिन परिवारों पर यह समस्या असर डालती है, उसमें से 73 फीसदी पुरुषों ने कहा कि जब डे-केयर उपलब्ध नहीं होता था, तब उनकी महिला पार्टनर बच्चों की देखभाल संभाल करती थी. जबकि, केवल 39 फीसदी महिलाओं ने कहा कि ऐसी स्थिति में उनके पुरुष पार्टनर बच्चों की देखभाल करते थे.
शोधकर्ता कोलराउष ने चेतावनी दी कि अगर अधिकतम 8 घंटे के वर्कडे की सीमा को खत्म किया गया, जो कि जर्मनी के लोगों से ज्यादा काम करवाने के लिए सत्ताधारी सीडीयू का प्रस्ताव है, तो इसका नुकसान महिलाओं को अधिक होगा.
अपने चुनावी घोषणापत्र में सीडीयू ने मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए परिवार नीति को एक जरिया बनाया था. उन्होंने वादा किया था कि परिवारों को ज्यादा आर्थिक सहायता दी जाएगी, भरोसेमंद चाइल्डकेयर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी और माता-पिता को मिलने वाली आर्थिक सहायता में सुधार किया जाएगा. हालांकि, सरकार में आने के कई महीनों बाद भी इन वादों पर कोई काम नहीं किया गया है.













QuickLY