नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों (Men Having S*x With Men) (MSM) और महिला सेक्स वर्कर्स (Female S*x Workers) द्वारा रक्तदान (Blood Donation) करने पर लगी रोक की नीति का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में बचाव किया है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि जनस्वास्थ्य और रक्त प्राप्त करने वाले मरीजों की सुरक्षा, किसी व्यक्ति के रक्तदान करने के अधिकार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. गुरुवार (12 मार्च, 2026) को शीर्ष अदालत को सूचित किया गया कि ये प्रतिबंध वर्ष 2017 के 'ब्लड डोनर सिलेक्शन और डोनर रेफरल' (Blood Donor Selection and Donor Referral) दिशा-निर्देशों का हिस्सा हैं, जिन्हें चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह पर तैयार किया गया है. यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट की WhatsApp और Meta को कड़ी चेतावनी, 'निजता के अधिकार के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते'; डेटा शेयरिंग पर जताई नाराजगी
'जनस्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता': सरकार का तर्क
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने दलील दी. सरकार का कहना है कि ये समूह संक्रमण के प्रसार के लिहाज से "उच्च जोखिम" (At Risk) वाली श्रेणी में आते हैं. केंद्र ने जोर देकर कहा कि यदि इन नियमों में ढील दी जाती है, तो रक्त आधान (Blood Transfusion) के माध्यम से एचआईवी (HIV), हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जैसे संक्रमणों के फैलने का खतरा बढ़ सकता है. सरकार के अनुसार, सुरक्षित रक्त सुनिश्चित करना ही नीति का प्राथमिक उद्देश्य है.
याचिकाकर्ताओं ने नीति को बताया 'भेदभावपूर्ण'
सुप्रीम कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जिसमें 2017 के दिशा-निर्देशों को चुनौती दी गई है. इन नियमों के तहत ट्रांसजेंडर, समलैंगिक और सेक्स वर्कर्स को स्थायी रूप से रक्तदान से बाहर रखा गया है. याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने तर्क दिया कि यह नीति लैंगिक पहचान और यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) के आधार पर भेदभाव करती है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दिशा-निर्देश वास्तविक व्यवहार के बजाय पहचान को निशाना बनाते हैं. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि 'न्यूक्लिक एसिड टेस्टिंग' (NAT) जैसी आधुनिक स्क्रीनिंग तकनीकों से रक्त में वायरस का सटीक पता लगाया जा सकता है, जिससे पूर्ण प्रतिबंध की आवश्यकता खत्म हो जाती है. यह भी पढ़ें: Supreme Court On Stray Dog: दिल्ली में आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में हुई अहम सुनवाई, आदेश पर रोक लगाने पर फैसला सुरक्षित
कोर्ट की टिप्पणी: मरीजों की सुरक्षा अहम
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने नीति में हस्तक्षेप करने को लेकर सावधानी बरतने के संकेत दिए. न्यायाधीशों ने गौर किया कि बड़ी संख्या में मरीज सरकारी अस्पतालों में मुफ्त रक्त आधान पर निर्भर रहते हैं और वे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते.
अदालत ने कहा कि संक्रमण के एक छोटे से जोखिम से भी बचना जरूरी है, विशेषकर उन मरीजों के लिए जो पहले से ही गंभीर स्थिति में हैं. कोर्ट ने माना कि यह मामला विस्तृत परीक्षण की मांग करता है और आगे की सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की.
अधिकार बनाम सुरक्षा की बहस
यह मामला सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के साथ होने वाले संभावित भेदभाव के बीच चल रही बहस को फिर से सामने ले आया है. 2023 में दिए गए एक हलफनामे में भी मंत्रालय ने तर्क दिया था कि सुरक्षित रक्त प्राप्त करना मरीजों का अधिकार है, जो रक्तदान करने के व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर है.













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