Navratri Special 2019: दुर्गा सप्तशती के हर अध्याय से होती है विशेष कामनाओं की पूर्ति! जानें नवरात्र में इसका महात्म्य और रोचक जानकारी!
नवरात्रि 2019 (Photo Credits: Facebook)

Navratri Special 2019: हिंदू धर्म में मान्यता है कि जब-जब पृथ्वी पर पाप और अनाचार बढ़ता है, हमारे देवी-देवता पृथ्वी पर अवतरित होकर उनका सर्वनाश करते हैं. नवरात्रि में महाशक्ति दुर्गा का उद्भव भी इसी वजह से हुआ. दुर्गा सप्तशती में माँ भगवती के उद्भव से लेकर उनकी शक्ति, उनके महात्म्य और राक्षसों के संहार का वर्णन बहुत ही अनुपम एवं ग्राह्य तरीके से किया गया है. वस्तुतः दुर्गा सप्तशती अपने भीतर हर सुख को प्राप्त करने की महागुप्त साधना समेटे हुए है.

क्या है दुर्गा सप्तशती एवं इसका महात्म्य

दुर्गा सप्तशती काव्य का पाठ अमूमन नवरात्रि में किया जाता है. इसमें माँ दुर्गा के विभिन्न अवतारों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है. प्रभावशाली मंत्रों से युक्त यह दिव्य काव्य तांत्रिक साधना, गुप्त साधना मन्त्र साधना एवं अन्य प्रकार के पूजा-उपासन का मार्ग प्रशस्त करती है. दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं. मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ करने और श्रवण करनेवालों पर महादुर्गा की विशेष कृपा बरसती है. प्रस्तुत है दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों की कथावस्तु एवं उसके महात्म्य पर संक्षिप्त जानकारी.

दुर्गा सप्तशती अध्याय 1 मधु कैटभ वध

दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय के अनुसार भगवान विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न महाबलशाली दैत्य थे मधु-कैटभ. उसके अत्याचारों से धरती को मुक्ति दिलाने के लिए योगमाया महामाया को उत्पन्न करती हैं और महामाया अपने प्रभाव से विष्णु द्वारा मधु कैटभ का वध करवाती हैं.

अध्याय-2 महिषासुर की संपूर्ण सेना का संहार

त्रिदेव एवं अन्य देवताओं के तेज से देवी कौमारी (कुंवारी कन्या) प्रकट होती हैं. देवताओं पर महिषासुर के अत्याचार से क्रुद्ध होकर महाशक्ति महिषासुर की संपूर्ण सेना का अकेले वध कर महिषासुर की ओर बढ़ती हैं.

अध्याय-3 महिषासुर का वध कर कहलाईं ‘महिषासुर मर्दिनी

महिषासुर की सेना का संहार करने के बाद माँ दुर्गा महिषासुर पर आक्रमण कर देती हैं. मायावी महिषासुर युद्ध करते हुए कभी हाथी, कभी सिंह तो कभी भैंसा बनता है. अंतत माँ भगवती अपने त्रिशूल से उसका गर्दन काटकर संहार करती हैं. इसीलिए उन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ भी कहा जाता है.

अध्याय-4 माँ दुर्गा की स्तुति

माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार किए जाने के पश्चात देवताओं को स्वर्गलोक की प्राप्ति हो जाती है. इससे प्रसन्न होकर इंद्र की पत्नी इंद्राणी एवं अन्य देवता मिलकर माँ दुर्गा की स्तुति गान करते हैं.

अध्याय-5 चंड मुंड द्वारा मां दुर्गा की सुंदरता का वर्णन

दैत्यराज शुंभ और निशुंभ का सेनापति धुम्रलोचन था. शुंभ से माँ दुर्गा देवी की दिव्य सुंदरता का वर्णन करते हुए कहता है कि शुंभ दुर्गा से विवाह कर ले.

अध्याय-6 धुम्रलोचन वध

देवी द्वारा शुंभ से विवाह का प्रस्ताव ठुकराए जाने से क्रोधित होकर धुम्रविलोचन देवी दुर्गा पर आक्रमण करता है, लेकिन देवी के हुंकार भरने मात्र से धुम्रलोचन जलकर भस्म हो गया.

अध्याय-7 चंडमुंड का वध कर कहलाईं चामुंडा

धुम्रलोचन के वध के पश्चात चंड-मुंड देवी से युद्ध करने आए. देवी ने काली रूप धरकर दोनों का वध कर दिया. इसके बाद से वे ‘चामुंडा’ कहलाईं.

अध्याय-8 देवी काली का अवतरण और रक्तबीज का वध

शुंभ निशुंभ के मुख्य सेनापति रक्तबीज को वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर के रक्त का एक भी बूंद जमीन पर गिरेगा तो उतने ही बलशाली एक और रक्तबीज को पैदा होगा. चंडिका की क्रोध से माँ काली उत्पन्न होती है. काली माता रक्तबीज के रक्त को भूमि पर गिरने से पहले पीकर उसे रक्तहीन कर उसका वध करती हैं.

अध्याय-9-10 शुंभ निशुंभ वध

रक्तबीज की वध की खबर सुनकर शुंभ अपने भाई निशुंभ को माँ दुर्गा को पकड़कर लाने का आदेश देता है. देवी चंडिका निशुंभ के सारे शस्त्र नाकाम कर उसका वध कर देती हैं. निशुंभ की मृत्यु की खबर सुनकर शुंभ क्रोधित हो चंडिका की ओर लपकता है. तब माता चंडिका अपने त्रिशूल से उसका धड़ अलग कर देती हैं.

अध्याय-11 देवताओं ने की देवी स्तुति एवं देवी से मिला वरदान

शुंभ निशुंध के वध के पश्चात इंद्र एवं अन्य देवता मां कात्यायनी की स्तुतिगान करते हुए उन्हें मंगलदायिनी, कल्याणदायिनी, सर्वसुख दात्री, संकटहरणी बताते हुए जय-जयकार करते हैं. माँ दुर्गा देवताओं को उनकी इच्छानुरूप वरदान देती हैं कि वह जब भी जरूरत होगी पापियों का सर्वनाश करने हेतु अवतरित होती रहेंगी.

अध्याय-12, देवी चरित्र के पाठ की महिमा और फल

जो भी व्यक्ति शांतचित्त होकर माँ दुर्गा की स्तुतिगान करता है, अष्टमी, नवमी का पाठ करता है, उसकी सारी बाधाएं दूर होती हैं. किसी भी तरह का पाप उन्हें स्पर्श नहीं करता, ना कोई राजा, शत्रु, लुटेरे, अग्नि अथवा जल उनपर कोई विपरीत प्रभाव डाल सकता है.

अध्याय-13 सुरश और वैश्य को देवी का वरदान

अंततः सभी अध्यायों द्वारा देवी-महिमा का गुणगान कराने वाले राजा सुरथ और वैश्य को देवी माँ की शरण में जाने और मोक्ष प्राप्त का वरदान प्राप्त होता है.