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चंडीगढ़ का पहला Pollen Calendar एलर्जी उत्पन्न करने वाले संभावित कारकों की कर सकता है पहचान, इन लोगों को होगा सबसे ज्यादा फायदा

चंडीगढ़ के पास अब अपना ऐसा पहला पराग कैलेंडर है, जो एलर्जी उत्पन्न करने वाले सम्भावित कारकों की पहचान कर सकता है और उच्च पराग भार वाले मौसमों में इससे होने वाले खतरों को सीमित करने में चिकित्सकों की मदद करने के साथ-साथ एलर्जी पीड़ितों को उनके कारणों के बारे में स्पष्ट समझ प्रदान कर सकता है.

चंडीगढ़ का पहला Pollen Calendar एलर्जी उत्पन्न करने वाले संभावित कारकों की कर सकता है पहचान, इन लोगों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
प्रतिकात्मक तस्वीर (Photo Credits: Flickr, Tina Franklin)

चंडीगढ़ के पास अब अपना ऐसा पहला पराग कैलेंडर (Pollen Calendar) है, जो एलर्जी उत्पन्न करने वाले सम्भावित कारकों की पहचान कर सकता है और उच्च पराग भार वाले मौसमों में इससे होने वाले खतरों को सीमित करने में चिकित्सकों की मदद करने के साथ-साथ एलर्जी पीड़ितों को उनके कारणों के बारे में स्पष्ट समझ प्रदान कर सकता है.

भारत में लगभग 20-30% जनसंख्‍या परागज ज्वर अर्थात एलर्जिक राइनाइटिस/हे फीवर से पीड़ित है और लगभग 15% लोग दमे (अस्थमा) से पीड़ित हैं.पराग को एक प्रमुख बाहरी वायु के साथ प्रवाही एलर्जेन माना जाता है जो मनुष्यों में परागज ज्वर (एलर्जिक राइनाइटिस), अस्थमा और एग्जिमा अर्थात अटॉपिक डर्मेटाइटिस यानी त्वचा में खुजली और सूजन के लिए जिम्मेदार होते हैं. पराग कैलेंडर एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में रेखांकित और वर्गीकृत किए गए वायुजन्य (एयरबोर्न) एलर्जी कारक पराग कणों के समय की गतिशीलता का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे एक ही चित्र में किसी विशिष्ट मौसम में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हुए, पूरे वर्ष के दौरान मौजूद विभिन्न वायुजनित पराग कणों के बारे में आसानी से सुलभ दृश्य विवरण उपलब्ध कराते हैं. पराग कैलेंडर स्थान-विशिष्ट हैं और इनकी सांद्रता स्थानीय रूप से वितरित वनस्पतियों से निकटता से संबंधित हैं. यह भी पढ़े: Dengue in Delhi: दिल्ली में डेंगू का कहर, इस साल अब तक 100 से अधिक मामले आए सामने

सामुदायिक चिकित्सा विभाग और जन स्वास्थ्य विद्यालय, स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसन्धान संस्थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ ने वायुजन्य (एयरबोर्न) पराग स्पेक्ट्रम की मौसमी आवधिकताओं की जांच की और चंडीगढ़ शहर के लिए पहला पराग कैलेंडर विकसित किया. यह प्रारंभिक परामर्श तैयार करने और मीडिया चैनलों के माध्यम से नागरिकों तक इन्हें प्रसारित करने में मदद करेगा ताकि वे उस अवधि के दौरान सुरक्षात्मक उपकरणों का उपयोग कर सकें जब एलर्जीकारक परागकणों की सांद्रता अधिक होगी। यह संवेदनशील लोगों के लिए एक निवारक उपकरण भी है, जब विशिष्ट अवधि के दौरान एयरो-पराग के स्तर अधिक होने पर जोखिम बढ़ जाता है.

यह सामुदायिक चिकित्सा विभाग और जन स्वास्थ्य विद्यालय, स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसन्धान संस्थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ में डॉ रवींद्र खैवाल के नेतृत्व में एक टीम द्वारा संभव बनाया गया था। इसमें डॉ. आशुतोष अग्रवाल, प्रोफेसर, और प्रमुख, पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़, के फुफ्फुस औषधि (पल्मोनरी मेडिसिन) विभाग के प्रोफेसर डॉ. आशुतोष अग्रवाल और पर्यावरण अध्ययन विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, की अध्यक्ष और एसोशिएट प्रोफेसर डॉ. सुमन मोर के साथ-साथ शोधार्थी सुश्री अक्षी गोयल और श्री साहिल कुमार शामिल थे.

इस समूह ने चंडीगढ़ में मुख्य पराग ऋतुओं, उनकी तीव्रताओं, विविधताओं और एरोबायोलॉजिकल रूप से महत्वपूर्ण पराग कणों के प्रकारों की खोज की। उनके अध्ययन ने चंडीगढ़ के लिए वैज्ञानिक पराग कैलेंडर तैयार कर इसके बारे में नवीनतम (अप-टू-डेट) जानकारी प्रदान की और विभिन्न मौसमों में महत्वपूर्ण पराग कणों के प्रकारों की परिवर्तनशीलता पर भी प्रकाश डाला. वायुजन्य पराग कणों की अधिकता वाले प्रमुख मौसम वसंत और शरद ऋतु थेI इनकी अधिकतम प्रजातियां तब सामने आती हैं जब ऋतूजैविकीय (फेनोलॉजिकल) और मौसम संबंधी मानकों को पराग कणों के विकास, फैलाव (विसरण) और संचरण के लिए अनुकूल माना जाता है.

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) से सहायता प्राप्त यह अध्ययन हाल ही में एल्सेवियर की एक पत्रिका, वायुमंडलीय पर्यावरण (एटमोस्फयरिक एनवार्नमेंट) में प्रकाशित हुआ था.

प्रमुख अन्वेषक डॉ. खैवाल ने कहा कि चंडीगढ़ के आसपास हाल के वर्षों में वन क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और हरे-भरे स्थानों में वृद्धि से वायुजनित परागकणों में भी वृद्धि होगी, जिसके परिणामस्वरूप पराग से होने वाली एलर्जी संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं.

डॉ. मोर ने इस बारे में कहा, "इस परिदृश्य में, इस अध्ययन का उद्देश्य पर्यावरण में वर्तमान परिवर्तनों से परिचित होने के लिए अतिसंवेदनशील आबादी, स्वास्थ्य पेशेवरों, नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों के लिए वायुजन्य पराग कणों से सम्बन्धित मौसमी जानकारी लाना है, जो आगे चल कर शमन रणनीतियों को विकसित करने में मदद कर सकती हैं" . डॉ. आशुतोष अग्रवाल ने कहा, "इस अध्ययन के निष्कर्ष वायुजन्य परागकणों के मौसम की समझ को बढ़ाएंगे , जिससे परागकणों से होने वाली एलर्जी को कम करने में मदद मिल सकती है."

वेबसाइट ((https://www.care4cleanair.com/champ) के माध्यम से जनसामान्य चंडीगढ़ के पराग कैलेंडर तक पहुंच सकते हैं.  (साभार पीआईबी)

(The above story first appeared on LatestLY on Sep 06, 2021 11:02 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).