क्या है ट्रंप का शांति फॉर्मूला
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

विश्व व्यवस्था में खलबली मचाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दावोस में अपनी शांति योजना "बोर्ड ऑफ पीस" का प्रचार करना चाहते हैं. क्या है ट्रंप का ये फॉर्मूला?अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप 2025 में शांति का नोबेल पुरस्कार न मिलने से मायूस हुए, लेकिन क्या 2026 में वह इस पुरस्कार को लेकर ही मानेंगे? क्या उनका प्रस्तावित "बोर्ड ऑफ पीस" प्लान इसी लक्ष्य का रास्ता है? शुरुआत में इस बोर्ड को चुनिंदा वैश्विक नेताओं का ऐसा समूह माना जा रहा था जो गाजा में संघर्षविराम को बरकरार रखे. लेकिन अब ट्रंप इस नजरिए का विस्तार करना चाहते हैं.

ग्रीनलैंड को किसी भी तरह हासिल करने की जिद करते आ रहे ट्रंप, बुधवार को जब स्विट्जरलैंड के दावोस शहर पहुंचे तो उन्होंने अपने रुख को जरा नर्म किया. ट्रंप ने बुधवार को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कहा कि वह "ताकत का इस्तेमाल कर" ग्रीनलैंड को नहीं लेंगे. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि "ग्रीनलैंड की हिफाजत सिर्फ अमेरिका जैसी महान शक्ति" ही कर सकती है.

दावोस में बुधवार को ट्रंप ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सिसी से भेंट की. इस दौरान मिस्र ने ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने पर हामी भर दी. इसके बाद ट्रंप ने कहा, "हमारे पास ऐसे कई महान लोग हैं जो इसमें शामिल होना चाहते हैं." इसके बाद ट्रंप ने कहा, "यह आज तक स्थापित किया गया सबसे प्रतिष्ठित बोर्ड होगा."

क्या है बोर्ड ऑफ पीस

अब तक करीब 35 देश ट्रंप के इस प्लान में शामिल होने पर रजामंद हो चुके हैं. ट्रंप प्रशासन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 60 देशों को इसे ज्वाइन करने का न्योता भेजा गया है. इन देशों में भारत समेत कई यूरोपीय देश भी शामिल हैं. हालांकि ग्रीनलैंड के मुद्दे पर खार खाए बैठे कुछ यूरोपीय देश अमेरिकी राष्ट्रपति के इस आमंत्रण को ठुकरा रहे हैं. इस बोर्ड में शामिल होने वाले कई देशों को अपनी संसद की अनुमति लेनी होगी.

ट्रंप ने फिलहाल सात लोगों को एक्जीक्यूटिव बोर्ड मेम्बर नियुक्त किया है. इनमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, स्टीव विटकॉफ, जैरेड कुशनर, टोनी ब्लेयर, मार्क रॉवन, अजय बग्गा और रॉबर्ट ग्राबिएल शामिल हैं. बोर्ड के प्रेसीडेंट खुद डॉनल्ड ट्रंप हैं. प्रेसीडेंट को बहुत ही ज्यादा शक्ति दी गई है. वहीं नीतियों को लागू करने वाले सदस्यों में शामिल विटकॉफ ट्रंप के पुराने मित्र हैं, कुशनर उनके दामाद हैं. ब्लेयर ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. रॉवन, निजी इक्विटी फर्म अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ हैं. भारतीय मूल के बग्गा विश्व बैंक के प्रमुख हैं और ग्राबिएल, अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं.

इस बोर्ड का आइडिया सबसे पहले तब आया जब ट्रंप ने 2025 में 20 सूत्री गाजा संघर्षविराम प्लान पेश किया. उस प्लान को यूएन सुरक्षा परिषद ने भी अपनाया. इसके बाद कई नेताओं को न्योते भेजे गए. दावोस में तो ट्रंप ने यह जाहिर ही कर दिया गया कि यह सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं रहेगा.

79 साल के ट्रंप कहते हैं कि उनका बोर्ड ऑफ पीस, संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए जाने वाले कई काम खुद करेगा और मुमकिन है कि देर सबेर यूएन को महत्वहीन बना देगा. इसी हफ्ते की शुरुआत में जब पत्रकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति से पूछा कि क्या यह बोर्ड यूएन की जगह लेगा, तो ट्रंप ने कहा, "हो भी सकता है." अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि यह वैश्विक संगठन (यूएन) "बहुत काम का नहीं रह गया है." हालांकि इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि यूएन को जारी रहना चाहिए "क्योंकि इसके पास अपार संभावनाएं हैं"

रूस और चीन का रुख

कुछ बड़े सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. क्या चीन और रूस, ट्रंप के प्लान में शामिल होंगे. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का कहना है कि उनका देश, किसी भी तरह का वादा करने से पहले अपने "रणनीतिक साझेदारों" से मशविरा कर रहा है. गुरुवार को मॉस्को में पुतिन फलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिल भी रहे हैं.

चीन ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के न्योते की पुष्टि तो की है, लेकिन इसमें शामिल होने की कोई इच्छा नहीं जताई है. बुधवार को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने बीजिंग में पत्रकारों से कहा, "यूएन के लिहाज से कहें तो चीन ने हमेशा सच्चे बहुलतावाद का अभ्यास किया है. अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां चाहे किसी भी तरह बदलें, चीन दृढृता से यूएन केंद्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित वैश्विक व्यवस्था और यूएन चार्टर के सिद्धांतों व प्रस्तावों के तहत अंतराष्ट्रीय संबंधों के आधारभूत नियमों पर अडिग रहता है."

कई साझेदारों का ठंडा रुख

नाटो के सदस्य और अमेरिका के सदाबहार साझेदार कहे जाने वाले कई यूरोपीय देशों ने ट्रंप के न्योते को ठुकरा दिया है. ना सुनकर बिफरने वाले ट्रंप को फ्रांस, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे और स्लोवेनिया ने स्पष्ट शब्दों में "नो" कहा है. फ्रांस ने इसकी वजह बोर्ड के अध्यक्ष के असीमित अधिकारों को बताया है. बोर्ड के अध्यक्ष ट्रंप बहुमत से लिए गए फैसले को भी खारिज कर सकते हैं.

कुछ देश संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था को कमजोर न करने को इसकी वजह बता रहे हैं तो कुछ देश ट्रंप के कई मुद्दों पर मनमाने रुख से आहत भी हैं. ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, यूरोपीय संघ, कनाडा, भारत और यूक्रेन ने अब तक ट्रंप के न्योते पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.