राजनीति

क्यूबा में अमेरिका की सत्ता परिवर्तन की आस के बीच मेक्सिको ने भेजी मदद

वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अमेरिका द्वारा गिरफ्तार करने के बाद से ही लातिन अमेरिकी क्षेत्र में अमेरिका का दबाव तेज हुआ है.

क्यूबा में अमेरिका की सत्ता परिवर्तन की आस के बीच मेक्सिको ने भेजी मदद
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अमेरिका द्वारा गिरफ्तार करने के बाद से ही लातिन अमेरिकी क्षेत्र में अमेरिका का दबाव तेज हुआ है. इस बीच मेक्सिको ने क्यूबा की मदद के लिए नौसेना के 2 जहाजों में 1,200 टन राहत सामाग्री भेजीमेक्सिको की सरकार ने क्यूबा की गंभीर आर्थिक और ऊर्जा समस्याओं को देखते हुए एक बड़ा कदम उठाया है. शनिवार को मेक्सिको की नौसेना के दो जहाज लगभग 1,193 टन मानवीय सहायता लेकर क्यूबा के पोर्ट हवाना पहुंचे. यह दूसरा बड़ा राहत काफिला है जो लगभग एक महीने के भीतर क्यूबा के लिए रवाना हुआ है. सहायता में मुख्य रूप से प्रमुख खाद्य सामान जैसे दाल, साधारण और पाउडर वाला दूध और अन्य आवश्यक सामान शामिल हैं, जिनमें से कुछ समाज सेवी संगठनों और मेक्सिको शहर प्रशासन द्वारा इकट्ठा किए गए. क्यूबा, लंबे समय से अमेरिकी व्यापार प्रतिबंध के तहत, आपूर्ति संकट, लगातार बिजली कटौती और तेल की भारी कमी का सामना कर रहा है.

दोनों जहाजों की मदद और उसकी आवश्यकता

यह मदद क्यूबा के नौसेना जहाज वेराक्रूज से मंगलवार को रवाना हुई. मेक्सिको के विदेश मंत्रालय ने कहा कि पापालोआपान जहाज लगभग 1,078 टन राशन ले गया है, जिसमें दाल और पाउडर दूध मुख्य हैं, वहीं हूएस्तेको में 92 टन दाल और 23 टन अन्य खाद्य वस्तुएं हैं. ये राहत सामग्री मुख्य रूप से आम नागरिकों के लिए है, ताकि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें.

दरअसल क्यूबा पहले वेनेजुएला से तेल प्राप्त करता था, लेकिन अमेरिकी दबाव के कारण यह स्रोत भी ठंडा पड़ गया. ऐसे में खाद्य और ऊर्जा संकट ने क्यूबा में रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित किया है, बिजली कटौती और आम सेवाएं भी लगभग ठप्प पड़ी हैं.

मेक्सिको की रणनीति

मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लॉडिया शीनबाउम ने इस राहत अभियान का नेतृत्व किया है. उन्होंने बार-बार कहा है कि मेक्सिको क्यूबा के लोगों की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है. शीनबाउम ने पहले भी कहा था कि अगर मेक्सिको सहायता कर सकता है तो वह करेगा, खासकर तब जब वहां का आम जन जीवन कठिनाइयों से जूझ रहा हो. उनका यह रवैया पारंपरिक लैटिन अमेरिकी सहयोग और मानवीय मूल्यों पर आधारित बताया जा रहा है.

हालांकि राष्ट्रपति शीनबाउम ने ऊर्जा (तेल) आपूर्ति के मुद्दे पर स्पष्ट कहा है कि इस विषय पर सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत नहीं हुई, लेकिन मेक्सिको की नीति स्पष्ट रूप से मानवीय सहायता पर केंद्रित दिखाई है.

संकट का कारण: तेल आपूर्ति रोक और अमेरिकी दबाव

क्यूबा पिछले दशक से अमेरिकी व्यापार प्रतिबंध और राजनीतिक दबाव के बीच फंसा हुआ है, लेकिन जनवरी 2026 में यह स्थिति और गंभीर हो गई जब अमेरिकी सैनिक डॉनल्ड ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके घर से गिरफ्तार कर अमेरिका ले आए. वेनेजुएला क्यूबा का प्रमुख तेल निर्यातक देश था. तब से राजनीतिक तनाव के चलते क्यूबा को तेल निर्यात नहीं हो पा रहा है. इससे ऊर्जा संकट गहरा गया है. दिन पर दिन बढ़ रहा अमेरिकी दबाव और टैरिफ क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रहे हैं.

ट्रंप लातिन अमेरिका पर दबाव क्यों बना रहे हैं?

लातिन अमेरिका में सरकारों को बदलने की इच्छा को केवल वैचारिक मतभेद से नहीं समझा जा सकता. भू-राजनीति इसका बड़ा पहलू है. शीत युद्ध के दौर से ही वॉशिंगटन पश्चिमी गोलार्ध को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता रहा है. जब किसी देश की सरकार खुलकर अमेरिकी नीतियों का विरोध करती है या रूस, चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के करीब जाती है, तो उसे रणनीतिक चुनौती माना जाता है.

वेनेजुएला, क्यूबा या निकारागुआ जैसे देशों में वामपंथी या राष्ट्रवादी सरकारें न केवल अमेरिकी प्रभाव को सीमित करती हैं, बल्कि क्षेत्र में चीन के निवेश और रूस के सैन्य सहयोग के लिए जगह बनाती हैं. इस नजरिए से सत्ता परिवर्तन को समर्थकों द्वारा "लोकतंत्र की बहाली” और आलोचकों द्वारा "प्रभाव क्षेत्र की पुनर्स्थापना” के रूप में देखा जाता है. अमेरिका का मानना है कि उत्तर अमेरिका में इन्हीं देशों से असलाह और ड्रग तस्करी होती है, इसलिए वो ऐसा कर रहे हैं.

दूसरा बड़ा पहलू ऊर्जा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा है. वेनेजुएला में दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं. जबकि क्यूबा रणनीतिक समुद्री मार्गों के करीब स्थित है. ऊर्जा आपूर्ति, टैरिफ नीति और वैश्विक तेल बाजार में संतुलन, ये सब अमेरिका के पूंजीवादी हितों से सीधे जुड़े हैं. अगर किसी देश की सरकार अमेरिकी कंपनियों को बाहर रखती है या तेल संसाधनों को दूसरे साझेदारों के साथ बांटती है, तो वॉशिंगटन पर घरेलू और कॉरपोरेट दबाव बढ़ता है. ट्रंप की "ऊर्जा प्रभुत्व” की सोच के तहत यह तर्क दिया जाता है कि क्षेत्र में अनुकूल सरकारें होने से तेल बाजार स्थिर रहेगा और अमेरिकी आर्थिक हित सुरक्षित रहेंगे. हालांकि, आलोचक कहते हैं कि ऐसी नीतियां अक्सर क्षेत्रीय अस्थिरता, प्रतिबंधों और मानवीय संकट को भी जन्म देती हैं, जिससे दीर्घकालिक लाभ नहीं हो सकते.

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 01, 2026 07:10 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).