राजनीति

जेन-जी क्रांति के बाद नेपाल में पहला लोकतांत्रिक चुनाव

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में हो रहे अहम राष्ट्रीय चुनाव से पहले दो ही मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में हैं.

जेन-जी क्रांति के बाद नेपाल में पहला लोकतांत्रिक चुनाव
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत के पड़ोसी देश नेपाल में हो रहे अहम राष्ट्रीय चुनाव से पहले दो ही मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. इनमें पुराने राजनीतिक दलों को जेन-जी का समर्थन और चुनाव के बाद भारत-चीन संबंधों में संतुलन का भविष्य शामिल है.नेपाल की हालत भारत के दूसरे पड़ोसी बांग्लादेश से काफी हद तक मिलती-जुलती है. बांग्लादेश में भी युवा और छात्रों के आंदोलन के बाद हाल में हुए चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के गठबंधन वाली नई सरकार सत्ता में आई है. हालांकि वहां पिछली निर्वाचित सरकार के पतन और नए चुनाव में करीब 18 महीने का फासला रहा, लेकिन वहां आंदोलन के जरिए शेख हसीना सरकार को सत्ता से हटाने की मुहिम में शामिल रहे छात्रों की नई पार्टी को ज्यादा कामयाबी नहीं मिली. लोगों ने पारंपरिक राजनीतिक दल बीएनपी पर ही भरोसा जताया.

लेकिन नेपाल में यह चुनाव जेन-जी आंदोलन और सरकार के इस्तीफे के छह महीने के भीतर ही हो रहे हैं. ऐसे में राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या यहां आंदोलन के शीर्ष चेहरे के तौर पर उभरे बालेंद्र या बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को ही जेन-जी का समर्थन मिलेगा या फिर यह तबका उन पुराने राजनीतिक दलों को ही समर्थन देगा जिसे उन्होंने सत्ता से हटाया था? अगर यहां नई पार्टी सत्ता में आती है तो उसे भारत-चीन संबंधों में संतुलन बनाए रखने की अहम चुनौती से जूझना होगा. यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या लंबे समय से जारी नेपाल की गुटनिरपेक्षता की नीति चुनाव बाद भी कायम रह सकेगी?

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इस चुनाव के नतीजे इस संतुलन को ज्यादा प्रभावित नहीं करेंगे. इसकी वजह यह है कि सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी आए, भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखना उसकी मजबूरी होगी.

पीएम बनने की दौर में पुराने और नए नेता

वैसे तो नेपाल में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में बालेंद्र शाह. गगन थापा, केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल जैसे कई नेता शामिल हैं. लेकिन इनमें बालेंद्र शाह को सबसे आगे बताया जा रहा है. आरएसपी के टिकट पर झापा-5 सीट से मैदान में उतरे शाह पूर्व प्रधानमंत्री ओली को कड़ी चुनौती दे रहे हैं. जेन-जी के आंदोलन के कारण ही ओली को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. रैपर से राजनीतिज्ञ बने शाह काठमांडू के मेयर रहे हैं.

नेपाल की आबादी करीब तीन करोड़ है. लेकिन वहां वोटरों की संख्या 1.90 करोड़ ही है. देश की प्रतिनिधि सभा में 275 सीटें हैं. लेकिन उनमें से 165 सीटों के लिए ही मतदान हो रहा है. बाकी 110 सीटें राजनीतिक दलों को मिले वोट के प्रतिशत के आधार पर उनमें बांटी जाएंगी. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना मुश्किल नजर आ रहा है. अब जेन-जी के समर्थन से सत्ता का रास्ता साफ हो सकता है.

भारत या चीन के करीब होगी नई सरकार

भारत-चीन संबंधों में संतुलन के सवाल ने दोनों पड़ोसियों यानी भारत और चीन के लिए भी इस चुनाव को दिलचस्प बना दिया है. भारत के साथ नेपाल के संबंध काफी पुराने हैं और कई इलाकों में दोनों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है. दूसरी ओर, हाल के वर्षों में चीन ने भी बांग्लादेश में काफी पैठ बनाई है. नेपाल की सत्ता में वामपंथी दलों के कार्यकाल में चीन की ओर सरकार का झुकाव बढ़ा है.

विश्लेषकों के मुताबिक, नेपाल की नई सरकार चीन या भारत में से किसी एक को नाराज नहीं करना चाहेगी. नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र शर्मा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "नेपाल की सत्ता में चाहे कोई भी आए, भारत या चीन में से किसी को नाराज करने का जोखिम नहीं मोल ले सकता. इसलिए उसे इन दोनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बना कर ही आगे बढ़ना होगा."

स्थिर सरकार बनने की उम्मीदें

नेपाल हाल के वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है. इस दौरान वहां कई सरकारें बदलती रही हैं. इसलिए देश के लोगों को अब एक स्थिर सरकार मिलने की उम्मीद है. राजनीतिक अस्थिरता के कारण देश में बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं भी लगातार बढ़ी है. इसके साथ ही जेन-जी के विद्रोह के बाद पड़ोसी देशों के संबंधों में संतुलन भी गड़बड़ाया है. इसलिए भारत के साथ चीन भी इस चुनाव में काफी दिलचस्पी ले रहा है. उसने चुनाव के बेहतर संचालन के लिए नेपाल को 40 लाख डॉलर की मदद दी है. लेकिन शर्त यह है कि इस पैसे का इस्तेमाल चुनाव से संबंधित कार्यों में ही करना होगा.

दरअसल, नेपाल से चीन के अहम हित जुड़े हैं. वह इस देश में भारत के असर को चुनौती देकर अपनी मजबूत पैठ बनाना चाहता है. चीन ने यहां बड़े पैमाने पर निवेश भी किया है. कोई नौ साल पहले उसने नेपाल के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर भी हस्ताक्षर किए थे. लेकिन इस परियोजना में खास प्रगति नहीं हो सकी है. अब उसकी चिंता यह है कि अगर चुनाव में जेन-जी के समर्थन वाली नई पार्टी को कामयाबी मिलती है तो उसका रवैया अलग हो सकता है. जेन-जी के आंदोलन के दौरान चीन की नपी-तुली प्रतिक्रिया भी उसकी चिंता जाहिर करती है. उसने अपनी टिप्पणी में कभी जेन-जी का नाम नहीं लिया है.

चीन ने हाल में ही नेपाल में अपने नए राजदूत की तैनाती की है. इसका मकसद सत्ता में आने वाली सरकार के साथ बेहतर तालमेल कायम करना और आपसी संबंधों को मजबूती से आगे बढ़ाना है. आरएसपी के सत्ता में आने की स्थिति चीन को नेपाल के साथ अपने संबंधों की नई शुरुआत करनी पड़ सकती है.

युवाओं के समर्थन पर निर्भर

सबसे अहम सवाल यह है कि दौड़ में आगे रहने के बावजूद नेपाल के वोटर क्या राजनीति का खास अनुभव नहीं रखने वाले बालेंद्र शाह को प्रधानमंत्री चुनेंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस सवाल का जवाब जेन-जी के समर्थन पर निर्भर है. यह देखना होगा कि यह तबका नए चेहरों पर भरोसा जताता है या फिर उन राजनीतिक दलों का ही समर्थन करता है जिसे सत्ता से हटाने के लिए उसने हिंसक आंदोलन किया था.

जहां तक मुद्दों का सवाल है भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी ही सबसे बड़े मुद्दों के तौर पर उभरे हैं. इसके अलावा नेपाली कांग्रेस ने सरकारी अधिकारियों की संपत्ति की जांच की बात कही है. कई अन्य पार्टियों ने रोजगार के मौके पैदा करने और सामाजिक असमानता दूर करने के वादे किए हैं. यह चुनाव नेपाल के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है. नेपाल से सटे उत्तर बंगाल के एक कालेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर रही डा. अनिता लामा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "इस चुनाव का मकसद सिर्फ सरकार बदलना नहीं बल्कि आम लोगों और नेताओं के बीच आपसी भरोसा दोबारा बहाल करना है. जेन-जी के लिए यह विरोध से भागीदारी की ओर बढ़ने का मौका है. चुनाव के नतीजे नेपाल और पड़ोसी देशों के साथ उसका भविष्य तय करेंगे."

पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग से सटे नेपाल के झापा जिले के धुलाबाड़ी के कारोबारी कमल प्रधान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार चाहे किसी की भी बने, भारत के साथ संबंधों की बेहतरी पर ध्यान देना होगा. गुटनिरपेक्षता की अपनी पुरानी नीति को जारी रखना ही में देश और इसके लोगों के हित में होगा. हाल के दिनों में इसमें दूरी बढ़ी है.

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 04, 2026 10:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).