Fact Check: भारत के विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) (MEA) ने सोशल मीडिया (Social Media) पर तेजी से वायरल (Viral Video) हो रहे उस दावे को 'झूठा और निराधार' बताते हुए खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि अमेरिका (US) ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए भारत से सैन्य सहायता या क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति मांगी है. शनिवार, 21 मार्च को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर जारी एक सार्वजनिक परामर्श में मंत्रालय ने नागरिकों को आगाह किया कि वे ऐसी असत्यापित जानकारियों और अफवाहों से भ्रमित न हों. यह भी पढ़ें: मध्य पूर्व में भारी तनाव: इजरायल ने ईरान के 'साउथ पार्स' गैस फील्ड पर किया हमला, ट्रंप प्रशासन की मंजूरी के बाद बढ़ी क्षेत्रीय युद्ध की आशंका (Watch Video)
क्या था सोशल मीडिया पर वायरल दावा?
विवाद तब शुरू हुआ जब इंटरनेट पर एक पोस्ट साझा की गई, जिसमें दावा किया गया कि वॉशिंगटन 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट' (LEMOA) के तहत ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए पश्चिमी भारत के इस्तेमाल की संभावना तलाश रहा है. पोस्ट में यह भी कयास लगाए गए थे कि कोंकण तट के पास सैन्य तैनाती की जा सकती है, जिसे ईरान के साथ बढ़ते तनाव से जोड़ा गया था.
विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख: 'फेक न्यूज अलर्ट'
इन दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई भी मांग या विकास नहीं हुआ है. मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, 'फेक न्यूज अलर्ट! कृपया सोशल मीडिया पर चल रहे ऐसे झूठे और निराधार दावों और पोस्ट के प्रति सतर्क रहें.' बयान में यह भी संकेत दिया गया कि वायरल पोस्ट में भारत की रक्षा व्यवस्था और अमेरिका के साथ हुए समझौतों के दायरे को गलत तरीके से पेश किया गया है. यह भी पढ़ें: ईरान और इस्राएल-अमेरिका युद्ध पर कहां खड़े हैं ब्रिक्स देश
अमेरिका द्वारा भारत से ईरान पर हमले के लिए सैन्य सहायता मांगने के दावे ‘झूठे और बेबुनियाद’ हैं
Fake News Alert!
Please stay alert against such false and baseless claims and posts on social media! pic.twitter.com/oKRc2kefAo
— MEA FactCheck (@MEAFactCheck) March 21, 2026
क्या है LEMOA और इसकी सीमाएं?
साल 2016 में भारत और अमेरिका के बीच हस्ताक्षरित 'लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट' (LEMOA) एक द्विपक्षीय रसद व्यवस्था है.
सुविधाएं: यह दोनों देशों के सशस्त्र बलों को ईंधन भरने, मरम्मत और आपूर्ति के लिए एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं तक पहुँच की अनुमति देता है.
- पाबंदियां: यह समझौता किसी भी देश को दूसरे की जमीन का उपयोग सैन्य हमला करने के लिए करने की अनुमति नहीं देता है. इसके लिए मामला-दर-मामला आधार पर स्पष्ट और अलग मंजूरी की आवश्यकता होती है.
- स्थायी ठिकाना: इसमें सैनिकों या सैन्य संपत्तियों की स्थायी तैनाती (Permanent Basing) का कोई प्रावधान नहीं है.
वैश्विक कूटनीति और कानूनी ढांचा
सैन्य उद्देश्यों के लिए किसी दूसरे देश के क्षेत्र का उपयोग हमेशा औपचारिक समझौतों और सख्त कानूनी ढांचे (जैसे SOFAs) के अधीन होता है. ये व्यवस्थाएं पूरी तरह से मेजबान देश की सहमति पर निर्भर करती हैं और इनका दायरा बेहद सीमित होता है. भारत की विदेश नीति हमेशा से किसी भी संघर्ष में अपनी संप्रभुता और स्वायत्तता बनाए रखने पर केंद्रित रही है.












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