माता सीता ने क्रोधित होकर दिया था ब्राह्मण, गाय, नदी और अग्नि को श्राप, आज भी देखने को मिलता है इसका प्रमाण
जब क्रोध में आकर माता सीता ने ब्राह्मण, गाय, नदी और अग्नि देवता को श्राप दे दिया, जिसका प्रमाण आज भी देखने को मिलता है.
रामायण (Ramayan) और रामचरित मानस (Ramcharit Manas) जैसे धार्मिक ग्रंथों में सीता जी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व अत्यंत शालीन, सुशील एवं पतिव्रता पत्नी के रूप में देखने के मिलता है. उन्होंने जीवन में आये हर अग्नि परीक्षा का सामना भी उतनी ही शिद्दत एवं साहस के साथ किया. लेकिन हम यहां उनके क्रोध से संबंधित संदर्भ का उल्लेख करेंगे, जब क्रोध में आकर माता सीता (Mata Sita) ने ब्राह्मण (Brahmin), गाय (Cow), नदी (River) और अग्नि देवता (Fire) को श्राप दे दिया, जिसका प्रमाण आज भी देखने को मिलता है. आखिर किस वजह से आया था माता सीता को क्रोध... चलिए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा.
यह बात त्रेता युग की है. श्री राम अपने पिता दशरथ का पिंडदान करवाने गया पहुंचे थे. श्री राम नदी के तट पर सीता जी को छोड़कर भाई लक्ष्मण के पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करने चले जाते हैं. काफी समय बीत जाने के पश्चात भी दोनों भाई नहीं लौटते तो माता सीता परेशान हो जाती हैं. तभी राजा दशरथ की आत्मा वहां पहुंचती है और सीता से शुभ मुहुर्त में पिंडदान करने की याचना करते हैं. सीता पिता तुल्य दशरथ जी को बताती हैं कि श्रीराम और भ्राताश्री लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री की व्यवस्था करने गये हैं.
दशरथ जी उन्हें सुझाव देते हैं कि फाल्गु महानदी, गाय, तुलसी, ब्राह्मण, अग्नि देवता एवं बरगद के पेड़ की उपस्थिति में पिंडदान किया जा सकता है, वरना पिंडदान का शुभ मुहूर्त निकल जायेगा. सीता जी ने उनके सुझाव के अनुसार, वहीं रेत के पिंड बनाकर दशरथ जी का पिंडदान सम्पन्न करवा दिया. किंवदंति है कि पिंडदान ग्रहण करने के लिए स्वयं राजा दशरथ जी का हाथ फाल्गु नदी से बाहर निकला था. इसे वहां उपस्थित सभी ने देखा. यह भी पढ़ें: Chaitra Navratri 2019: 6 अप्रैल से शुरू हो रही है चैत्र नवरात्रि, जानें किस दिन करनी चाहिए किस शक्ति की पूजा
थोड़ी देर में श्रीराम एवं लक्ष्मण पिंडदान की सामग्री लेकर आ गये. सीता जी ने सार घटना क्रम बताते हुए कहा कि पिंडदान की सारी रस्में हो चुकी हैं. श्रीराम को वहां सब कुछ सामान्य दिख रहा था. उन्हें सीता जी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि उनके देर से आने के कारण वे व्यंग्य कर रही हैं. वह सीता जी पर बहुत क्रोधित हुए. तब सीता जी ने गवाही के लिए फाल्गु नदी, बरगद के पेड़, अग्नि, गाय, तुलसी और गया के ब्राह्मणों को बुलाया, जिनकी उपस्थिति में पिंडदान का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था.
इस पर फाल्गु नदी के साथ-साथ सभी ने लोभवश असत्य का सहारा लिया. उनके असत्य बोलने पर सीता जी क्रोधित हो उठीं. उन्होंने सभी को श्राप देते हुए फाल्गु नदी से कहा कि वह रेत के नीचे चली जाएंगी. गाय जिसने पिंडदान की स्वादिष्ट सामग्री खाने की लालच में आकर झूठ बोला था, उससे सीता जी ने कहा, तुम्हारा मुख हमेशा अपवित्र रहेगा.
इसके बाद दान-दक्षिणा की लालच में असत्य बोलने वाले ब्राह्मणों को श्राप दिया कि ब्राह्मण दान-दक्षिणा को लेकर कभी संतुष्ट नहीं हो सकेगा. तुलसी की झूठी गवाही पर सीता जी ने कहा कि वह गया में कभी पनप नहीं सकेगी. अग्नि को उनके झूठ पर, उन्हें मित्रविहीन होने का श्राप दिया. इस पूरे प्रकरण में एकमात्र बरगद के पेड़ ने सत्य बोला था. सीता जी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि यहां जो भी पिंडदान करने आएगा वह तुम्हारी पूजा अवश्य करेगा. तुम सदा हरे-भरे रहोगे.
सीता जी के श्राप का असर तुरंत हुआ. जिसका प्रमाण आज भी दिखता है. आज भी फाल्गु नदी रेत के नीचे बहती हैं. फाल्गु नदी के पानी को रेत खोद कर निकाला जाता है, इसी वजह से आज फाल्गु नदी को रेत के नीचे बहने वाली नदी के नाम से पुकारा जाता है.
गया में तुलसी की पत्तियां नहीं होने से वहां हर मौसम में मच्छरों की बहुतायत रहती है. गाय के मुख के मुकाबले उसका पिछला हिस्सा ज्यादा पवित्र माना जाता है. श्रापग्रस्त गया के ब्राह्मण भी दान-दक्षिणा से कभी संतुष्ट नहीं होते. अग्नि के पास भी कोई नहीं फटकता. वहीं रुक्मिणी तालाब के पास स्थित विशाल बरगद को आज भी अक्षय वट की तरह पूजा जाता है. उसके पत्ते हमेशा हरे भरे रहते हैं. फाल्गु नदी झारखंड की प्रमुख नदियों में से एक है. लेकिन उसे दूसरी छोटी एवं सहायक नदियों के जल पर निर्भर रहना पड़ता है. यह भी पढ़ें: लखनऊ में नवाब मोहम्मद अली शाह की बेगम ने बनवाया हनुमान मंदिर, सुनील दत्त भी यहां कुछ दिनों तक रहे थे
श्राद्ध के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से लोग फाल्गु नदी के तट पर पहुंचते हैं और पिंडदान करते हैं. वायु पुराण के अनुसार, फाल्गु नदी सदेही विष्णु गंगा है. फाल्गु नदी सीता जी द्वारा शापित है. सीता जी के श्राप से महानदी व्यर्थ होकर शून्य हो गई. मगर संयोगवश माता सीता ने इस महानदी की रेत का पिंड चढ़ाया था, इस तरह उसे इस पुण्य का लाभ भी मिला. ऐसी भी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने गया में यज्ञ की पूर्णता के बाद ऋत्विग हेतु आए ब्राह्मणों को दक्षिणा में फाल्गु नदी दी थी. जिसमें स्नान करने से 21 पीढ़ी के पितृ तृप्त और मुक्त हो ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 28, 2019 10:51 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

