Phalgun Amavasya 2024: अमावस्या-तिथि को अशुभ क्यों मानते हैं? जानें फाल्गुन अमावस्या का महत्व, मुहूर्त एवं पूजा-अनुष्ठान इत्यादि!
Phalgun Amavasya 2024 (img: File Imges)

सनातन धर्म में अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है. इस दिन गंगा-स्नान एवं भगवान विष्णु की पूजा-अनुष्ठान से जहां घर में सुख एवं समृद्धि आती है, वहीं इस दिन पितरों का तर्पण एवं श्राद्ध कर्म इत्यादि करने से पित्तरों को मुक्ति मिलती है, तथा उनके आशीर्वाद से उनके बच्चे पितृ-दोष से मुक्ति पाते हैं, क्योंकि पुराणों में अमावस्या को अशुभ भी बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन बुरी एवं नकारात्मक शक्तियां पृथ्वी पर शासन करती हैं, इसलिए अमावस्या के दिन पितरों की शांति एवं मुक्ति के लिए आवश्यक श्राद्ध कर्म अवश्य चाहिए. आइये जानते हैं कि इस वर्ष यानी 2024 में फाल्गुन मास की अमावस्या कब है, तथा क्या है इनका महत्व एवं पूजा विधि इत्यादि..

फाल्गुन अमावस्या महत्व

हिंदू धर्म शास्त्रों में फाल्गुन अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है. इस दिन पूजा अनुष्ठान करने वाले जातकों को सुख, समृद्धि के साथ कल्याण और देवताओं का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है. मान्यता है कि इस दिन पितर का अगर विधिवत श्राद्ध एवं अनुष्ठान आदि नहीं किये जाते हैं तो वे अप्रसन्न होकर वापस चले जाते हैं. मान्यता है कि पितरों के पिछले पाप कर्म एवं गल्तियों से पितृ-दोष के रूप में उनके बच्चों की कुंडली प्रतिबिंबित होती है. इस वजह से उन्हें अपने जीवन में तमाम कष्ट और बुरे परिणाम झेलने पड़ते हैं. फाल्गुन अमावस्या के दिन अनुष्ठान के जरिये इन दोषों का निवारण किया जा सकता है, इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. यह भी पढ़ें : Chanakya Niti: मूर्ख पुत्र हो या पत्नी अथवा शिष्य ऐसे लोग किसी के लिए भी घातक हो सकते हैं!

फाल्गुन अमावस्या (2024) की मूल तिथि

फाल्गुन अमावस्या की तिथि प्रारंभः 06.17 PM (09 मार्च 2024, शनिवार)

फाल्गुन अमावस्या की तिथि समाप्तः 02.29 PM (10 मार्च 2024, रविवार)

उदया तिथि के अनुसर 10 मार्च 2024 को फाल्गुन मास की अमावस्या मनाई जाएगी.

फाल्गुन अमावस्या पर पूजा-अनुष्ठान?

फाल्गुन अमावस्या को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात विष्णुजी की पूजा-अर्चना करें. तत्पश्चा नदी तट, शिव मंदिर अथवा घर में मृत परिजनों के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म प्रारंभ करें. ध्यान रहे ये कर्म संबंधित विद्वान या पुरोहित के दिशा-निर्देशन में करना चाहिए, क्योंकि पितर की मुक्ति के लिए विधि-विधान से श्राद्ध-कर्म करना चाहिए. अमावस्या पर श्राद्ध-कर्म के एक भाग में पितरों को धूप, फूल, पानी एवं जौ और दीप-दान करते हैं. तत्पश्चात तिल एवं पिण्ड का तर्पण करें. श्राद्ध के सारे कर्म-क्रिया के पश्चात ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र आदि दान करने के पश्चात स्वयं भोजन करना चाहिए. ये सारे कार्य श्रद्धापूर्वक करने से पित्तर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं.

इस दिन पीपल वृक्ष को जल अर्पित करें और दीप प्रज्वलित करें, पीपल वृक्ष के चारों ओर 11 परिक्रमा करें. मान्यता है कि ऐसा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है.