Independence Day 2025: आजादी की 78वीं वर्षगांठ! जानें उन दीवानों की कहानी, जो कुर्बानी देकर भी नजर नहीं आये कथित इतिहासकारों को!

  सैकड़ों सालों के संघर्ष और हजारों ज्ञात-अज्ञात कुर्बानियां देने के बाद ही भारत को आजादी प्राप्त हुई है. वरना इतिहास के पन्नों में तो गांधी, नेहरू, आजाद या भगत सिंह जैसे कुछ चुनिंदा नाम ही लिये जाते हैं. लेकिन इस सच को नकारा नहीं जा सकता है कि आज जिस आजादी का हम जश्न मनाने जा रहे हैं, उसके पीछे बहुत सारे अनसुने और अनकहे नायक नायिकाओं की कुर्बानियां भी हैं, जो कथित इतिहासकारों नजरों 75 साल बाद भी लोगों के लिए अनभिज्ञ हैं. आज आजादी के 78वीं वर्षगांठ के अवसर पर कुछ ऐसे ही अनछुए शख्सियतों की बात करेंगे.

ऊदा देवी पासीलखनऊ (उत्तर प्रदेश)

   ऊदा देवी पासीएक भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी थीं, जिन्होंने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय सिपाहियों की ओर से युद्ध लड़ी थीँ. ऊदा अवध के छठे नवाब वाजिद अली शाह के महिला दस्ते की सदस्य थीं. 16 नवंबर 1857 को सिकंदर बाग़ में शरण लिए दो हजार भारतीय सिपाहियों (क्रांतिकारियों) को ब्रिटिश फौज ने चारों तरफ से घेर लिया था. ऊदा देवी पुरुष वेष धारण कर एक बंदूक और कुछ गोला-बारूद लेकर वृक्ष पर चढ़कर कई ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारा. कहा जाता है कि जब तक उनके पास गोला बारूद था, ब्रिटिश सैनिक सिकंदर बाग में प्रवेश नहीं सके थे, अंततः ब्रिटिश सैनिकों ने बाग में प्रवेश किया और सभी दो हजार क्रांतिकारियों सहित ऊदा देवी भी शहीद हो गईं. यह भी पढ़ें : Motivational Quotes for International Youth Day 2025: अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर युवाओं में जोश भरने वाले कोट्स अपने इष्ट-मित्रों को भेजकर इस दिवस को सेलिब्रेट करें!

टंट्या भीलों का रॉबिन हुड

   टंट्या का जन्म खंडवा (मप्र) में हुआ था. उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा जंगलों, पहाड़ों में बीता. अंग्रेजों से वे बहुत नफरत करते थे. वह अकसर अंग्रेजों का खजाना लूटकर गरीबों में बांट देते थे. इसलिए अपने गांव में वह भीलों का रॉबिन हुड कहे जाते थे. हालांकि अंग्रेज उन्हें डाकू साबित करने से कोई कसर नहीं छोड़ते थे. टंट्या को लोग भीलों का मामा भी कहते थे, टंट्या मामा वेश बदलने में माहिर थे, वह जब भी पकड़े जाते, तो वेष बदलकर भाग जाते थे. अंततः टंट्या की सगी बहन के पति ने पैसों की लालच उन्हें गिरफ्तार करवा दिया. उन पर मुकदमा चला औऱ 1889 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया और उनके मृत शरीर को खंडवा-इंदौर रेल लाइन के किनारे पातालपानी स्टेशन के पास फेंक दिया गया.

मातंगिनी हाजरा उर्फ गांधी बुरी

मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर, 1869 को प बंगाल के तामलुक स्थित होगला गांव में हुआ था. 1905 के स्वदेशी आंदोलन, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में वह शामिल हुईं. 1933 में पुलिस द्वारा उन पर हमला किया गया था. लेकिन वह बच निकली. मातंगिनी हाजरा ‘गांधी बुरी’ के नाम से भी काफी लोकप्रिय थीं, क्योंकि वे महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रेरित थी. 29 सितंबर 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान, 73 वर्ष की आयु में, तामलुक पुलिस स्टेशन पर कब्जा करने के लिए एक जुलूस का नेतृत्व किया. ब्रिटिश पुलिस ने उन पर गोलियां चलाईं, तो वह ‘वंदे मातरम’ और ‘गांधीजी अमर रहें’ के नारे लगाते हुए शहादत दे दी.

वीर नारायण सिंह (छत्तीसगढ़)

शहीद वीर नारायण सिंह का जन्म 1795 में सोनाखान में एक जमींदार परिवार में हुआ था, लेकिन उनका हृदय हमेशा किसानों और गरीबों के लिए धड़कता था. 1856 में जब सूखे के कारण क्षेत्र में अकाल पड़ावह साहूकारों से अनाज छीनकर जरूरतमंदों में बांट देते थे. एक दिन अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. 1857 में जब भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआतब उन्होंने एक दिन अवसर पाकर जेल से भाग गये. इसके बाद वह खुलकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत पर उतर आये. उन्होंने भारी संख्या में आदिवासियों और किसानों को संगठित किया और अंग्रेजों को चुनौती दी. 10 दिसंबर, 1857 को रायपुर के जय स्तंभ चौक पर वीर नारायण सिंह को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया.

कनकलता बरुआ उर्फ वीरबाल, असम

कनकलता बरुआजिन्हें वीरबाला और शहीद के नाम से भी जाना जाता है. कनकलता बरुआ का जन्म 22 दिसंबर, 1924 को असम के दरंग जिले में हुआ था. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरानउन्होंने मृत्यु वाहिनी नामक एक समूह का नेतृत्व कियाजिसका उद्देश्य स्थानीय पुलिस स्टेशन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना था. 20 सितंबर, 1942 कोजब बरुआ और उनके साथियों ने पुलिस स्टेशन पर झंडा फहराने की कोशिश कीतो पुलिस ने उन पर गोलियां चला दींजिसमें कनकलता बरुआ शहीद हो गईं.