क्यों तमिलनाडु में रह‑रहकर उठती है हिंदी विरोध की लहर?
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें दशकों पुरानी हैं.
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें दशकों पुरानी हैं. इस पर पहले काफी हिंसा हो चुकी है. अब त्रिभाषा फार्मूले के तहत कथित तौर पर जबरन हिंदी थोपने के विरोध में एक बार फिर यह मुद्दा तेजी से उभर रहा है.तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने हाल में कहा था कि राज्य में हिंदी के लिए न कोई जगह थी, न है और न ही रहेगी. मुख्यमंत्री ने 'भाषा शहीद' के मौके पर यह बात कही थी. 'भाषा शहीद' शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया जाता है जिन लोगों ने वर्ष 1964-65 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी जान दी थी. इनमें से अधिकतर ने आत्मदाह किया था.
दिलचस्प बात है कि स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार जहां हिंदी का भारी विरोध कर रही है वहीं पूर्वोत्तर के गैर-हिंदी भाषी राज्य मिजोरम में सरकार ने अब स्कूलों में हर महीने एक दिन तमाम काम-काज हिंदी में करने का फैसला किया है. उस दिन तमाम शिक्षक और छात्र हिंदी में ही बात करेंगे.
दो-भाषा और तीन-भाषा फॉर्मूले का सवाल
तमिलनाडु सरकार ने राज्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू नहीं किया है. यह दक्षिणी राज्य दो भाषा (अंग्रेजी और तमिल) फॉर्मूले का पालन करता है जबकि नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी को भी शामिल करने की बात कही गई है. लेकिन डीएमके सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार इस नीति के जरिए राज्य पर जबरन हिंदी थोपने का प्रयास कर रही है.
मुख्यमंत्री के अलावा कई अन्य मंत्री और नेता भी अक्सर हिंदी-विरोधी टिप्पणी करते रहे हैं. सत्तारूढ़ डीएमके की सांसद कनिमोझी अक्सर राज्य में रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हिंदी के इस्तेमाल का मुद्दा उठाते हुए केंद्र पर तमिल की बजाय हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है. राज्य के मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने भी हाल हिंदीभाषी आबादी को मजदूरों से जोड़ते हुए विवादास्पद टिप्पणी की थी. पनीरसेल्वम ने कहा था, "उत्तरी भारत से लोग यहां टेबल साफ करने, निर्माण मजदूर के तौर पर काम करने और पानी पुरी बेचने जाते हैं. इसकी वजह यह है कि वो सिर्फ हिंदी जानते हैं."
सांसद दयानिधी मारन के अलावा कई अन्य नेता भी समय-समय पर हिंदी के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं. पार्टी का दावा है कि वो राज्य में तमिल के हितों की रक्षा के लिए कृतसंकल्प है और जबरन हिंदी थोपने के प्रयासों को कामयाब नहीं होने देगी. हालांकि कांग्रेस समेत कई पार्टियो के नेताओं ने पनीरसेल्वम की इस टिप्पणी का विरोध किया है. कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा है कि तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था काफी हद तक दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों पर ही निर्भर है.
केंद्र की ओर से कथित रूप से जबरन हिंदी थोपने के विरोध में राज्य में वर्ष 1938 के अलावा 1965 और 1986 में बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन हो चुके हैं. उसी दौर से राज्य में द्विभाषा फार्मूला लागू है. स्टालिन पहले भी कह चुके हैं कि तमिलनाडु में हिंदी थापना मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने जैसा होगा. लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सहयोगी रही एआईएडीएमके ने भी साफ कर दिया है कि वह राज्य की द्विभाषा नीति का ही समर्थन करती है.
हिंदी-विरोधी आंदोलन का इतिहास
तमिलनाडु में हिंदी का विरोध कोई नया नहीं है. ब्रिटिश शासनकाल के दौरान तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी सरकार ने वर्ष 1937 में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य कर दिया था. उसके खिलाफ करीब तीन साल तक आंदोलन हुआ था. पेरियार ई. वी. रामास्वामी के नेतृत्व में शुरू होने वाले उस आंदोलन में बाद सी. एन. अन्नादुरई और डीएमके कई अन्य नेताओं ने बागडोर संभाली थी.
उसके बाद जनवरी 1965 में हिंदी को भारत की एकमात्र अधिकृत सरकारी भाषा बनाने के विरोध में बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी और आत्मदाह की घटनाएं हुई थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उस दौरान महज दो सप्ताह में सत्तर से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इनमें से ज्यादातर ने आत्मदाह कर लिया था. उस दौर में यह आंदोलन छात्रों के नेतृत्व में हुआ था. तब डीएमके ने इसका खुल कर समर्थन किया था. इस आंदोलन का फायदा यह हुआ कि दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उसने कांग्रेस से सत्ता छीन ली.
उसके बाद वर्ष 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को हिंदी थोपने की कोशिश बताते हुए बड़े पैमाने पर आंदोलन चला था. उस समय राज्य के सिनेमाघरों में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर पाबंदी लगाई गई थी और हिंदी में लिखी तमाम नाम पट्टिकाओं पर कालिख पोत दी गई थी.
अब एक बार फिर त्रिभाषा फार्मूले के बहाने में हिंदी विरोध की आंच तेज हो रही है. बावजूद इस तथ्य के कि बीते कई दशकों में राज्य में जनसंख्या का संतुलन तेजी से बदला है. अब आईटी कंपनियों और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के अलावा प्रवासी मजदूरों की बड़ी आबादी राज्य में रहती है. हालांकि डीएमके अपने इस रवैए का बचाव कर रही है. पार्टी की दलील है कि तमिलनाडु में हिंदी का विरोध सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि अपनी पहचान, स्वायत्तता और राजनीतिक मुखरता से भी जुड़ा है.
राज्य के सूचना तकनीक और डिजिटल सर्विसेज मंत्री पलानीवेल थियागराजन ने पत्रकारों से कहा, "हमने किसी को हिंदी सीखने से कभी नहीं रोका है. लेकिन तमिलनाडु के बाहर की कोई ताकत यह तय नहीं कर सकती कि हम अपने स्कूलों का संचालन कैसे करें."
राजनीतिक फायदे का सौदा है हिंदी विरोध
बीते चार दशकों से राज्य की राजनीति को करीब से देखने वाली वरिष्ठ पत्रकार पी. सुब्बुलक्ष्मी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने पुराने जख्मों को हरा कर दिया है. अब डीएमके से लेकर एआईएडीएमके तक तमाम पार्टियां हिंदी विरोध की आग को हवा दे रही हैं. दरअसल, हिंदी विरोध राजनीतिक रूप से मुनाफे का सौदा है."
उनका कहना है कि इसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं और हिंदी-विरोध सबके लिए एक लोकप्रिय और पसंदीदा मुद्दा है. साठ के दशक में इसी मुद्दे ने डीएमके को सत्ता दिलाई थी. यही वजह है कि हिंदी का सबसे ज्यादा विरोध इसी दक्षिणी राज्य में होता रहा है.
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे एम.एस.राधाकृष्णन पिल्लै डीडब्ल्यू से कहते हैं, "भाषा का मुद्दा तमिलनाडु में हमेशा संवेदनशील रहा है. राज्य में बीते करीब नब्बे साल में इस मुद्दे पर कई हिंसक आंदोलन देखे हैं. अब भी यह राजनीतिक दलों के लिए एक अहम मुद्दा है. हिंदी विरोध राजनीति में सबसे ज्यादा बिकने वाला मुद्दा है. यही वजह है कि तमाम प्रमुख राजनीतिक दल समय-समय पर इस आग को हवा देते रहे हैं. अब चुनाव भी सिर पर हैं."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव तक हिंदी-विरोध का मुद्दा और तेज होने का अंदेशा है.
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 06, 2026 04:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

