मुंबई, 5 फरवरी. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Bombay ) बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने कैंसर के आधुनिक उपचार, विशेष रूप से इम्यूनोथेरेपी के लिए लैब में तैयार की जाने वाली टी-कोशिकाओं (T-cells) को सुरक्षित और कुशलता से इकट्ठा करने की एक नई विधि विकसित की है. यह शोध 'CAR T-cell' जैसी महत्वपूर्ण कैंसर थेरेपी को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
क्या है टी-सेल थेरेपी और इसकी चुनौती?
इम्यूनोथेरेपी में मरीज के खून से टी-कोशिकाएं (एक प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका) ली जाती हैं. इन्हें लैब में बड़ी संख्या में विकसित और संशोधित किया जाता है और फिर वापस मरीज के शरीर में डाला जाता है ताकि वे कैंसर से लड़ सकें. यह भी पढ़े: National Cancer Awareness Day 2025: क्या है भारत में कैंसर जागरूकता की स्थिति और चुनौतियां? जानें इस वर्ष की थीम एवं कुछ चौंकाने वाले फैक्ट्स!
चुनौती यह है कि शरीर के बाहर उगाई गई इन कोशिकाओं को बहुत सावधानी से एकत्र करना पड़ता है. यदि ये कोशिकाएं संग्रह के दौरान क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो वे मरीज के शरीर में जाकर सही से काम नहीं कर पाती हैं. आईआईटी बॉम्बे की प्रोफेसर प्रकृति तायलिया के अनुसार, "कोशिकाओं की रिकवरी कागजों पर आसान लगती है, लेकिन व्यवहार में यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है."
स्कैफोल्ड और इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीक का उपयोग
प्रोफेसर तायलिया की टीम ने शरीर के प्राकृतिक वातावरण की नकल करने के लिए 'इलेक्ट्रोस्पिनिंग' प्रक्रिया से तैयार एक विशेष 'स्कैफोल्ड' (एक प्रकार का ढांचा) का उपयोग किया. यह स्कैफोल्ड बारीक रेशों से बनी एक पतली चटाई या मछली के जाल जैसा दिखता है.
शोधकर्ताओं ने 'पॉलीकैप्रोलेक्टोन' से बने इन स्कैफोल्ड्स के अंदर मानव टी-कोशिकाओं (जुरकट टी-सेल्स) को विकसित किया. माइक्रोस्कोप से देखने पर पता चला कि कोशिकाएं इन रेशों के बीच मजबूती से जम गई थीं, जिससे उन्हें प्राकृतिक रूप से बढ़ने में मदद मिली.
'एक्यूटेस' एंजाइम से मिली बेहतर सफलता
कोशिकाओं को स्कैफोल्ड से अलग करने के लिए शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग एंजाइमों का परीक्षण किया. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला 'ट्रिप्सिन' एंजाइम कोशिकाओं के लिए कठोर साबित हुआ और इससे अधिक संख्या में कोशिकाएं मर गईं.
इसके विपरीत, 'एक्यूटेस' (Accutase) नामक एक हल्का एंजाइम बहुत प्रभावी रहा. इससे निकाली गई कोशिकाएं न केवल अधिक संख्या में जीवित रहीं, बल्कि वे स्वस्थ टी-कोशिकाओं की तरह व्यवहार भी कर रही थीं.
उपचार पर प्रभाव और भविष्य की राह
प्रोफेसर तायलिया ने बताया कि ट्रिप्सिन जैसे कठोर एंजाइम कोशिकाओं की सतह पर मौजूद उन प्रोटीनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जो इम्यून सिग्नलिंग के लिए आवश्यक होते हैं. एक्यूटेस इस समस्या से बचाने में सक्षम है.
'बायोमटेरियल्स साइंस' जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन CAR T-cell उपचार की तैयारी में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि उन्नत उपचारों को मरीजों तक पहुंचाना है, तो कोशिकाओं को उगाने और उन्हें निकालने की हर छोटी प्रक्रिया महत्वपूर्ण है.













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