टीनएज में नहीं अब छोटे छोटे बच्चों को लग रही है पोर्न की लत
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

घर घर और हर हाथ तक पहुंच रहे डिजिटल डिवाइसेज के साथ ही भारत में केवल टीनएजर्स ही नहीं बल्कि छोटे बच्चों तक भी पोर्न की पहुंच आसान हो रही है. इसका सीधा असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है.उत्तर प्रदेश के कानपुर में 13 साल और 8 साल के दो लड़कों ने कथित तौर पर पॉर्न वीडियो देखकर छह साल की बच्ची के साथ गैंगरेप किया. बच्ची के चिल्लाने की आवाज सुनकर आसपास के लोग पहुंचे और आरोपियों को पुलिस के हवाले किया. पुलिस की पूछताछ में दोनों लड़कों ने माना कि वे मोबाइल में पॉर्न वीडियो देखते हैं.

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में 13 साल के एक लड़के पर ढाई साल की बच्ची का रेप करने का आरोप है. कोरबा पुलिस के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि बच्ची के अभिभावकों की शिकायत के बाद नाबालिग आरोपी के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज किया गया है. पुलिस के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी बच्चे को मोबाइल पर पॉर्न देखने की लत है. अब उसकी काउंसलिंग की जा रही है.

सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट पवन दुग्गल भी ऐसे एक मामले के बारे में बताते हैं. पवन दुग्गल के मुताबिक, उनके पास एक केस आया था जिसमें महज साढ़े पांच वर्ष के बच्चे ने हस्तमैथुन करते हुए एक वीडियो बनाया और उसे अपने साथ पढ़ने वाली एक लड़की के नंबर पर भेज दिया.

पवन दुग्गल बताते हैं कि वीडियो देखने के बाद दोनों बच्चों के माता-पिता काफी हैरान थे. लड़के के माता-पिता को इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि बच्चा इस तरह की हरकतें कर रहा है. इस पूरे मामले में दोनों ही पक्षों के अभिभावक किसी तरह की कार्रवाई नहीं चाहते थे, लेकिन वे प्रकरण को संज्ञान में लाना चाहते थे. अब दोनों बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है.

भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में बच्चों के बीच पोर्नोग्राफी देखने के मामले बढ़ रहे हैं. इसके नकारात्मक प्रभावों की सूची भी लंबी है. कई देशों ने पोर्नोग्राफी को बच्चों की पहुंच से दूर करने के लिए कुछ प्रभावी कदम उठाए हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में इसपर लगाम कस पाना एक चुनौती से कम नहीं है.

उत्तर प्रदेश और केरल के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में बतौर मनोचिकित्सक अपनी सेवाएं दे चुके डॉ. जयनाथ भंडारा पुराइल कहते हैं कि पोर्नोग्राफी की लत का पता चलने पर प्रोफेशनल या चिकित्सकीय मदद जरूरी है. अगर समय पर सहायता न ली जाए, तो इसके परिणाम घातक भी हो सकते हैं. किशोरों में अवसाद, अपराधबोध और अकेलेपन की भावना घर कर सकती है. इसके अलावा वे अपनी पढ़ाई, शौक या दोस्तों और परिवार से दूरी बढ़ाना भी शुरू कर देते हैं. स्कूल और खेलकूद की गतिविधियों में रुचि कम होने लगती है और उनके प्रदर्शन पर भी असर पड़ता है. डॉ. पुराइल बताते हैं, "समुचित सहायता न मिलने पर किशोरों में सेक्शुअल डिसफंक्शन, यानी यौन विकार जैसी कुछ अन्य शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं."

कैसे लगती है पोर्नोग्राफी की लत?

इस समय ब्रिटेन के सीएनटीडब्ल्यू एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के जनरल एडल्ट सायकेट्री विभाग में कार्यरत डॉ. पुराइल बताते हैं कि पॉर्न की लत कई कारणों से हो सकती है. मनोवैज्ञानिक कारणों की बात करें, तो बचपन में ही यौन सामग्री यानी सेक्शुअल कंटेंट का आसानी से मिलना सबसे अहम है. इसके अलावा चिंता, अवसाद या तनाव से जूझने पर भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है. किशोरों में हमउम्र साथियों के कारण भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है. साथियों के प्रभाव में किशोर पोर्न को देखना शुरू करते हैं और धीरे-धीरे इसके लती हो जाते हैं. उन्हें ये लत सामान्य लगने लगती है.

उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, "पोर्नोग्राफी की लत एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति बार-बार अश्लील सामग्री देखने की आदत में इस हद तक उलझ जाता है कि अपनी आदतों पर नियंत्रण खो बैठता है. यह उसकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति को प्रभावित करने लगता है. इस लत में व्यक्ति अपने काम, पढ़ाई और रिश्तों को नुकसान पहुंचाने लगता है." इसके अन्य कारणों के बारे में डॉ. पुराइल बताते हैं, "आजकल किशोरों में सेक्स हॉर्मोन, जैसे कि एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन के स्तर जल्दी बढ़ने लगे हैं. इसके कारण उनकी यौन इच्छा बढ़ जाती है. इसके चलते भी वे पोर्नोग्राफी वीडियो देखने के लती होने लग जाते हैं."

इसके अलावा इंटरनेट की सहज उपलब्धता और पॉर्न साइट्स की संख्या में हो रही वृद्धि भी बड़ी वजह है. ऐसे कॉन्टेंट आसानी से मोबाइल फोन और लैपटॉप पर पहुंच जाते हैं. एडवोकेट पवन दुग्गल बताते हैं कि वर्तमान में जिस तरह दुनिया डिजिटाइजेशन की ओर जा रही है, उसके फायदों के साथ नुकसान भी सामने आ रहे हैं. वह बताते हैं, "मेरे पास ही एक ऐसा मामला आया, जिसमें आठ साल के बच्चे ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अपनी ही टीचर का एक अश्लील वीडियो बनाया. इसके बाद उसने अपने स्कूल के ही अन्य टीचरों की मेल आईडी पर वह वीडियो भेजा. यह कंटेंट पूरी तरह से डीप फेक पर आधारित था."

क्या होता है हेल्दी-पोर्न, विशेषज्ञों ने बताया है

डिजिटल तरक्की के कारण असली कंटेंट के साथ डीप फेक और एआई जनरेटेड कंटेंट आसानी से उपलब्ध हैं और बच्चों तक भी पहुंच रहे हैं. एआई का आसानी से इस्तेमाल कर अश्लील सामग्री बनाई जा सकती है. जरूरी है कि इस दिशा में बच्चों के भीतर जागरूकता बढ़ाई जाए.

पोर्नोग्राफी की लत किशोरों के जीवन पर जितना नकारात्मक असर डालती है, उसे लक्षणों के आधार पर पकड़ना उतना ही मुश्किल भी होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर देखा जाता है कि पोर्नोग्राफी के लती किशोरों में झूठ बोलने, पॉर्न देखने की आदत छिपाने और ब्राउजिंग हिस्ट्री मिटाने की कोशिश होती है. इसके बावजूद लती किशोरों में कुछ मनोवैज्ञानिक लक्षण पहचाने जा सकते हैं. पोर्नोग्राफी के लती किशोरों से इस बारे में पूछे जाने पर आमतौर पर उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा देखने को मिलता है. डॉ. पुराइल बताते हैं कि पॉर्न देखने की मनाही पर प्रभावित किशोर आक्रामक या उदासीन हो सकता है. कुछ टीनएजर्स अपना मूड बदलने या तनाव कम करने के लिए पॉर्न देखते हैं. लती होने के बाद उनमें पॉर्न देखने की तीव्र इच्छा होने लगती है.

बच्चों को पोर्न से दूर रखने के लिए क्या किया जा सकता है

एडल्ट कंटेंट और पोर्नोग्राफी देखने की लत के बाद बच्चे ने कुछ गलत कदम उठाए यह बात तो खबरों में आ जाती है, लेकिन यह स्थिति शुरू कहां से हुई, इस पर कोई बात नहीं करता. इस पर बच्चों की काउंसलिंग करने वाली साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर कुमुद श्रीवास्तव कहती हैं कि इसका सबसे बड़ा करण सोशल मीडिया एक्स्पोजर है और ये बड़े ही नहीं छोटे शहरों में भी काफी आम बात हो गई है.

25 वर्षों के अनुभव के साथ डॉ. कुमुद सीबीएसई में काउंसलिंग करती हैं, साथ ही वहां की रिसोर्स पर्सन भी है. बच्चों में एडोलसेंट एजुकेशन की कमी और पैरेंटल गाइडेंस न होना उन्हें इस लत की ओर बढ़ता है. वह कहती हैं, "आजकल स्कूलों में कई ऐसे प्रोजेक्ट या होमवर्क दिए जाते हैं जिसमें इंटरनेट से जानकारियां लेनी पड़ती हैं. पेरेंट्स बच्चों को गूगल की वेबसाइट खोलकर उन्हें इससे जानकारी लेने की आजादी देते हैं. कई बार इन वेबसाइटों के किनारे पर कुछ ऐसे एडल्ट कंटेंट भी होते हैं जिन पर बच्चे गलती से या जानबूझकर क्लिक करते हैं ताकि इसके बारे में उन्हें पता चले. पेरेंट्स अगर इस बात पर ध्यान दें कि बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है और उसकी पहुंच किस स्तर तक हो रही है तो ऐसी स्थितियों से काफी हद तक बचा जा सकता है."

कई बार पेरेंट्स अपने बच्चों के दोस्त बनकर रहना चाहते हैं और इस चक्कर में बच्चे उन सीमाओं को पार कर जाते हैं जिनसे पोर्नोग्राफी की लत होने जैसी स्थितियों का जन्म हो सकता है. पेरेंट्स को लगता है कि हमारा बच्चा ऐसा कुछ नहीं करेगा, लेकिन उनके बीच की हिचक खत्म हो जाने से डर भी खत्म हो जाता है और बच्चे आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त होने की कगार पर पहुंच जाते हैं. तब पेरेंट्स कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि बच्चा कब बड़ा हो गया.

इसके अलावा कई बार बच्चे अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस करते हैं जिसे वह सही समय पर किसी से साझा नहीं कर पाते. हार्मोनल बदलाव के चलते वह पोर्न देखने की कोशिश करते हैं. डॉ. कुमुद कहती हैं, "बच्चे सोचते हैं कि एक बार देख लेता हूं, किसी को पता नहीं चलेगा, लेकिन यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे आदत बन जाती है." डॉ कुमुद के पास काउंसलिंग के लिए कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें टीनएज लड़के 'लेडीज टॉयलेट' में ताक-झांक करने के आदी, लड़कियों के पास 'लड़कों को लुभाने के लिए टिप्स' वाली पर्चियां और हमउम्र बच्चों की ओर से चुनौती मिलने पर छेड़छाड़ करने तक के केस सामने आये हैं.

बच्चों के दिमाग को तबाह कर रही है ऑनलाइन पोर्नोग्राफी

अमेरिका और यूरोप समेत विश्व के कई देशों ने बच्चों की पोर्नोग्राफी की लत से बचने के लिए एज वेरिफिकेशन टूल लागू किया है. इसके तहत पॉर्न वेबसाइट पर जाते ही यूजर को अपनी उम्र बताने वाले किसी प्रमाण पत्र को अपलोड करना होगा. अगर यूजर 18 वर्ष से ज्यादा उम्र का होगा, तभी उसे पॉर्न वेबसाइट पर आगे बढ़ने की अनुमति मिलेगी. विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में उम्र सत्यापन की प्रक्रिया को लागू करना एक बहुत बड़ी चुनौती है. डीप फेक, एआई और फर्जी प्रमाण पत्र के कारण यहां इसका तोड़ निकालना काफी आसान है.

पोर्नोग्राफी की आदत लगने के बाद मरीज को टॉकिंग थैरपी, इंडिविजुअल थैरपी, कॉग्नीटिव बिहेवियरल थैरपी, ग्रुप थैरपी और फैमिली थैरपी जैसी कई मनोवैज्ञानिक चिकित्सा की सहायता दी जाती है. डॉ. जयनाथ रेखांकित करते हैं कि मनोवैज्ञानिक तौर पर लती मरीजों की मदद करना ही सबसे अहम इलाज माना जा सकता है. इलाज में अन्य विकल्पों के तौर पर एक्सेप्टेंस एंड कमिटमेंट थैरपी, माइंडफुलनेस बेस्ड इंटरवेंशन्स और सपोर्ट ग्रुप्स की मदद ली जा सकती है. इसके अलावा लक्षणों के आधार पर दवा और अन्य उपचार किया जा सकता है.

पॉर्न को लेकर भारत में क्या है सजा का प्रावधान

एडवोकेट पवन दुग्गल बताते हैं कि पोर्नोग्राफी को लेकर आईटी ऐक्ट में कई तरह की सजा के प्रावधान हैं. कानून के तहत पोर्नोग्राफी के प्रसारण, वितरण या उसे बेचने के अपराध के लिए तीन साल की सजा और पांच लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.

यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी अश्लील सामग्री को रिकॉर्ड या प्रकाशित करता है, जिसमें सेक्शुअल इंटरकोर्स हो तो धारा 67(A) के तहत पांच साल की सजा और 10 लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान है. चाइल्ड पोर्नोग्राफी भी दंडनीय अपराध है. चाइल्ड पोर्नोग्राफी के तहत शूट करना, या शूटिंग में मदद करना, या फिर अगर कोई उस कंटेंट को देखता पाया जाता है, तो भी यह ज्यादा गंभीर अपराध बन जाता है. इस तरह के अपराध में जमानत नहीं दी जाती. इसके अलावा पोक्सो ऐक्ट में भी ऐसे अपराध के लिए सजा के प्रावधान हैं.

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विमलेश निगम बताते हैं कि कानून में नाबालिगों को अश्लील सामग्री उपलब्ध कराने पर कठोर दंड का प्रावधान है. वह बताते हैं कि पॉर्न कंटेंट को बच्चों-किशोरों की पहुंच से दूर रखने व उनकी डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एज वेरिफिकेशन कानून को प्रभावी तरीके से लागू करना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. इसे लागू करने के लिए कानूनी, तकनीकी और सामाजिक स्तरों पर समन्वय के प्रयास आवश्यक हैं. बच्चों की सुरक्षा के लिए अब डिजिटल दीवारों को भी मजबूत करना होगा.

एडवोकेट पवन दुग्गल कहते हैं कि बच्चे ऑनलाइन दुनिया के अलग-अलग पहलुओं के संपर्क में आते जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें इसकी कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में भी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए. जरूरी है कि शुरुआती कक्षाओं से ही बच्चों को डिजिटल प्राइवेसी, डिजिटल टूल और एआई समेत साइबर सिक्यॉरिटी के बारे में पढ़ाया जाए. पवन दुग्गल बताते हैं, "आज एआई चारों ओर फैल गया है. आने वाले समय में बच्चे भी एआई के युग में ही जन्म लेंगे. उन्हें इसके नकारात्मक प्रभाव से बचना जरूरी है."

वह सलाह देते हैं कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में साइबर हाइजीन, साइबर लॉ, एआई और साइबर रेजिलिएंस पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. साइबर रेजिलिएंस कहता है कि साइबर सुरक्षा में सेंध तो लगेगी ही, लेकिन जरूरी है कि उस सेंधमारी से बचने के लिए ठोस उपाय किए जाएं ताकि आने वाली पीढ़ी बेहतर एआई नागरिक बनकर उभरे. पवन दुग्गल कहते हैं, "अगर हम तक एआई की पहुंच इतनी आसान है तो उसके परिणाम, चुनौतियां और दुष्परिणामों की जानकारी भी उतनी ही आसानी से पहुंचनी चाहिए."