जैसे-जैसे अमेरिका कई संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और वैश्विक संस्थानों से पीछे हट रहा है, वैसे-वैसे चीन कूटनीतिक तौर पर अधिक सक्रिय हो रहा है और कई जगहों पर नेतृत्व हासिल करने की कोशिश कर रहा है.इस साल की शुरुआत में अमेरिका ने 66 बहुपक्षीय संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा की. 29 जनवरी को चीन ने कनाडा, फिनलैंड और ब्रिटेन के नेताओं की मेजबानी की. चीनी बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर से कहा, "मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था काफी दबाव में है.” उन्होंने इरादा जताया कि दुनिया में एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जहां सभी देशों के साथ "बराबरी का व्यवहार हो और आपसी संतुलन हो.”
इस तरह का संदेश चीन की कूटनीतिक रणनीति में नया नहीं है. लेकिन बहुपक्षीय संस्थानों से अमेरिका के पीछे हटने के बीच यह रणनीति और ज्यादा साफ हो गई है. अब अमेरिका जलवायु परिवर्तन, श्रम और प्रवासन से जुड़ी कई पहलों को त्याग रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इन क्षेत्रों को "वोक” पहल बताते हुए कहा कि यह देश के "हितों के खिलाफ” हैं.
वहीं दूसरी ओर, चीन अब भी ज्यादातर बहुपक्षीय संगठनों का सदस्य बना हुआ है और उसे वैश्विक स्तर पर पहले से कहीं ज्यादा मान्यता मिल रही है. यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के हालिया अंतरराष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक लोगों ने माना है कि आने वाले दशकों में चीन का वैश्विक प्रभाव बढ़ने वाला है. इस सर्वे में 10 यूरोपीय संघ के सदस्य देशों समेत कुल 21 देशों के लोग शामिल थे.
बर्लिन स्थित मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइना स्टडीज के विश्लेषक, क्लाउस सोंग ने डीडब्ल्यू से कहा, "पहले चीन और अमेरिका के बीच ताकत का अंतर साफ तौर पर दिखता था, लेकिन अब यह अंतर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है.” उन्होंने आगे कहा, "अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बना हुआ है, लेकिन चीन काफी तेजी से उसकी बराबरी कर रहा है.”
चीन की वैश्विक रणनीति में ग्लोबल साउथ कितना अहम
ग्लोबल साउथ यानी दुनिया के विकासशील और उभरते हुए देशों का समूह. काफी लंबे समय से यह देश चीन की वैश्विक रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं. जैसे, चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई), जो 2013 में शुरू किया गया था. इस योजना के तहत चीन ने एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश किए थे, ताकि वह अपना वैश्विक प्रभाव बढ़ा सके.
क्लाउस सोंग का कहना है, "किसी भी नेता को अपने नेतृत्व को सही ठहराने और मजबूत करने के लिए समर्थकों की जरूरत होती है.” उनके मुताबिक, पश्चिमी देशों के दबाव और चीन को रोकने की कोशिशों के बीच ग्लोबल साउथ का समर्थन चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
ट्रंप का ऐसा असर, अब ब्रिटेन भी चीन से रिश्ते सुधारने चला है
इस साल की शुरुआत में चीन ने कुछ ऐसे आंकड़े जारी किए, जो साफ संकेत देते हैं कि अमेरिका के बढ़ते दबाव (खासकर ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान) के बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था मजबूती से टिकी हुई है. आंकड़ों के अनुसार, 2025 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर पांच प्रतिशत रही और उसका व्यापार सरप्लस भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. माना जा रहा है कि इस मजबूती के पीछे गैर-अमेरिकी बाजार निर्णायक भूमिका में रहे, खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया को बढ़ा निर्यात इसके पीछे एक बड़ी वजह रही.
हालांकि, चीन की इस रणनीति के साथ कई जोखिम भी जुड़े हैं. पिछले कुछ सालों में चीन ने अब बीआरआई के तहत बड़े और महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से दूरी बनानी शुरू कर दी है और छोटे निवेशों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है. इसकी एक बड़ी वजह बढ़ते वित्तीय जोखिम हैं. चूंकि, साझेदार देशों में चिंता है कि कहीं वे भारी कर्ज के बोझ में न फंस जाएं. सोंग के अनुसार, "अर्थव्यवस्था एक बड़ा सवाल है. चीन की आर्थिक मजबूती कितनी लंबे समय तक टिकी रहती है? चीन अपने साझेदार देशों को और क्या देने को तैयार है?”
रूस और उत्तर कोरिया के साथ चीन का ‘लेन-देन' का रिश्ता
रूस और उत्तर कोरिया के साथ चीन के करीबी रिश्तों ने यह चिंता भी बढ़ा दी है कि सत्तावादी देशों के बीच गहरी साझेदारी का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा.
पिछले साल बीजिंग में हुई एक सैन्य परेड के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस और उत्तर कोरिया के नेताओं से मुलाकात की. इस मुलाकात ने इन दोनों पड़ोसी देशों के साथ चीन के राजनीतिक और सुरक्षा तालमेल को साफ तौर पर उजागर किया.
हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के शांति और सुरक्षा नीति संस्थान की शोधकर्ता, साबीने मोकरी के मुताबिक, चीन के लिए हर सत्तावादी साझेदार की भूमिका अलग है. उन्होंने कहा, "चीनी सरकार यह समझने की कोशिश कर रही है कि वह हर शासन से क्या हासिल कर सकते हैं.”
इस तालमेल का साफ उदाहरण संयुक्त राष्ट्र महासभाओं में देखने को मिलता है. जहां, चीन हाल के वर्षों में अपने सहयोगी देशों के साथ कई बार एक जैसा वोट करता दिखा है, खासकर मानवाधिकार और यूक्रेन से जुड़े प्रस्तावों पर. हालांकि, मोकरी का मानना है कि यह साझेदारी ज्यादातर लेन-देन पर आधारित है. जिसका मतलब हुआ कि यह साझेदारी साझा मूल्यों पर नहीं, बल्कि अमेरिका के विरोध जैसे साझा हितों पर आधारित है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "जब भी यह दिखाने का कोई भी मौका मिलता है कि वह एक साथ हैं, तो वह इस मौके का पूरा फायदा उठाते हैं. लेकिन जब बात असल मुद्दों की आती है, तो वह आपसी भरोसा नहीं दिखा पाते हैं.”
अमेरिका की जगह लेने की जल्दबाजी में क्यों नहीं है चीन
हाल के वर्षों में चीन इस बात पर जोर देता रहा है कि वह दुनिया में स्थिरता लाने वाली एक जिम्मेदार ताकत है, खासकर अमेरिका के उस रवैये की बजाय, जिसे वह "वर्चस्ववादी” कहता है.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग का असल मकसद अमेरिका की अगुवाई वाली वैश्विक व्यवस्था की जगह अपनी व्यवस्था थोपना नहीं है. इसके बजाय, चीनी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में बनी रहे.
मोकरी ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह दुनिया पर कब्जा करने जैसा महत्वाकांक्षा नहीं है.” उनका कहना है कि चीन के हर कदम को "हमेशा शासन में टिके रहने के नजरिए से समझना चाहिए. उन्होंने उदाहरण के तौर पर ट्रंप के पहले कार्यकाल (2016–2020) का जिक्र किया, जब अमेरिका कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकला था. उस समय यह उम्मीद की जा रही थी कि चीन आगे बढ़कर नेतृत्व संभालेगा, लेकिन चीन ने ज्यादातर मामलों में ऐसी भूमिका से खुद को दूर ही रखा.
क्या ट्रंप के नए टैरिफ से चीन की जेब पर असर पड़ेगा?
शोधकर्ता क्लाउस सोंग भी इस बात से सहमत हैं. उनका कहना है कि जिन वैश्विक संस्थानों से अमेरिका बाहर निकला है, उनमें से किसी में भी चीन नेतृत्व संभाले, इसकी संभावना कम ही नजर आती है. चीन केवल तभी आगे आएगा, जब ऐसा करना उसके राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से जुड़ा होगा.
इस बात को विश्व स्वास्थ्य संगठन में चीन के प्रभाव से भी समझा जा सकता है. यहां ताइवान, जिसे चीन अपना हिस्सा मानता है, उसे अब भी संगठन से बाहर रखा गया है. अमेरिका ने ताइवान को शामिल न किए जाने के मुद्दे को बार-बार उठाया है, खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान, और इसे संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी से हटने के अपने फैसले की एक अहम वजह भी बताया है.
एशिया में धीरे-धीरे कम हो रहा अमेरिका का प्रभाव
विश्लेषकों का कहना है कि चीन का यह चुनिंदा और सीमित जुड़ाव उसके बड़े मकसद को दिखाता है. उसका लक्ष्य पूरी वैश्विक व्यवस्था पर हावी होना नहीं है, बल्कि उन इलाकों में अमेरिका के प्रभाव को कम करना है, जिन्हें वह रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानता है, खासकर एशिया-प्रशांत का इलाका.
हाल के महीनों में चीन ने ताइवान के आसपास और दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज की हैं. दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच क्षेत्रीय दावों को लेकर तनाव भी बढ़ा है.
मोकरी के मुताबिक, "चीन के लिए यह बेहद संतोषजनक होगा अगर वह एशिया में जो चाहे, वह कर सकेगा.” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी "बुनियादी” तौर पर इतनी मजबूत है कि "उसे हटाना इतना आसान नहीं है.”












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