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जेन-जी वाली नेपाल सरकार से कैसे होंगे भारत के रिश्ते

नेपाल चुनाव जीत कर भावी सरकार बनाने वाली आरएसपी के साथ संबंधों को लेकर भारत में उम्मीदें हैं तो कुछ आशंकाएं भी हैं.

जेन-जी वाली नेपाल सरकार से कैसे होंगे भारत के रिश्ते
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

नेपाल चुनाव जीत कर भावी सरकार बनाने वाली आरएसपी के साथ संबंधों को लेकर भारत में उम्मीदें हैं तो कुछ आशंकाएं भी हैं. इसकी वजह है प्रधानमंत्री बनने जा रहे जेन-जी नेता बालेन शाह के पिछले कुछ बयान.लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पर्वतीय राज्य नेपाल की जनता ने इस बार एक नई पार्टी और युवा चेहरों को देश की कमान तो सौंप दी है. लेकिन पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा बने बालेन शाह के पिछले बयानों और टिप्पणियों के कारण आपसी संबंधों के मामले में भारत 'वेट एंड वाच' की नीति पर आगे बढ़ रहा है.

भारत सरकार ने नेपाल में युवा राजनीतिक पार्टी को उसकी कामयाबी के लिए बधाई देते हुए क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए उसके साथ मिल कर काम करने का संकल्प तो जताया है. लेकिन उसकी निगाहें अब नई सरकार की नीतियों पर टिकी हैं. के.पी. शर्मा ओली की सरकार के दौरान कई वजहों से दोनों देशों के आपसी संबंधों में दूरियां काफी बढ़ गई थी. इस दौरान चीन की बढ़ती पैठ ने तो भारत की चिंता बढ़ाई ही, कुछ सीमावर्ती इलाकों पर उपजे विवाद ने भी खाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई.

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एक रैपर से राजनेता और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के प्रधानमंत्री पद का चेहरा बने बालेन शाह के पिछले काम और बयान भारत के हित में नहीं रहे हैं. डॉनल्ड ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' की तर्ज पर 'नेपाल फर्स्ट' की नीति पर चलने वाले बालेन शाह की पहचान कभी भारत समर्थक के तौर पर नहीं रही है. इसके उलट वो लगातार भारत की आलोचना कर नेपाल में अपनी लोकप्रियता और छवि को बढ़ाते-चमकाते रहे हैं.

करीब तीन साल पहले उन्होंने काठमांडू के मेयर के तौर पर अपने दफ्तर में एक विवादित नक्शा टांगा था. शाह ने उस नक्शे को सोशल मीडिया पर भी शेयर किया था. उसमें पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को ग्रेटर नेपाल का हिस्सा बताया गया था. हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय के तीखे विरोध के बाद उस नक्शे से संबंधित पोस्ट फेसबुक से हटा दी गई थी.

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उन्होंने बीते साल नवंबर में भी अमेरिका, चीन और भारत के खिलाफ फेसबुक पर एक विवादास्पद पोस्ट के जरिए राजनयिक विवाद पैदा कर दिया था. उसकी काफी आलोचना हुई थी. शाह वर्ष 1806 की सुगौली संधि के भी मुखर आलोचक रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषक के.पी. प्रधान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "नेपाल में हाल के वर्षों में सत्ता में रहीं सरकारों का झुकाव चीन की ओर बढ़ा है. लेकिन बालेन शाह से भारत और चीन के साथ संबंधों में संतुलन कायम रखने की उम्मीद है." उनका कहना है कि दरअसल नेपाल में पिछले साल हुए आंदोलन और उसके बाद चुनाव के जरिए हुए इस बदलाव के दौरान भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार और बेरोजगारी जैसे मुद्दे ही सुर्खियों में रहे हैं. आंदोलनकारियों के एजेंडे में विदेश नीति का मुद्दा हाशिए पर ही रहा था. लेकिन अब सत्ता में आने के बाद युवा पीढ़ी की सरकार को विदेश नीति को प्राथमिकता देनी होगी.

नेपाल के लिए भारत हमेशा जरूरी रहेगा

विश्लेषकों का कहना है कि नई सरकार को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि विभिन्न वजहों से उसके लिए भारत ज्यादा जरूरी है. बालेन शाह ने अपने चुनाव अभियान के दौरान और नतीजों के बाद संतुलित कूटनीति अपनाने की बात कही है. वो पहले की वामपंथी सरकारों के कार्यकाल में नेपाल में चीन के लगातार बढ़ते दबदबे को कम करने के लिए भी ठोस कदम उठा सकते हैं.

आंकड़ों के लिहाज से भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है. इस लिहाज से चीन दूसरे नंबर पर जरूर है, लेकिन पहले और दूसरे नंबर के बीच बहुत लंबा फासला है.

नेपाल में भारतीय सीमा से सटे झापा जिले में नेपाल की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव सिलीगुड़ी स्थित संवेदनशील चिकन नेक से सटा है. यह भारत की चिंता का प्रमुख कारण है. इसी वजह से उसकी निगाहें नेपाल की नई सरकार की नीतियों पर टिकी हैं. आरएसपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भारतीय रुपए के साथ विनिमय दर की समीक्षा की बात कही थी. बीते करीब 33 वर्षो से यह दर स्थिर है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षो में भारत-विरोधी बयान देकर देश में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना नेपाल के नेताओं का मशहूर शगल रहा है. बालेन शाह भी अपवाद नहीं हैं. लेकिन अब सरकार के मुखिया के तौर पर पिछले बयानों की वजह से उनको भारत विरोधी मान लेना जल्दबाजी होगी.

चुनाव में 'नेपाल फर्स्ट' का नारा दिया था

झापा जिले के एक राजनीतिक विश्लेषक ज्ञानेंद्र शर्मा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बालेन शाह अतीत में चाहे जैसे बयान देते रहे हों, उनको दोनों ताकतवर पड़ोसियों यानी भारत और चीन से समान दूरी बना कर चलने वाला नेता माना जाता है. नेपाल के हितों को प्राथमिकता देकर अपनी राष्ट्रवादी छवि को मजबूत करने के लिए उन्होंने चुनाव में 'नेपाल फर्स्ट' का नारा दिया था. यह काफी लोकप्रिय रहा था." शर्मा का कहना था कि बालेन शाह अपने चुनाव अभियान के दौरान भारत-विरोधी टिप्पणी करने से बचते रहे. इससे साफ है कि सत्ता संभालने के बाद वो नेपाल के हितों को ध्यान में रखने के साथ ही भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर देंगे.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पूर्व प्रोफेसर डा. अनिता लामा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "नेपाल रोजगार से लेकर व्यापार तक विभिन्न क्षेत्रों में भारत पर निर्भर है. ऐसे में भारत से रिश्ते सुधारना बहुमत वाली सरकार के लिए प्राथमिकता होगी." उनके मुताबिक, बालेन शाह भले पहले भारत-विरोधी बयान देते रहे हों, सत्ता में आने के बाद उनके लिए भारत की अनदेखी करना संभव नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि वो नेपाल के लिए भारत की अहमियत बखूबी जानते-समझते हैं. ऐसे में उनके टकराव की बजाय दोस्ती और संबंधों में संतुलन बनाने की राह पर चलने की उम्मीद है.

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "भारत ने नेपाल की नई सरकार के साथ मिल कर काम करने की इच्छा जरूर जताई है. लेकिन वह 'वेट एंड वाच' की नीति पर बढ़ रही है. सरकार यह देखना चाहती है कि नई सरकार सीमा विवाद और चीन के बढ़ते असर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर किस तरह आगे बढ़ती है."

कुछ अन्य राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल की नई सरकार के साथ संबंधों में बेहतरी के लिए भारत को भी बिग ब्रदर वाली मानसिकता से बचना चाहिए. नेपाल में भारत के इस कथित रवैए के कारण ही आम लोगों में उसके खिलाफ नाराजगी बढ़ती रही है. सरकार को युवा नेतृत्व के साथ तालमेल रखते हुए आपसी संबंधों को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.

शिखा कहती हैं, "नेपाल में सत्ता में आने वाले युवा नेतृत्व से ज्यादा वैचारिक या सैद्धांतिक होने की उम्मीद करना बेमानी है. वो जिन वादों के साथ जीत कर सत्ता तक पहुंची है उसमें उसके सामने तमाम मुद्दों पर व्यवहारिक रवैया अपनाना ही एकमात्र विकल्प है."

(The above story first appeared on LatestLY on Mar 09, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).