अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने लगाए गए एक खास तरह के टैक्स, जिसे 'टैरिफ' कहते हैं, को बचाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं. यह मामला इतना बड़ा है कि इसका असर खरबों डॉलर के वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है और यह भी तय करेगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कितनी ताकत है.
आखिर पूरा मामला क्या है?
सीधे शब्दों में कहें तो, डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए दूसरे देशों से अमेरिका आने वाले ज्यादातर सामान पर भारी टैक्स लगा दिया था. इसके लिए उन्होंने 1977 के एक पुराने कानून का सहारा लिया, जो राष्ट्रपति को "राष्ट्रीय आपातकाल" की स्थिति में कुछ विशेष शक्तियां देता है.
लेकिन कुछ अमेरिकी राज्यों और व्यापारिक कंपनियों को यह बात पसंद नहीं आई. वे इस मामले को लेकर अदालत चले गए. हाल ही में, एक निचली अपील अदालत ने फैसला सुनाया कि ट्रंप ऐसा नहीं कर सकते. अदालत ने कहा कि 1977 का कानून राष्ट्रपति को आपातकाल में कई अधिकार देता है, लेकिन उसमें सीधे तौर पर अपनी मर्जी से इतना भारी टैक्स या टैरिफ लगाने का अधिकार शामिल नहीं है.
यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
इस केस के नतीजे का असर बहुत बड़ा होगा.
- अरबों-खरबों का सवाल: अगर सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप यह केस हार जाते हैं, तो अमेरिका को उन कंपनियों को अरबों डॉलर वापस लौटाने पड़ सकते हैं, जिनसे यह टैरिफ वसूला गया है.
- व्यापार पर असर: अमेरिका में आयात होने वाले सामान पर लगने वाला औसत टैक्स रेट (लगभग 16.3%) आधा हो सकता है. इससे ट्रंप ने दूसरे देशों के साथ जो व्यापारिक समझौते किए हैं, वे भी खटाई में पड़ सकते हैं.
- राष्ट्रपति की ताकत: यह फैसला भविष्य के लिए यह तय करेगा कि कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति आपातकाल के नाम पर अपनी आर्थिक शक्तियों का कितना इस्तेमाल कर सकता है.
ट्रंप प्रशासन की क्या दलील है?
ट्रंप और उनके वकील सुप्रीम कोर्ट से कह रहे हैं कि निचली अदालत का फैसला गलत है. उनका मानना है कि अगर यह फैसला लागू हो गया तो अमेरिका व्यापारिक बातचीत में "निहत्था" हो जाएगा. वे कहते हैं कि दूसरे देश अमेरिका की अर्थव्यवस्था को अपनी मनमानी से चलाएंगे. उनकी दलील है कि 1977 के कानून में जब राष्ट्रपति को "आयात को रेगुलेट करने" की शक्ति दी गई है, तो उसका मतलब टैक्स लगाना भी होता है.
आगे क्या होगा?
ट्रंप की टीम चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई बहुत तेजी से करे, हो सके तो इसी साल नवंबर में. अगर अदालत इसके लिए राजी हो जाती है, तो साल के अंत तक फैसला आ सकता है. हालांकि, सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि वह इस केस को सुनने के लिए तैयार है भी या नहीं.
कुल मिलाकर, यह सिर्फ एक टैक्स की लड़ाई नहीं है. यह अमेरिकी संविधान, राष्ट्रपति की शक्तियों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा एक बहुत बड़ा कानूनी दांव-पेंच है. अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह इस पर क्या फैसला सुनाता है.













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