उत्तर कोरिया ने इस साल का पहला बलिस्टिक मिसाइल टेस्ट किया. इसे शक्ति प्रदर्शन और चेतावनी की कोशिश माना जा रहा है. प्योंगयांग की टाइमिंग में दो खास बातें हैं. वेनेजुएला और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की चीन यात्रा.उत्तर कोरिया ने 4 जनवरी को बलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया. दक्षिण कोरिया की सेना ने यह जानकारी दी. आज ही दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जेइ म्यूंग, कारोबारी और टेक लीडरों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन पहुंचे हैं. उनके चीन पहुंचने से कुछ ही घंटे पहले प्योंगयांग ने 2026 का अपना पहला मिसाइल लॉन्च किया.
जापान ने बताया, शांति और स्थिरता के लिए खतरा
दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि स्थानीय समय के अनुसार सुबह करीब 7:50 बजे कई प्रोजेक्टाइल्स, जो अनुमानित रूप से बलिस्टिक मिसाइल थे छोड़े गए. इन्हें प्योंगयांग के नजदीक से छोड़ा गया था. दक्षिण कोरिया की सेना के मुताबिक, ये मिसाइल तकरीबन 900 किलोमीटर तक उड़कर गए.
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मिसाइल लॉन्च के बाद दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने आपातकालीन बैठक बुलाई. जापानी रक्षा मंत्रालय ने भी एक संभावित बलिस्टिक मिसाइल को देखने की बात कही है. रक्षा मंत्री सिंजिरो कूइजमी ने प्योंगयांग के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को अपने देश व अंतरराष्ट्रीय समुदाय की शांति और स्थिरता के लिए खतरा बताया.
मिसाइल से क्या संदेश देना चाहता है उत्तर कोरिया?
इससे पहले प्योंगयांग ने 7 नवंबर 2025 को बलिस्टिक मिसाइल लॉन्च किया था. यह परीक्षण अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा दक्षिण कोरिया को न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन बनाने की मंजूरी देने के बाद किया गया था. कई विश्लेषकों ने संभावना जताई है कि प्योंगयांग के ताजा लॉन्च के पीछे एक वजह वेनेजुएला में ट्रंप की सैन्य कार्रवाई हो सकती है. उत्तर कोरिया, वेनेजुएला की मादुरो सरकार का सहयोगी रहा है.
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बलिस्टिक मिसाइल छोड़ने के बाद उत्तर कोरिया का एक बयान भी आया, जिसमें उसने अमेरिका पर अमेरिकी हमले की निंदा की. उसने इसे "संप्रभुता के अतिक्रमण का सबसे गंभीर रूप" बताया. उत्तर कोरिया की सरकारी न्यूज एजेंसी केसीएनए ने रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान यूं छापा, "यह घटना एक और उदाहरण है, जो साफतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के क्रूर स्वभाव की फिर से पुष्टि करती है."
दशकों से प्योंगयांग यह दलील देता आया है कि उसे अपनी रक्षा के लिए परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम की जरूरत है. ताकि, वह उत्तर कोरिया में सत्ता परिवर्तन की कथित अमेरिकी कोशिशों को हतोत्साहित कर सके. अमेरिका के मुताबिक, उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है.
होंग मिन, कोरिया इंस्टिट्यूट फॉर नेशनल यूनिफिकेशन में एक विश्लेषक हैं. वह बताते हैं, "उन्हें (उत्तर कोरिया) शायद यह डर है कि अगर संयुक्त राज्य अमेरिका फैसला करे, तो वह किसी भी समय सटीक वार कर सकता है." मिसाइल लॉन्च को शक्ति प्रदर्शन से जोड़ते हुए होंग ने कहा, "इसके पीछे बुनियादी संदेश यह है कि उत्तर कोरिया पर हमला करना, वेनेजुएला पर वार करने जितना आसान नहीं होगा."
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वहीं, सोल स्थित इंस्टिट्यूट फॉर फार ईस्टर्न स्टडीज के प्रोफेसर लिम का मानना है कि मिसाइल लॉन्च करना बीजिंग के लिए भी एक संदेश है कि वह सोल के साथ करीबी रिश्तों को बढ़ावा ना दे.
चीन गए हैं दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति
उधर, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जेइ म्यूंग चार दिवसीय यात्रा पर चीन पहुंचे हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाने के अलावा उन्हें यह भी उम्मीद है कि प्योंगयांग के साथ रिश्ते बेहतर करने की उनकी कोशिश में चीन से मदद मिल सकती है. चीन का उत्तर कोरिया पर काफी प्रभाव है.
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सोल के आगे एक बड़ी चुनौती चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की भी है. चीन उसका सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है और अमेरिका उसकी सुरक्षा का सबसे बड़ा गारंटर. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन, दक्षिण कोरिया को अमेरिकी प्रभाव से निकालना चाहता है.
सोल स्थित हेनकुक यूनिवर्सिटी में विदेशी मामलों के प्रोफेसर कांग युन-योंग ने एएफपी को बताया, "ऐसे समय में जब दक्षिण कोरिया, संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान के बीच त्रिपक्षीय सहयोग मजबूत हो रहा, चीन दक्षिण कोरिया को सबसे कमजोर कड़ी के रूप में देखता है."
चीन को नाराज ना करने की कोशिश?
राष्ट्रपति म्यूंग भी 'चीन बनाम अन्य' की बहस में पक्ष चुनने से दूर रह रहे हैं. मसलन, बीते दिनों चीन ने ताइवान के आसपास बड़ा सैन्य अभ्यास किया. कई देशों ने इसकी निंदा की, लेकिन सोल इसमें शामिल नहीं हुआ. पिछले साल जापान और चीन में काफी तनाव बढ़ा. संदर्भ था प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची का एक बयान, जिसमें उन्होंने संकेत दिया कि अगर चीन, ताइवान पर हमला करता है तो जापान सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है.
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दक्षिण कोरिया ने इससे भी दूरी बनाकर रखी. जैसा कि दिसंबर में राष्ट्रपति म्यूंग ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "पक्ष लेने से तनाव बढ़ता ही है." राष्ट्रपति ने चीनी ब्रॉडकास्टर सीसीटीवी को दिए एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि वह साफतौर पर मानते हैं कि "वन-चाइना सिद्धांत का सम्मान और ताइवान खाड़ी समेत उत्तरपूर्वी एशिया में शांति व स्थिरता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है."













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