मोबाइल से मिसाइल तक, नेविगेशन सैटेलाइट के भरोसे
स्मार्टफोन मैप से लेकर सटीक हथियारों तक, सैटेलाइट नेविगेशन आज, जिंदगी और युद्ध दोनों का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है.
स्मार्टफोन मैप से लेकर सटीक हथियारों तक, सैटेलाइट नेविगेशन आज, जिंदगी और युद्ध दोनों का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है. लेकिन जहां उपयोग है, वहीं दुरुपयोग भी छुपा रहता है.अगर आपने कभी स्मार्टफोन मैप इस्तेमाल किया है या फिर ओला या ऊबर टैक्सी बुक की है तो इसका मतलब है आपने जीपीएस इस्तेमाल किया है. बहुत लोग नहीं जानते कि अमेरिका का जीपीएस, यानी ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम, एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) कहते हैं.
इस वक्त चार वैश्विक सैटेलाइट सिस्टम पृथ्वी के चारों ओर घूम रहे हैं. ये हवाई जहाज, नाविक जहाज, सड़क के वाहनों, और यहां तक कि भोजनालय ढूंढ रहे पर्यटकों को भी रास्ता दिखाते हैं. लेकिन साथ ही ये युद्ध में भी अहम भूमिका निभाते हैं.
सैटेलाइट आपको कैसे बताते हैं कि आप कहां हैं
सैटेलाइट नेविगेशन समय का खेल है. GNSS सैटेलाइट में बहुत सटीक परमाणु घड़ियां होती हैं. सैटेलाइट्स हर पल, अपनी बिल्कुल सटीक स्थिति और सिग्नल भेजने का सही समय को ब्रॉडकास्ट करती रहती हैं. धरती पर इस्तेमाल होने जीपीएस जैसे डिवाइस, इन सिग्नलों को पकड़ कर अपनी सही लोकेशन तय करते हैं. GNSS चार सैटेलाइटों के सिग्नल से अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई का डेटा लेता रहता है. इस दौरान किसी भी सैटेलाइट के जरा से समयान्तर को भी एक दुरुस्त करता है. यह तकनीक बहुत तेज और सटीक है. लेकिन इसमें एक कमजोरी भी छिपी है.
अमेरिका की रेसिलिएंट नेविगेशन एंड टाइमिंग फाउंडेशन के अध्यक्ष दाना गार्ड ने डीडब्ल्यू को बताया की "ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के सिग्नल काफी नाजुक होते हैं." गार्ड के मुताबिक, "ये सिग्नल इतने कमजोर होते हैं कि इनके पास अगर रेडियो में चाहे गलती से या जानबूझकर कुछ शोर हो जाये, तो इनके रिसेप्शन में दखल आ सकता है. हर सरकार में ऐसे लोग जरूर होंगे जो इस समस्या को समझते हैं. चुनौती यह है कि आला कमान इसे समझे और जोखिम कम करने के लिए कदम उठाएं."
चार वैश्विक नेविगेशन शक्तियां: अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन
1970 के दशक में सबसे पहले दो ग्लोबल नेविगेशन सिस्टम अमेरिका और सोवियत यूनियन ने विकसित किए. अमेरिका ने जीपीएस बनाया, जो पूरी दुनिया के क्षेत्र को कवर करने वाला पहला सैटेलाइट नेविगेशन नेटवर्क बना. आज सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला सिस्टम भी यही है. लगभग उसी समय सोवियत रूस ने ग्लोनास (GLONASS) बनाया.
फिर 2000 के दशक की शुरुआत में यूरोपीय संघ ने सोचा कि जीपीएस पर निर्भर रहना यूरोप को अमेरिका की रणनीतिक तकनीक पर निर्भर बना देगा, तो उन्होंने गैलिलियो सिस्टम बनाना शुरू किया. चीन का बाइडू सिस्टम इन चारों में सबसे नया है. यूरोप की तरह, चीन भी अमेरिका के जीपीएस पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता था. ये चारों सिस्टम लगभग एक जैसे हैं, और नागरिक और सैन्य दोनों कामों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.
स्कॉटलैंड के स्ट्रैथक्लाइड विश्वविद्यालय के सैटेलाइट इंजीनियरिंग प्रोफेसर माल्कम मैकडॉनल्ड ने बताया कि "जीपीएस, ग्लोनास और गैलिलियो लगभग एक जैसी कक्षाओं पर लगभग 19,000 से 23,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर समान संख्या में सैटेलाइट इस्तेमाल करते हैं. बाइडू अपने सिस्टम में ऊंची कक्षाओं वाली सैटेलाइट्स जोड़ता है जिससे एशिया में स्थानीय कवरेज बेहतर मिले."
हर सिस्टम धरती पर किसी भी जगह संकेत भेज सकता है, चाहे वह आपकी कलाई की घड़ी जितनी छोटी डिवाइस ही क्यों न हो. प्रोफेसर मैकडॉनल्ड ने आगे बताया कि "ज्यादातर डिवाइस कई तरह की सैटेलाइट समूहों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन यह डिवाइस पर निर्भर करता है. उदाहरण के लिए मेरी स्मार्टवॉच जीपीएस और ग्लोनास दोनों का इस्तेमाल कर सकती है."
जापान औरभारत के पास भी ऐसे सिस्टम हैं, लेकिन वे पूरी दुनिया के क्षेत्र में नहीं फैले हैं. वे सीमित नेविगेशन देते हैं.
युद्ध में ग्लोबल नेविगेशन सिस्टम कैसे काम आते हैं
दुनिया भर की सेनाएं अब सामग्री प्रबंधन, नक्शा बनाने और कार्रवाई की योजना तैयार करने के लिए सैटेलाइट नेविगेशन पर निर्भर हैं. इनकी मदद से क्रूज मिसाइल और तथाकथित ‘स्मार्ट बम' जैसे हथियारों को गाइड किया जा सकता हैं. ड्रोन चलाने के लिए भी इन्हें इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन इसी दोहरे इस्तेमाल के कारण सैटेलाइट खुद एक निशाना बन जाती हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और यूक्रेन ने सिग्नल "जैमिंग" जैसी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकें इस्तेमाल कीं. जैमिंग का मतलब है सिग्नल में दखल डालकर उसे बिगाड़ देना, और "स्पूफिंग" का मतलब है जमीन पर जीपीएस आधारित सिस्टम को धोखा देना. स्पूफिंग करना जैमिंग से कठिन है, लेकिन इससे दुश्मन गुमराह हो सकता है.
ब्रिटेन के रॉयल यूनाइटेड सर्विसिस इंस्टिट्यूट के इलेक्ट्रॉनिक युद्ध विश्लेषक थोमस विथिंगटन ने कहा, "आपका नेविगेशन सिस्टम यह दिखा सकता है कि आप 400 नॉट्स की स्पीड से हेलसिंकी एयरपोर्ट से उड़ रहे हैं, जबकि असल में आप बर्लिन के बाहर 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से कार चला रहे हो सकते हैं. यह तकनीक किसी क्षेत्र से गुजर रहे रूसी जहाजी बेड़े को अपनी लोकेशन छिपाने में मदद कर सकती है."
प्रोफेसर मैकडॉनल्ड ने बताया की "यह तकनीक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते जहाजों में बिलकुल बारीक त्रुटियां डालने के लिए भी इस्तेमाल की गई है, जिससे वह जहाज गलती से किसी और देश के जलक्षेत्र में घुस जाए, और वह देश उसे रोक कर अवैध घुसपैठ के आरोप में उस पर कब्जा कर ले.
अमेरिका की रेसिलिएंट नेविगेशन एंड टाइमिंग फाउंडेशन के अध्यक्ष गार्ड ने कहा कि "यह समस्या यूरोप और अमेरिका के लिए रूस और चीन से भी बड़ी है, क्योंकि रूस और चीन के पास GNSS के साथ ही अपने घरेलू बैकअप सिस्टम भी हैं. पश्चिम के पास ये नहीं हैं."
थोमस विथिंगटन के मुताबिक, "सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि ऐसी कोई तकनीक मौजूद नहीं है जो GNSS संबंधी दिक्कतों को पूरी तरह हल कर दे."
GNSS के विकल्प बनाने की कोशिशें भी हुई हैं. लेकिन विथिंगटन के अनुसार अभी युद्ध में, सबसे कारगर और तेज उपाय, जैमर को खोजकर उसे नष्ट कर देना ही है.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 26, 2026 05:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

