World Vada Pav Day 2021: विश्व वड़ापाव दिवस पर जानें इसका इतिहास, ऐसे बटाटावड़ा बना मुंबई की शान
आज 23 अगस्त विश्व वड़ापाव (World Vada Pav Day) (जागतिक वड़ापाव) दिवस है. हर साल 23 अगस्त को यह दिन मनाया जाता है. कई मुंबईकरों के लिए, नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का खाना तीनों टाइम का भोजन सिर्फ वड़ापाव है. मुंबई आकर कोई वड़ापाव न खाए ऐसा हो ही नहीं सकता. जब वड़ापाव शुरू हुआ तो 10 पैसे में बिकता था. आज आपको ये 10 रुपये से लेकर 80 रुपये, 100 रुपये तक में मिलते हैं....
World Vada Pav Day 2021: आज 23 अगस्त विश्व वड़ापाव (World Vada Pav Day) (जागतिक वड़ापाव) दिवस है. हर साल 23 अगस्त को यह दिन मनाया जाता है. कई मुंबईकरों के लिए, नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का खाना तीनों टाइम का भोजन सिर्फ वड़ापाव है. मुंबई आकर कोई वड़ापाव न खाए ऐसा हो ही नहीं सकता. जब वड़ापाव शुरू हुआ तो 10 पैसे में बिकता था. आज आपको ये 10 रुपये से लेकर 80 रुपये, 100 रुपये तक में मिलते हैं. मुंबई में आज रात दिन बिकनेवाला वड़ापाव शुरू में केवल छह से सात घंटे के लिए उपलब्ध था. एक ज़माने में दोपहर 2 वड़ापाव का ठेला लगता था और रात के 8 बजे तक चलता था. दादर, परेल, गिरगांव, आदि जगहों पर मराठी रेस्तरां की संख्या में वृद्धि के बाद बटाटावड़ा को मुंबई में अपना घर मिला. लेकिन शुरुआती सालों में सिर्फ बटाटावड़ा ही खाया जाता था. इस बात को लेकर मतभेद हैं कि इसे पाव के साथ कब खाया जाने लगा. दादर और अन्य क्षेत्रों के मिल मजदूरों ने इस बहुमूल्य मराठी भोजन को अच्छी तरह से ग्रहण किया. यह भी पढ़ें: ये 5 स्वादिष्ट सूप आपके मोटापे को करेंगे कंट्रोल, जानिए पूरी रेसिपी
23 अगस्त 2001 को धीरज गुप्ता ने वड़ापाव को एक भारतीय बर्गर में तब्दील करते हुए जंबो वड़ापाव फूड चेन की शुरुआत की. इसलिए उनकी 9 शहर में मौजूद शाखाएं विश्व वड़ापाव दिवस मनाती हैं. दूसरे लोग भी उनकी नकल करने लगे हैं. वड़ापाव वास्तव में एक आम भोजन है. इसने जल्दी ही मुंबई में मिल मजदूरों की संस्कृति में जड़ें जमा लीं. इसे खाने के लिए किसी प्लेट या चम्मच की जरूरत नहीं है. इसे जितनी जल्दी बनाया जाता है उतनी ही जल्दी खाया जाता है. यही कारण है कि इसे मुंबई की कार्य संस्कृति के रूप में जाना जाने लगा. आज मुंबई में रोजाना करीब 18 से 20 लाख वड़ापाव का सेवन किया जाता है.
कब शुरू हुआ?
माना जाता है कि वड़ापाव का जन्म 1966 में दादर स्टेशन के बाहर अशोक वैद्य के फूड ट्रक पर हुआ था. पुराने मुंबईकरों का कहना है कि इस दौरान दादर में सुधाकर म्हात्रे का वड़ापाव भी शुरू हुआ. आलू की सब्जी और पोली खाने की बजाय आलू लू की सब्जी को बेसन में तल कर वड़ा बनाने लगे.
रोजगार और राजनीतिक समर्थन के साधन-
1970 से 1980 के दशक तक, जैसे-जैसे मुंबई में मिलें बंद होने लगीं, कई युवा वड़ापाव को आजीविका के साधन के रूप में देखने लगे. फिर धीरे-धीरे हर गली और चौराहों पर वड़ापाव की गाड़ियां दिखाई देने लगीं. मराठी बच्चों के इस संघर्ष का शिवसेना ने समर्थन किया. बालासाहेब ठाकरे का हमेशा से मानना था कि एक मराठी व्यक्ति को उद्योग में प्रवेश करना चाहिए. इसलिए वड़ापाव की कारों का छोटा कारोबार शुरू हो गया. उसी समय, जैसे ही शिवसेना ने दक्षिण भारतीयों के खिलाफ एक स्टैंड लिया, शिवसेना ने मुंबई में दादर और माटुंगा जैसे क्षेत्रों में उडपी होटलों में दक्षिणी भोजन का विरोध करने के लिए वड़ापाव को बढ़ावा देना शुरू कर दिया. उडपी की जगह वड़ापाव खाने की नीति अपनाते हुए शिवसेना ने राजनीतिक स्तर पर वड़ापाव की ब्रांडिंग कर दी और ऐसे शिव वड़ापाव का जन्म हुआ. निगम में सत्तासीन शिवसेना ने यहां तक कि वड़ापाव के वाहनों को डंप करने के नियम बनाकर वड़ापाव को राजनीतिक समर्थन भी दिया. आज कई दफ्तरों की कैंटीनों में, स्कूलों की कैंटीनों में वड़ापाव को स्थायी ठिकाना मिल गया है.
विदेश में भी वड़ापाव का बोलबाला-
मुंबई के रिज़वी कॉलेज के पूर्व छात्रों ने लंदन में 15 अगस्त, 2010 को वड़ापाव होटल शुरू किया. ठाणे के सुजय सोहनी और वडाला के सुबोध जोशी ने मिलकर ये होटल शुरू किया. श्री कृष्ण वड़ापाव नाम के होटल व्यवसाय से प्रति वर्ष वे 4 करोड़ रुपये से अधिक कमाते हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 23, 2021 09:52 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

