Matru Navami 2025: पितृ पक्ष के नवमी के दिन परिवार के उन दिवंगतों को श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु नवमी तिथि (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) पर हुई होती है, लेकिन इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह तिथि सभी दिवंगत महिलाओं के श्राद्ध की तिथि भी मानी जाती है, इसलिए इस दिन को मातृ नवमी के नाम से भी जाना जाता है. कई जगहों पर इसे अविधवा श्राद्ध कहा जाता है.
इस वर्ष 15 सितंबर 2025, सोमवार के दिन मातृ नवमी का श्राद्ध किया जाएगा. आइये जानते हैं मातृ नवमी पर दिवंगत महिलाओं की श्राद्ध प्रक्रिया के बारे में विस्तार से.ये भी पढ़े:Shraddh Paksh 2024: मातृ नवमी कब मनाई जाएगी 25 या 26 सितंबर को? जानें मूल-तिथि, पूजा-मुहूर्त, एवं श्राद्ध के आवश्यक नियम!
कब है मातृ नवमी एवं श्राद्ध के लिए शुभ मुहूर्त
आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी प्रारंभः 03.06 AM बजे (15 सितम्बर, 2025, सोमवार)
आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी समाप्त 01.31 AM बजे (16 सितम्बर, 2025, मंगलवार)
उदया तिथि के अनुसार श्राद्ध पक्ष की नवमी 15 सितंबर को मनाई जाएगी.
कुतुप मूहूर्तः 11.51 AM से 12.41 PM (कुल अवधि 00 घंटे 49 मिनट)
रोहिण मूहूर्तः 12.41 PM से 01.30 PM (कुल अवधि 00 घंटे 49 मिनट)
अपराह्न कालः 01.30 PM से 03.58 PM (कुल अवधि 02 घंटे 28 मिनट)
मातृ नवमी का श्राद्ध सम्पन्न करने के लिए कुतुप, रौहिण आदि मुहूर्त शुभ मुहूर्त माने जाते हैं
मातृ नवमी का महत्व
पितृ पक्ष में मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है. यह दिन दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों के पिंडदान करने के लिए समर्पित है, जिनकी मृत्यु सुहागिन के रूप में हुई थी. इसे निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है.
आत्मा की शांति: मान्यता है कि इस दिन विधि-पूर्वक पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है.
सुख-समृद्धि और सौभाग्य: मातृ नवमी पर श्राद्ध से परिवार में सुख-समृद्धि आती है, इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखने वाली महिलाओं को सौभाग्य प्राप्त होता है.
विशेष विधान: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में सौभाग्यवती माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध की तिथि मातृ नवमी को अलग से बताया गया है. पितृपक्ष में माताओं की पूजा की जाती है और दिवंगत सुहागिनों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है.
मातृ नवमी पर श्राद्ध पूजा विधि
इस दिन सूर्योदय पूर्व स्नानादि से निवृत्ति हो सफेद और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत-पूजा का संकल्प लें. सूर्य को जल अर्पित करें. घर के दक्षिण दिशा में एक लकड़ी की चौकी रखें. उस पर सफेद वस्त्र बिछाकर मातृ पितरों की फोटो रखें. उन्हें फूल माला चढ़ाएं, काले तिल का धूप-दीप जलाएं. तुलसी पत्ता अर्पित करें. श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करें. घर पर दिवंगत मां या संबंधित महिला का प्रिय भोजन बनाकर सबसे पहले गायों को खिलाएं, जिन पितरों का श्राद्ध करना है, उनके नाम का भोजन निकालकर घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखें. घर में तुलसी के पौधे लगाएं, उनकी पूजा-अर्चना करें. एक प्रज्वलित दीपक रखें. अब करीब के पवित्र नदी में तर्पण करें, घर में बने भोजन में से कुत्ते, कौवे और गाय को खिलाएं. इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, और वे आशीर्वाद देकर खुशी-खुशी अपने लोक लौट जाते हैं.













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