Sawan 2019: ‘शिव’ तेरे रूप अनेक, हर रूप की महिमा और महात्म्य है अपरंपार
देवों के देव महादेव के जितने नाम हैं, उतने ही रूप हैं, और हर रूप का अपना महात्म्य है. शिव भक्तों में आस्था है कि भोलेनाथ के हर रूप की उपासना करके मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है. शिव जी के बारे में विख्यात है कि वह अपने भक्तों को वरदान देते समय केवल भक्ति देखते हैं. उनकी यही उदारता कभी-कभी उन पर भारी पड़ जाती है.
देवों के देव महादेव के जितने नाम हैं, उतने ही रूप हैं, और हर रूप का अपना महात्म्य है. शिव भक्तों में आस्था है कि भोलेनाथ के हर रूप की उपासना करके मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है. शिव जी के बारे में विख्यात है कि वह अपने भक्तों को वरदान देते समय केवल भक्ति देखते हैं. उनकी यही उदारता कभी-कभी उन पर भारी पड़ जाती है. आध्यात्मिक ग्रंथों में उल्लेखित है कि भगवान शिव अपना हर रूप जगहित के लिए धारण करते हैं. यहां हम उनके विभिन्न रूपों की गूढ़ता और महत्ता की बात करेंगे.
‘अर्धनारीश्वर’
ब्रह्मा ने जब सृष्टि-सृजन का कार्य शुरू किया, उन्हें लगा कि उनकी कृतियां एक तय समय पश्चात नष्ट हो जायेंगी. हर बार उन्हें नए सिरे से सृजन करना होगा. काफी चिंतन-मनन के बाद भी कोई उक्ति उनके मस्तिष्क में नहीं आई. तब उन्होंने भगवान शिव से सुझाव प्राप्त करने के लिए शिव जी की कठोर तपस्या शुरू किया. ब्रह्मा जी की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी समस्या के समाधान स्वरूप शिवजी उनके सम्मुख अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए. उनके शरीर काआधा स्वयं उनका था, तथा आधा भाग शिवा का था. अपने इस स्वरूप से शिव ने ब्रह्मा को प्रजननशील प्राणी के सृजन की प्रेरणा प्रदान की सृष्टि के निर्माण के हेतु शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से पृथक किया. शिव स्वयं पुल्लिंग के एवं उनकी शक्ति स्त्री लिंग की द्योतक हैं. उन्होंने ब्रह्मा जी को पुरुष एवं स्त्री के समान महत्व का भी उपदेश दिया. उनके अनुसार अगर आपके अंदर का पुरुष-गुण और स्त्री-गुण मिल जाएं, तो आप परमानंद की अवस्था में रहते हैं.
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‘शिवपुराण’ के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को शिव के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी. पौराणिक कथाओं के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य के अत्याचार से देव, किन्नर समेत सभी त्रस्त थे. वे त्राहिमाम-त्राहिमाम करते शिवजी के पास गये. तब मद में अंधा अंधकासुर शिव जी पर आक्रमण कर दिया. दोनों में युद्ध शुरू हुआ था कि तभी शिव जी के रक्त से भैरव उत्पत्न्न हुआ. भैरव ने अंधकासुर का वध कर समस्त देवलोक में शांति स्थापित किया. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने शिव जी और उनके गणों को कुछ कटाक्षपूर्ण बातें कह दी. शिव जी ने ब्रह्मा की बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया. लेकिन उनके शरीर से उसी समय क्रोध से कांपती एक प्रचण्डकाय काया प्रकट हुई. वह ब्रह्मा का संहार के लिये आगे बढ़ी. इस पर पूरा ब्रह्माण्ड त्राहि-त्राहि कर उठा. तब स्वयं शिव जी ही उस काया को शांत करवा सके. यही काया बाद में महाभैरव बना. मान्यता है कि बाद में शिवजी ने अपने इस अंश को काशी का नगरपाल नियुक्त किया.
'महादेव'
मान्यता है कि सर्वप्रथम शिव जी ने ही अपने अंशों से तमाम देवताओं को जन्म दिया था. इसके साथ ही शिव ने अपने ही अंश से शक्ति को जन्म दिया. सभी देवी-देवताओं के सृजनकर्ता होने से शिव महादेव कहलाएं. कहा जाता है कि शिव जी की महादेव के रूप की उपासना से सभी देवी-देवताओं का पुण्य प्राप्त होता है. सोमवार को महादेव रूप की उपासना से हर ग्रह नियंत्रित रहता है.
'आशुतोष'
भगवान शिव के बारे में यह लोकप्रिय है कि वह अपने भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं. उनके इसी बहुत जल्दी प्रसन्न होने के कारण उन्हें आशुतोष कहा जाता है. शिव के आशुतोष रूप की उपासना से तनाव दूर होता है. आशुतोष रूप की आराधना से मानसिक परेशानियां मिट जाती हैं. मान्यता है कि सोमवार के दिन शिवलिंग पर इत्र और जल चढ़ाने से भगवान आशुतोष अत्यंत प्रसन्न होते हैं.
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'रूद्र'
भगवान शिव में अगर आशुतोष बसते हैं तो उनमें रुद्र का भी स्वरूप विद्यमान है. कहा जाता है कि संहार की विशेष शक्ति होने के कारण उनका एक नाम रूद्र भी है. जब भगवान शिव उग्र रूप में होते हैं तब उनकी उपासना ‘रूद्र’ के रूप में की जाती है. संहार के बाद रुद्र इंसान को रोने के लिए बेबश करते हैं. शिव जी का यह रूप इंसान को जीवन के सत्य से दर्शन कराता है. मान्यता है कि रूद्र रूप में शिव वैराग्य भाव जगाते हैं.
'मृत्युंजय'
महाशिव पुराण में उल्लेखित है कि भगवान शिव के मृत्युंजय रूप की उपासना करके मृत्यु को भी मात दी जा सकती है. मान्यता है कि मृत्युंजय रूप में भगवान शिव अमृत का कलश लेकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. इनकी आराधना से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है. मृत्युंजय की पूजा से आयु रक्षा और सेहत का लाभ मिलता है. शिव का यह रूप ग्रह बाधा से मुक्ति दिलाता है. शिव जी को प्रसन्न करने के लिए श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर बेल पत्र और जलधारा अर्पित करने की परंपरा है.
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देव और दानव की आपसी सहमति से समुद्र मंथन हुआ. इस मंथन से बहुत कुछ बेशकीमती और दिव्य चीजें उत्पन्न हुई थी. इसी क्रम में समुद्र मंथन से जब हलाहल विष निकला तो जनहित का ध्यान रखते हुए उन्होंने हलाहल को पी लिया, तथा उसे अपनी कंठ में स्थापित कर लिया. इससे उनका कंठ नीला हो गया. कहा जाता है कि शिव जी के इस रूप को नीलकंठ कहा जाता है. नीलकंठ रूप की उपासना करने से शत्रु बाधा दूर होती है. इसकी उपासना से साजिश और तंत्र-मंत्र का असर नहीं होता है.
नोट- इस लेख में दी गई तमाम जानकारियों को प्रचलित मान्यताओं के आधार पर सूचनात्मक उद्देश्य से लिखा गया है और यह लेखक की निजी राय है. इसकी वास्तविकता, सटीकता और विशिष्ट परिणाम की हम कोई गारंटी नहीं देते हैं. इसके बारे में हर व्यक्ति की सोच और राय अलग-अलग हो सकती है
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 19, 2019 09:12 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

