World Arthritis Day: भारत का हर छठा व्यक्ति है गठिया का मरीज, जानें कैसे करें बचाव?
गठिया रोग (Photo credit: ANI)

पहले उम्रदराज लोगों को आर्थराइटिस यानी  जोड़ों की बीमारी हुआ करती थी, लेकिन बदलते लाइफस्टाइल के इस दौर में  अधिकांश युवा भी आर्थराइटिस की चपेट में आ रहे हैं. आर्थराइटिस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के मकसद से हर साल 12 अक्टूबर को विश्व आर्थराइटिस दिवस मनाया जाता है. दरअसल, घुटने की आर्थराइटिस  शारीरिक विकलांगता के प्रमुख कारण के रूप में उभर रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह आलथी-पालथी मारकर बैठने की भारतीय शैली को माना जाता है, क्योंकि इससे घुटने ज्यादा घिसते हैं और घुटने बदलवाने तक की नौबत आ जाती है.

नोएडा स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल के आर्थोपेडिक एवं ज्वाइंट रिप्लेसमेंट विभाग के निदेशक डॉ. अतुल मिश्रा बताते हैं कि भारत में 15 करोड़ से अधिक लोग घुटने की समस्याओं से पीड़ित हैं, जिनमें से 4 करोड़ लोगों को घुटना बदलवाने यानी टोटल नी रिप्लेसमेंट की जरूरत है. एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में हर छह में से एक व्यक्ति आर्थराइटिस से पीड़ित है और यह समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक सामान्य है.

डॉ. मिश्रा ने कहा के मुताबिक, हमारे देश में घुटने की आर्थराइटिस का प्रकोप चीन की तुलना में दोगुना तथा पश्चिमी देशों की तुलना में 15 गुना है और इसका कारण यह है कि भारतीय लोगों में जेनेटिक एवं अन्य कारणों से घुटने की आर्थराइटिस से पीड़ित होने का खतरा अधिक होता है. यह भी पढ़ें: World Obesity Day: मोटापे को नहीं किया कंट्रोल तो मां बनने की ख्वाहिश रह सकती है अधूरी

खराब लाइफस्टाइल है वजह

उन्होंने कहा कि घुटने की आर्थराइटिस के लिए हमारी जीवन शैली काफी हद तक जिम्मेदार है, जिसके तहत उठने-बैठने में घुटने की जोड़ का अधिक इस्तेमाल होता है. जिसके कारण  शरीर के अन्य जोड़ों की तुलना में घुटने जल्दी खराब होते हैं. हमारे देश में लोग पूजा करने, खाना खाने, खाना बनाने, बैठने आदि के दौरान पालथी मारकर बैठते हैं.  इसके अलावा परंपरागत शैली के शौचालयों में घुटने के बल बैठने की जरूरत होती है.

गलत खानपान है जिम्मेदार

उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में जंक फूड एवं फास्ट फूड के बढ़ते इस्तेमाल तथा खान-पान की गलत आदतों के कारण शरीर की हड्डियों को कैल्शियम एवं जरूरी खनिज नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे कम उम्र में ही हड्डियों का घनत्व कम होने लगा है. हड्डियां घिसने और कमजोर होने लगी हैं. गलत खान-पान एवं जीवन शैली के कारण युवाओं में आर्थराइटिस एवं ओस्टियो आर्थराइटिस की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है. आज देश में घुटने की आर्थराइटिस से पीडित लगभग 30 फीसदी मरीज 45 से 50 साल के हैं, जबकि 18 से 20 प्रतिशत मरीज 35 से 45 साल के हैं.

क्या है इसके शुरुआती लक्षण ?

डॉ. मिश्रा ने बताया कि शरीर के किसी भी जोड़ में दर्द व जकड़न और जोड़ों से आवाज आना आर्थराइटिस के शुरुआती लक्षण हैं. बाद के चरणों में चलने-फिरने में कठिनाई होती है और जोड़ों में विकृतियां भी आ सकती हैं. घुटने की आर्थराइटिस के शुरुआती चरण के इलाज के लिए सुरक्षित एनाल्जेसिक जैसी दवाएं, इंट्रा-आर्टिकुलर इंजेक्शन और फिजियोथेरेपी का उपयोग किया जाता है. जबकि विकसित चरणों में, सबसे सफल उपचार टोटल नी रिप्लेसमेंट है. यह भी पढ़ें: World Mental Health Day: मानसिक तौर पर रहना है फिट तो अभी से अपना लीजिए ये आदतें

उन्होंने कहा कि जब घुटने के जोड़ बहुत अधिक खराब हो जाते हैं और मरीज का चलना-फिरना दुभर हो जाता है, तब घुटने को बदलने की जरूरत पड़ती है, जिसे टोटल नी रिप्लेसमेंट कहा जाता है. यह एक बहुत ही सफल प्रक्रिया है जो आधी सदी से भी अधिक पुरानी है. इसकी सफलता दर 95 फीसदी है और इससे रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आता है.

कैसे करें इससे बचाव? 

डॉ. मिश्रा ने कहा कि आर्थराइटिस से बचाव के लिए पैर मोड़कर बैठने से बचें, आलथी-पालथी मार कर नहीं बैंठें, भारतीय शौचालयों का उपयोग जहां तक हो सके कम करें तथा लंबे समय तक खड़े होने से बचें. घुटने की आर्थराइटिस की आरंभिक अवस्था में घुटने के व्यायाम, साइकिल चलाना और तैराकी रोग को बढ़ने से रोकने का सबसे बेहतर तरीका है. इसके अलावा हमें दूध एवं अन्य डेयरी उत्पादों, मौसमी फलों और सब्जियों का सेवन करना चाहिए तथा विटामिन डी की कमी से बचने के लिए पर्याप्त समय तक धूप में रहना चाहिए.

महिलाओं को है इसका अधिक खतरा 

उन्होंने कहा कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के घुटने जल्दी खराब होते हैं. भारतीय महिलाओं में घुटने की समस्याओं की शुरुआत के लिए औसत उम्र 50 साल है, जबकि भारतीय पुरुषों में यह समस्या 60 साल के बाद शुरू होती है. महिलाओं में घुटने की समस्याओं के जल्द शुरू होने का कारण मोटापा, व्यायाम नहीं करना, धूप में कम रहना और खराब पोषण है.

डॉ. मिश्रा ने कहा कि करीब 90 प्रतिशत भारतीय महिलाओं में विटामिन-डी की कमी है, जो बोन मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण ह.  शरीर में विटामिन-डी की कमी सीधे या परोक्ष रूप से घुटने को प्रभावित करती है.