Dev Uthani Ekadashi 2025, Tulsi Vivah, Kartik Purnima: नवंबर का महीना आते ही हवा में एक अलग सी ठंडक और मन में त्योहारों की घंटी बजने लगती है. यह कार्तिक और मार्गशीर्ष का पवित्र महीना है, जो आध्यात्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन त्योहारों के साथ ही एक उलझन भी शुरू हो जाती है - देवउठनी एकादशी 1 नवंबर को है या 2 को? तुलसी विवाह किस दिन करें? कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली 4 नवंबर को मनाएं या 5 को?
अगर आपके मन में भी यही सब सवाल हैं, तो घबराइए नहीं! आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं. इस संपूर्ण गाइड में, हम आपके सभी सवालों के जवाब देंगे. हम न सिर्फ आपको सही तारीखें बताएंगे, बल्कि यह भी समझाएंगे कि तारीखों में यह भ्रम क्यों है, साथ ही हर त्योहार का महत्व, उसकी पौराणिक कथा और घर पर पूजा करने की सबसे सरल विधि भी साझा करेंगे.
नवंबर 2025 के प्रमुख व्रत-त्योहार (एक नज़र में)
इससे पहले कि हम गहराई में जाएं, यहाँ एक छोटी सी तालिका है जो आपको नवंबर 2025 के मुख्य त्योहारों की सही तारीखें एक नज़र में दिखाएगी. यह उन लोगों के लिए है जिन्हें तुरंत जवाब चाहिए:
| त्योहार | तारीख और दिन | पक्ष |
| देवउठनी एकादशी (गृहस्थ व्रत) | 1 नवंबर 2025, शनिवार | कार्तिक, शुक्ल पक्ष |
| तुलसी विवाह | 2 नवंबर 2025, रविवार | कार्तिक, शुक्ल पक्ष (द्वादशी) |
| कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) | 5 नवंबर 2025, बुधवार | कार्तिक, शुक्ल पक्ष |
| उत्पन्ना एकादशी | 15 नवंबर 2025, शनिवार | मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष |
देवउठनी एकादशी 2025 (जब 4 महीने बाद जागेंगे श्रीहरि)
नवंबर का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण पर्व है देवउठनी एकादशी. इसे 'देवोत्थान एकादशी' या 'प्रबोधिनी एकादशी' भी कहते हैं.
देवउठनी एकादशी कब है? (तारीख का पूरा सच: 1 या 2 नवंबर?)
यह इस महीने का सबसे बड़ा भ्रम है. आइए इसे समझते हैं.
पंचांग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि 1 नवंबर 2025, शनिवार को सुबह 9 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी और 2 नवंबर 2025, रविवार को सुबह 7 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी.
भ्रम क्यों है?
क्योंकि एकादशी की यह तिथि दो सूर्योदयों को छू रही है, यानी यह 1 नवंबर को भी है और 2 नवंबर की सुबह भी.
सही तारीख क्या है?
- गृहस्थों के लिए (परिवार वालों के लिए): जो लोग शादीशुदा हैं और परिवार में रहते हैं (जिन्हें स्मार्त संप्रदाय कहा जाता है), उनके लिए 1 नवंबर 2025, शनिवार को व्रत रखना सबसे उत्तम और शास्त्र-सम्मत है.
- वैष्णव संप्रदाय के लिए: जो लोग संन्यासी हैं या वैष्णव परंपरा (जैसे ISKCON) को मानते हैं, वे उदया तिथि के नियमों के कारण इसे 2 नवंबर को मना सकते हैं.
- व्रत खोलना (पारण): जो लोग 1 नवंबर को व्रत रखेंगे, वे अपना व्रत 2 नवंबर, रविवार की सुबह 7:31 बजे के बाद खोलेंगे (पारण करेंगे).
तो, संक्षेप में: परिवार वालों को 1 नवंबर, शनिवार को ही देवउठनी एकादशी का व्रत रखना चाहिए.
क्यों है यह एकादशी इतनी खास? (इसका महत्व)
इस एकादशी का महत्व दोहरा है, एक धार्मिक और दूसरा सामाजिक.
- धार्मिक महत्व: जैसा कि नाम से ही पता चलता है 'देव-उठनी', इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की लंबी योगनिद्रा (चातुर्मास) के बाद क्षीर सागर में जागते हैं. वे आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) को सोने जाते हैं और इस दिन जागते हैं.
- सामाजिक महत्व (शादियों का सीजन शुरू): यह हम सब के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. भगवान विष्णु के सोने के साथ ही चार महीनों (चातुर्मास) के लिए सभी शुभ और मांगलिक कार्य जैसे शादी-ब्याह, गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई आदि रुक जाते हैं. देवउठनी एकादशी के दिन भगवान के जागते ही ये सभी रुके हुए शुभ कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं. यह भारतीय विवाह उद्योग (Wedding Industry) के लिए 'हरी झंडी' की तरह है. इसी दिन से 'बैंड-बाजा-बारात' का सीजन फिर से शुरू होता है.
देवउठनी की पौराणिक कथा
इस पर्व के पीछे की कहानी सिर्फ भगवान के सोने और जागने की नहीं है, बल्कि यह एक गहरा संदेश भी देती है.
पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु चार महीने तक विश्राम करते हैं. यह वह समय होता है जब वर्षाकाल होता है, सूर्य बादलों से ढका रहता है, और इसे आध्यात्मिक साधना का समय माना जाता है. इस एकादशी पर भगवान का जागना वास्तव में पूरी दुनिया को एक संदेश देना है.
यह संदेश है कि 'अकर्मण्यता (आलस्य) की रात अब बीत चुकी है और कर्म (काम) का सूर्य उदय हो गया है, इसलिए हमें भी अपने-अपने आलस्य को त्यागकर अपने कर्तव्यों के प्रति फिर से जाग्रत होना होगा'. यह पर्व अपने भीतर के देवत्व को जगाने का भी प्रतीक है.
व्रत और पूजा की सरल विधि
अगर आप 1 नवंबर को यह व्रत रख रहे हैं, तो इन सरल चरणों का पालन करें:
- व्रत के नियम:
- यह व्रत या तो 'निर्जला' (बिना पानी पिए) या 'फलाहार' (सिर्फ फल और जल ग्रहण करके) रखा जाता है.
- अगर आप बीमार हैं या इतना कठिन व्रत नहीं रख सकते, तो भी इस दिन चावल, जौ, मसूर, प्याज, लहसुन और नमक का सेवन भूलकर भी न करें. तामसिक भोजन से दूर रहें.
- शाम की पूजा (भगवान को जगाना):
- इस एकादशी में शाम की पूजा सबसे महत्वपूर्ण है.
- घर के आंगन या पूजा स्थल पर गन्नों से एक छोटा सा मंडप तैयार करें.
- पूजा की चौकी पर भगवान विष्णु या शालिग्राम की मूर्ति स्थापित करें.
- भगवान विष्णु के चरण चिह्न (पैर) बनाएं और उन्हें ढक दें, जैसे वे सो रहे हों.
- शाम के शुभ मुहूर्त में, भगवान को जगाने का आह्वान करें. शंख, घंटी और थाली बजाकर शोर करें (जैसे किसी को नींद से जगाया जाता है).
- भगवान को जगाते समय यह विशेष मंत्र बोलें (अगर संस्कृत में न बोल पाएं, तो हिंदी में ही भाव रखें):$उत्तिष्ठोत्तिष्ठ$ $गोविंद$ $त्यज$ $निद्रां$ $जगत्पते$. $त्वयि$ $सुप्ते$ $जगन्नाथ$ $जगत$ $सुप्तं$ $भवेदिदम्$॥ (अर्थ: उठो गोविंद उठो, हे जगतपति! नींद का त्याग करो. आपके सो जाने से पूरी दुनिया सो जाती है.)
- भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, लड्डू, गन्ना और मौसमी फल जैसे सिंघाड़ा, शकरकंदी, और बेर अर्पित करें.
- व्रत का पारण (व्रत खोलना):
- व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा. इसका पारण अगले दिन, यानी 2 नवंबर, रविवार को द्वादशी तिथि पर किया जाएगा.
- 2 नवंबर को सुबह 7:31 बजे के बाद आप स्नान-पूजा करके अपना व्रत खोल सकते हैं.
तुलसी विवाह 2025 (घर-घर होगा मंगल उत्सव)
देवउठनी एकादशी के तुरंत बाद सबसे बड़ा उत्सव होता है तुलसी विवाह का.
तुलसी विवाह की सही तारीख और शुभ मुहूर्त
यहां भी तारीखों को लेकर थोड़ा भ्रम है. कुछ लोग एकादशी (1 नवंबर) को ही तुलसी विवाह करते हैं, तो कुछ द्वादशी (2 नवंबर) को.
2025 के लिए सही तारीख:
इस साल तुलसी विवाह के लिए सबसे शुभ और सही तारीख 2 नवंबर 2025, रविवार है.
कारण (यह विशेषज्ञ जानकारी है):
भले ही कुछ लोग एकादशी को विवाह करते हैं, लेकिन 1 नवंबर 2025 (एकादशी के दिन) को दोपहर 3:30 बजे के बाद से "भद्रा काल" लग रहा है. भद्रा एक अशुभ मुहूर्त होता है, जिसमें विवाह जैसा कोई भी मांगलिक कार्य करना वर्जित (मना) होता है.
चूंकि तुलसी विवाह एक 'विवाह' का ही अनुष्ठान है, इसलिए इसे भद्रा के साये से दूर, 2 नवंबर 2025 (द्वादशी तिथि) को करना ही सबसे शुद्ध और उत्तम रहेगा.
- द्वादशी तिथि कब है: द्वादशी तिथि 2 नवंबर को सुबह 7:31 बजे शुरू होगी और 3 नवंबर को सुबह 5:07 बजे समाप्त होगी.
- शुभ विवाह मुहूर्त: तुलसी विवाह हमेशा शाम के समय (गोधूलि बेला) में किया जाता है. 2 नवंबर को शाम का शुभ मुहूर्त (गोधूलि मुहूर्त) शाम 5:35 बजे से शाम 6:01 बजे तक रहेगा.
तुलसी-शालिग्राम विवाह का महत्व
यह कोई सामान्य पूजा नहीं है, यह एक प्रतीकात्मक विवाह है.
- ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त विधि-विधान से तुलसी माता और भगवान शालिग्राम का विवाह संपन्न कराता है, उसे "कन्यादान के समान पुण्यफल" प्राप्त होता है.
- यह अनुष्ठान वैवाहिक जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करता है और घर में सुख-शांति व समृद्धि लाता है.
- जिन अविवाहित कन्याओं के विवाह में देरी हो रही हो, उन्हें यह पूजा करने से मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है.
- ज्योतिषीय रूप से, यह पूजा कुंडली में गुरु (बृहस्पति) ग्रह को मजबूत करती है, जो विवाह का कारक है.
पौराणिक कथा: क्यों हुआ तुलसी का पत्थर (शालिग्राम) से विवाह?
यह कहानी बहुत ही भावपूर्ण है. पौराणिक कथा के अनुसार, तुलसी का असली नाम वृंदा था. वह राक्षस कुल में जन्मी थीं, लेकिन भगवान विष्णु की परम भक्त थीं. उनका विवाह दानवराज जलंधर से हुआ था.
वृंदा इतनी पतिव्रता थीं कि उनके सतीत्व की शक्ति से उनका पति जलंधर अजेय हो गया था. उसने देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया. जब कोई भी देवता उसे हरा नहीं सका, तो सभी भगवान विष्णु के पास मदद मांगने गए.
भगवान विष्णु ने जलंधर का घमंड तोड़ने के लिए एक छल किया. उन्होंने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुंच गए. वृंदा उन्हें अपना पति समझकर उनकी पूजा से उठ गईं, और जैसे ही उनका सतीत्व खंडित हुआ, युद्ध में जलंधर मारा गया.
जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया कि "जैसे तुमने छल से मेरा पति-वियोग कराया है, वैसे ही तुम भी अपनी पत्नी से बिछड़ोगे (राम अवतार में) और तुम पत्थर के बन जाओगे."
भगवान विष्णु तुरंत पत्थर के बन गए, जिन्हें 'शालिग्राम' कहा गया. बाद में, वृंदा अपने पति के साथ सती हो गईं. उनकी राख से एक पौधा उगा, जिसे भगवान विष्णु ने 'तुलसी' नाम दिया और वरदान दिया कि वे अपने शालिग्राम स्वरूप में हमेशा तुलसी से ही विवाह करेंगे. तभी से यह परंपरा चली आ रही है.
घर पर कैसे करें तुलसी विवाह? (संपूर्ण विधि)
आप घर पर ही बहुत सरल तरीके से यह विवाह संपन्न करा सकते हैं:
- सामग्री: एक चौकी, गन्ने (4 या 6), मूली, आंवला, बेर, शकरकंदी, सिंघाड़ा, मौसमी फल, भगवान शालिग्राम, तुलसी का पौधा, लाल चुनरी, साड़ी, सोलह श्रृंगार का सामान (बिंदी, चूड़ी, मेहंदी आदि), मौली (लाल धागा).
- मंडप तैयार करें: घर के आंगन, छत या पूजा घर में तुलसी के गमले को रखें. उसके चारों ओर गन्नों को खड़ा करके एक मंडप जैसा बना लें.
- तुलसी का श्रृंगार (दुल्हन): तुलसी माता को एक लाल या पीली साड़ी लपेटें. उन्हें लाल चुनरी ओढ़ाएं. बिंदी, चूड़ी, नथनी, मांग टीका जैसे हल्के आभूषणों से उन्हें एक दुल्हन की तरह सजाएं.
- शालिग्राम (दूल्हा): भगवान शालिग्राम की प्रतिमा को एक चौकी पर तुलसी के पौधे के दाहिनी ओर स्थापित करें 23.
- अगर शालिग्राम न हो (सरल उपाय): हर किसी के पास शालिग्राम नहीं होता. ऐसे में आप भगवान कृष्ण की तस्वीर या मूर्ति को विष्णु स्वरूप मानकर रख सकते हैं. अगर वह भी न हो, तो एक कलश पर नारियल रखकर उसे ही भगवान विष्णु का स्वरूप मान लें और उन्हें पीले वस्त्र ओढ़ा दें.
- विवाह की रस्म:
- शाम के शुभ मुहूर्त में, तुलसी और शालिग्राम (या विष्णु स्वरूप) की पूजा करें.
- दोनों के बीच एक पवित्र लाल धागा (मौली) बांधकर 'गठबंधन' करें.
- परिवार के सभी लोग मिलकर मंगल गीत गाते हुए तुलसी के गमले की सात बार परिक्रमा करें (यही फेरे माने जाते हैं).
- विवाह संपन्न होने के बाद आरती करें और सभी को प्रसाद बांटें.
कार्तिक पूर्णिमा (5 नवंबर 2025) - देवताओं की दिवाली
नवंबर का तीसरा बड़ा पर्व है कार्तिक पूर्णिमा. यह कार्तिक महीने का आखिरी और सबसे पवित्र दिन होता है.
तारीख और पूर्णिमा तिथि का समय (4 या 5 नवंबर?)
यहां भी देवउठनी एकादशी जैसा ही भ्रम है.
- तिथि का समय: पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 4 नवंबर 2025, मंगलवार की रात 10 बजकर 36 मिनट पर शुरू होगी.
- यह तिथि 5 नवंबर 2025, बुधवार की शाम 6 बजकर 48 मिनट पर समाप्त होगी.
सही तारीख क्या है?
हिंदू धर्म में कोई भी त्योहार सूर्योदय के समय मौजूद तिथि (उदया तिथि) के आधार पर मनाया जाता है.
4 नवंबर का सूर्योदय अमावस्या तिथि में था. पूर्णिमा तिथि 4 की रात में शुरू हो रही है. जबकि 5 नवंबर का सूर्योदय पूर्णिमा तिथि में होगा. इसलिए, स्नान, दान, व्रत और पूजा का मुख्य पर्व 5 नवंबर 2025, बुधवार को ही मनाया जाएगा.
इसके अनेक नाम और महत्व
इस एक दिन को कई नामों से जाना जाता है और हर नाम का अपना महत्व है:
- कार्तिक पूर्णिमा: यह कार्तिक मास का अंतिम दिन है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है. इस दिन किया गया स्नान और दान अनंत पुण्य देता है.
- देव दीपावली: यह "देवताओं की दिवाली" है. यह हमारी दिवाली के ठीक 15 दिन बाद मनाई जाती है 26. मान्यता है कि इस दिन सभी देवी-देवता स्वर्ग से पृथ्वी पर, विशेष रूप से काशी (वाराणसी) में, गंगा स्नान करने और दीपक जलाने आते हैं.
- त्रिपुरी पूर्णिमा: इस दिन का एक बड़ा संबंध भगवान शिव से भी है. इसी दिन भगवान शिव ने 'त्रिपुरासुर' नामक भयंकर राक्षस का वध किया था, इसीलिए उन्हें 'त्रिपुरारि' कहा जाता है 33.
- गुरु नानक जयंती: सिख धर्म के संस्थापक, प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी का 556वां प्रकाश पर्व (जयंती) भी इसी दिन मनाया जाएगा.
पौराणिक कथा: शिव क्यों कहलाए 'त्रिपुरारि'?
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रिपुरासुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके अजेय होने का वरदान पा लिया था. उसने तीन अलग-अलग नगर (पुर) बनाए और देवताओं पर अत्याचार करने लगा. तब सभी देवता भगवान शिव की शरण में गए.
भगवान शिव ने इसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन उस राक्षस का वध किया और तीनों पुरों (नगरों) को नष्ट कर दिया. 'त्रिपुर' (तीन नगर) का अंत करने के कारण ही भगवान शिव 'त्रिपुरारि' कहलाए. इस विजय की खुशी में देवताओं ने स्वर्गलोक में दीपक जलाकर उत्सव मनाया, जिसे 'देव दीपावली' कहा गया.
इस दिन क्या करें? (पूजा और दान)
इस दिन तीन कामों का सबसे ज्यादा महत्व है: स्नान, दान और दीप-दान.
- पवित्र स्नान: 5 नवंबर को सूर्योदय से पहले (ब्रह्म मुहूर्त) किसी पवित्र नदी, विशेषकर गंगा में स्नान करना चाहिए. अगर यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें.
- दीप-दान: यह इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है. शाम के समय किसी नदी के किनारे, मंदिर में, पीपल के पेड़ के नीचे या तुलसी के पौधे के पास दीपक जरूर जलाएं 33. मान्यता है कि इस दिन दीप-दान करने से सभी पापों का नाश होता है.
- पूजा: इस दिन घर में भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करना या सुनना बहुत शुभ माना जाता है.
- दान: कार्तिक पूर्णिमा पर किए गए दान का फल कई गुना होकर मिलता है. अपनी श्रद्धा के अनुसार, जरूरतमंद लोगों को अन्न, गर्म कपड़े, कंबल, जूते या चप्पल का दान करें.
नवंबर 2025 की दूसरी एकादशी (उत्पन्ना एकादशी)
नवंबर में एक और एकादशी व्रत पड़ेगा, जो महीने के दूसरे पखवाड़े (कृष्ण पक्ष) में आएगा.
उत्पन्ना एकादशी कब है? (कृष्ण पक्ष)
यह एकादशी कार्तिक पूर्णिमा (5 नवंबर) के बाद आएगी. यह मार्गशीर्ष (अगहन) महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है.
- तारीख: 2025 में उत्पन्ना एकादशी का व्रत 15 नवंबर 2025, शनिवार को रखा जाएगा 9.
(कुछ पंचांगों में 22 नवंबर की तारीख दी गई है 40, जो तार्किक रूप से सही नहीं है, क्योंकि कृष्ण पक्ष की एकादशी 15 नवंबर के आसपास ही पड़ेगी. 15 नवंबर की तारीख को अधिकांश पंचांगों का समर्थन प्राप्त है.)
इस एकादशी की कहानी: देवी एकादशी का 'जन्म'
इस एकादशी का नाम 'उत्पन्ना' (यानी उत्पन्न होने वाली) क्यों पड़ा? इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है.
सतयुग में भगवान विष्णु का 'मुर' नाम के एक भयंकर राक्षस से युद्ध चल रहा था. युद्ध करते-करते जब भगवान विष्णु थक गए, तो वे विश्राम करने के लिए बद्रिकाश्रम में एक गुफा में जाकर सो गए.
राक्षस मुर उनका पीछा करता हुआ वहां आ गया और उसने सोते हुए भगवान विष्णु पर वार करने के लिए जैसे ही तलवार उठाई, उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य, कांतिमय देवी प्रकट हुईं.
उस देवी ने राक्षस मुर को ललकारा और पल भर में उसका वध कर दिया.
जब भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागे, तो उन्होंने देवी को देखकर पूछा "आप कौन हैं?" देवी ने कहा, "प्रभु, मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न हुई हूं और मैंने इस राक्षस का वध किया है."
भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उस देवी को नाम दिया 'एकादशी', क्योंकि वह एकादशी के दिन ही 'उत्पन्न' हुई थीं. भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि "आज से तुम सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ होगी और जो कोई भी तुम्हारा व्रत करेगा, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे". इसी दिन से एकादशी व्रत की शुरुआत मानी जाती है.
नवंबर-दिसंबर 2025 विवाह शुभ मुहूर्त (चुक न जाएं ये तारीखें!)
जैसा कि हमने ऊपर बात की, देवउठनी एकादशी (1 नवंबर) के साथ ही शादियों का शुभ सीजन शुरू हो रहा है. अगर आपके घर में भी कोई मांगलिक कार्य (शादी, सगाई) है, तो नवंबर और दिसंबर की ये शुभ तारीखें नोट कर लें:
- नवंबर 2025 के शुभ मुहूर्त: 2, 3, 5, 8, 12, 13, 16, 17, 18, 21, 22, 23, 25, और 30 नवंबर. (नोट: कुछ ज्योतिषी पंचांग भेद के कारण 18, 22, 23, 24, 25, 29, 30 नवंबर को भी शुभ मान रहे हैं)
- दिसंबर 2025 के शुभ मुहूर्त: 4, 5, और 6 दिसंबर.
जरूरी चेतावनी
दिसंबर में इन तारीखों के बाद, खरमास और शुक्र अस्त होने के कारण शादियों पर फिर से लंबा ब्रेक लग जाएगा. यह ब्रेक लगभग डेढ़ महीने तक चलेगा. अगला शुभ समय फरवरी 2026 से ही शुरू होगा. इसलिए, अगर आप इसी साल शादी की योजना बना रहे हैं, तो इन तारीखों को हाथ से न जाने दें.
शुभकामनाओं के साथ
नवंबर का यह महीना आस्था, प्रकाश और उत्सव का एक अद्भुत संगम है. यह भगवान विष्णु के जागने का, तुलसी के विवाह का, देवताओं की दिवाली का और नए मांगलिक कार्यों की शुरुआत का महीना है.
आशा है कि इस विस्तृत गाइड ने आपकी सभी उलझनों को दूर कर दिया होगा और अब आप इन सभी त्योहारों को पूरे उत्साह और सही विधि-विधान के साथ मना पाएंगे.
आप सभी को देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!













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