Dayanand Saraswati Jayanti 2020: स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती पर जानें उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ रोचक और महत्वपूर्ण बातें
स्वामी दयानंद सरस्वती, (फोटो क्रेडिट्स: wikipedia)

Dayanand Saraswati Jayanti 2020: महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को मूलचंद तिवारी के रूप में टंकारा गुजरात में हुआ था. उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की. उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और मां का नाम यशोदाबाई था. दयानंद सरस्वती एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार से थे, इसलिए उनकी प्रारंभिक जिंदगी ऐशो आराम से गुजरी. लेकिन उनका मन वेद और शास्त्रों में ज्यादा लगता था, वे वैदिक धर्म में विश्वास रखते थे. आगे चलकर पंडित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए.

महर्षि दयानंद सरस्वती ने समाज सुधार के लिए बहुत सारे कार्य किए. वो अन्धविश्वासों और रूढिवादी कुरीतियों के खिलाफ लडे. उन्होंने काले गोरे भेदभाव और दलितों के उद्धार के लिए भी कार्य किए. उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रबल आन्दोलन किया. उन्होंने बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया. यह भी पढ़ें: Dr. Ambedkar Jayanti 2019: 14 अप्रैल को धूम-धाम से मनाई जाती है अंबेडकर जयंती, जानें उनकी जिंदगी से जुड़ी रोचक बातें

मूर्ति पूजा और अंधविश्वास के विरोधी:

स्वामी दयानंद सरस्वती अंधविश्वास के विरोधी थे, वे मूर्तिपूजा का विरोध करते थे. जिसकी वजह से उन्हें कई बार मारने की भी कोशिश की गई. इसके बाद भी वे नहीं रुके और एक समाज सुधारक के रूप में कार्य करते रहे. मूर्ति पूजा के खिलाफत के पीछे भी एक कहानी है. स्वामी दयानन्द सरस्वती शिवजी के बहुत बड़े भक्त थे, एक बार उन्होंने कुछ चूहों को शिवलिंग पर पड़े प्रसाद को खाते हुए देखा और वे देखकर वे हैरान हो गए, और सोचा जो ईश्वर स्वयं पर चढ़े प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वो मानवता की रक्षा कैसे करेगा? तबसे वे मूर्ति पूजा के खिलाफ हो गए. माता पिता ने उनका विवाह कराना चाहा लेकिन वो विवाह न कर सत्य की खोज में निकल पड़े.

आर्य समाज की स्थापना:

महर्षि दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को साल 1875 को गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की. आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना.

30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दौरान एक षड़यंत्र में उनकी मृत्यु हो गई. स्वामी जी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ थे, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि उन्हें दूध में कांच मिलकर पिला दिया गया, तबियत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन उनकी हालत ख़राब होती चली गई और आखिर में उन्होंने देह त्याग दिया.