भारत में अधिकांश हिंदू पर्व किसी ना किसी रूप से फसलों और किसानों से जुड़े होते हैं. ऐसा ही एक पर्व है बोहाग बिहू, जिसे रोंगाली बिहू भी कहते हैं. सात दिवसीय इस पर्व का असम के लोगों में विशेष महत्व है. यह सौर कैलेंडर का पहला दिन होता है. वस्तुतः बिहू का पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है. यह तीनों बिहू तीन अलग-अलग कृषि चक्रों को दर्शाता है, जिसे भोगली बिहू, बोहाग बिहू और रंगाली बिहू. यहां हम चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से सप्तमी तक चलने वाले बोहाग बिहू की बात करेंगे, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 14 अप्रैल से 20 अप्रैल 2025 तक चलेगा.
बोहाग बिहू का महत्व
बोहाग बिहू फसलों की कटाई के मौसम और वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है. खुशियों से भरे इस पर्व पर लोग गाते, बजाते, नृत्य करते हुए जश्न मनाते हैं. यह जश्न सात दिनों तक चलता है. इस पर्व पर स्नान ध्यान के पश्चात नये वस्त्र धारण करते हैं. मवेशियों की सेवा एवं पूजा आदि करते हैं. घर के वयोवृद्ध से आशीर्वाद ग्रहण करते हैं. यह पर्व सात चरणों छोट, राती, गोलू, मनुह, कुटुम मेला और चेरा में सेलिब्रेट किया जाता है. यह भी पढ़ें : Mahavir Jayanti 2025 Messages: हैप्पी महावीर जयंती! दोस्तों-रिश्तेदारों संग शेयर करें ये हिंदी Quotes, WhatsApp Wishes और GIF Greetings
बोहाग बिहू सेलिब्रेशन!
इस सात दिवसीय पर्व के दौरान असम का नजारा देखते बनता है. लोग अपने-अपने मवेशियों को रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं, उनका श्रृंगार करते हैं, उनकी पूजा करते है. इसके साथ-साथ युवक और युवतियां रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान धोती, गमछा, और सादर मेखला आदि पहनकर पूरी तरह पर्व के मूड में होते हैं. वे बिहू गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं. जगह-जगह मेलों का आयोजन होता है, लोग असमिया मेले का आनंद लेते हैं, जहां विभिन्न किस्म के असमिया व्यंजनों का भी रसास्वादन करते हैं.
बोहाग बिहू सात दिवसीय परंपराएं
बोहाग बिहु साल में तीन बार, तीन प्रकार से मनाये जाते हैं, जिन्हें रोंगाली बिहू, कटि बिहू, और बोहाग बिहू के नाम से जाना जाता है. यह पर्व पूरी तरह फसलों से संबंधित होते हैं. जो बीज बोने, पौधों की बुवाई-रोपाई एवं कटाई पर आधारित होते हैं. यह पर्व सात दिन तक चलता है.
पहले दिन को ‘गरु बिहू’ कहते हैं, इस दिन मवेशियों को नदी या तालाब में नहला कर उनकी कल्याण स्वरूप उनकी सुरक्षा की प्रार्थना की जाती है. अगले दिन को ‘मनुह बिहू’ कहते हैं. इस दिन लोग हल्दी का लेप लगाकर स्नान करते हैं, और सपरिवार साथ में भोजन करते हैं, और नाते-रिश्तेदारों को खाने पर आमंत्रित करते हैं. तीसरे दिन को गुक्साई बिहू और चौथे दिन को तातोर बिहू कहते हैं, जब घरेलू देवताओं की पूजा होती है.













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