बिहार में इस बार जब पुल टूटा तो राहत की बात यह रही कि जानमाल का नुकसान नहीं हुआ. उत्तर और पूर्व बिहार को भागलपुर जिले से जोड़ने वाली गंगा नदी पर बने 4.70 किमी लंबे विक्रमशिला सेतु का उद्घाटन 2001 में हुआ था.इस मई बिहार में एक बार फिर एक पुल टूट गया. 2001 में इस विक्रमशिला सेतु का उद्घाटन करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कहा था कि इसे 100 साल के लिए बनाया गया है. राहत की बात यह रही कि पुल का 34 मीटर का वह हिस्सा जो देर रात टूट कर गंगा नदी में गिर गया, उसके एक्सपेंशन ज्वाइंट में दरार आने की सूचना के बाद वाहनों का परिचालन पहले ही रोक दिया गया था और इसलिए किसी की जान नहीं गई.
अप्रैल में ही आईआईटी, पटना की एक टीम ने पुल पर ट्रैफिक लोड कम करने का सुझाव दिया था. दुर्घटना के बाद पुल पर आवाजाही नहीं रोकने के आरोप में राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर साकेत कुमार रौशन को निलंबित कर दिया गया है. हादसे के बाद आईआईटी और एनआईटी, पटना की टीम ने पाया कि भार वहन क्षमता से अधिक भार वाले (ओवरलोड) वाहनों के परिचालन व काफी देर तक पुल पर लगने वाले जाम के कारण बेयरिंग पर अतिरिक्त दबाव बना, जिससे स्ट्रक्चर गिर पड़ा.
2019 में ही पुल निर्माण निगम ने स्वीकार किया था कि 20 टन से अधिक भार वाले वाहनों को इस पुल से नहीं गुजरना चाहिए. लेकिन, इससे 55 टन भार वाले वाहन बेरोकटोक गुजरते रहे. अब पुल पर यथाशीघ्र आवागमन चालू करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से बात कर विकल्प के तौर पर बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) द्वारा बेली ब्रिज निर्माण के संबंध में सहयोग मांगा. उनकी मांग पर बीआरओ विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त हिस्से के करीब आठ मीटर पीछे से 'बेली ब्रिज' बनाएगा.
बेली ब्रिज विशेष प्रकार का एक ब्रिज है, जिसे बगैर किसी भारी मशीनरी की सहायता के असेंबल किया जाता है. पुल लोहे के स्क्वायर पैनलों को पिन के जरिए एक-दूसरे से जोड़ कर बनाया जाता है. इसका आविष्कार द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश इंजीनियर डोनाल्ड बेली ने किया था. बीआरओ की टीम अभियंताओं के साथ सेतु ऊपरी व अंदरूनी हिस्से की जांच कर चुकी है. बीआरओ, पथ निर्माण विभाग और एनएच डिवीजन की संयुक्त बैठक में यह निष्कर्ष निकला है कि सारे पिलरों की बेयरिंग खराब है तथा पुल के दो स्पैन को तोड़कर नए सिरे से बनाना होगा.
रखरखाव में लापरवाही की हद
इस पुल का निर्माण यूपी ब्रिज कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा किया गया था. 2018 में 16 करोड़ की लागत से इसकी मरम्मत की गई थी. यह मेंटेनेंस तब की गई, जब पुल की जांच के बाद आईआईटी, दिल्ली की टीम ने पुल की मजबूती को लेकर सवाल खड़े किए थे. लेकिन, पिछले आठ वर्षों से इस पुल की समुचित मरम्मत नहीं की गई. जांच रिपोर्ट फाइलों में ही दौड़ती रहीं. 2024 में एनएच के तत्कालीन चीफ इंजीनियर उमाशंकर प्रसाद ने पुल का निरीक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पुल के 60 एक्सपेंशन ज्वाइंट में से छह का गैप बढ़ गया था और 22 जगहों पर चैंबर भी धंस गया था. इसके बाद इसी साल अप्रैल-जून में किसी एक्सपर्ट से पुल की जांच कराने के लिए मुख्यालय को पत्र लिखा गया.
तेज गर्मी सड़क, रेल और पुलों के लिए भी बड़ी आफत है
2025 में रिमाइंडर भी भेजा गया. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो एनएच डिविजन के इंजीनियरों ने खुद जांच की और पुल की चार पियर (पिलर का बाहरी घेरा) ठीक नहीं होने और दरार आने की रिपोर्ट मुख्यालय को भेजी. इस रिपोर्ट पर मार्च, 2026 में आईआईटी, पटना की टीम और राज्य पुल निर्माण निगम के इंजीनियरों ने बताया कि सेतु का मेन स्ट्रक्चर सुरक्षित है. इसके बाद पुल के बेयरिंग क्षतिग्रस्त होने संबंधी रिपोर्ट बीते 30 अप्रैल को भी मुख्यालय को भेजी गई थी. इस तरह करीब दो साल तक मामला फाइलों में दौड़ता रहा और आखिरकार तीन मई की रात एक बजे पुल का 34 मीटर स्लैब टूटकर गंगा नदी में समा गया.
एनएच के निलंबित एक्जीक्यूटिव इंजीनियर साकेत कुमार का कहना है, ‘‘आईआईटी की टीम ने यथाशीघ्र मरम्मत की बात कही थी, जो पुल निर्माण निगम को करना था. उसने काम नहीं किया. मुख्यालय से पुल पर यातायात बंद करने संबंधी कोई निर्देश भी नहीं आया.'' बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के खगड़िया प्रमंडल द्वारा 36 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान तैयार कर करीब एक महीने पहले मुख्यालय को भेजा गया था. लेकिन, अब तक स्वीकृति नहीं मिली. कुल मिलाकर वाहनों के दबाव के अनुरूप न तो नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ और न ही समय पर व्यापक मरम्मत.
दो साल में टूट चुके एक दर्जन से अधिक पुल
बिहार में पुलों के गिरने का इतिहास पुराना है. पिछले दो साल में प्रदेश में एक दर्जन से अधिक पुल आंशिक या पूर्ण रूपेण ढह चुके हैं. 2024 के ही जून माह में मात्र दस दिनों के अंदर ही मधुबनी, सीवान, अररिया, किशनगंज और पूर्वी चंपारण में एक-एक करके पांच पुल धराशायी हो गए. इससे पहले मार्च में सुपौल जिले में कोसी नदी पर बन रहे पुल का एक हिस्सा ढह गया था.
राजनीतिक समीक्षक अरुण कुमार चौधरी कहते हैं, ‘‘आज भी ब्रिटिश शासन काल या उसके कुछ दिनों बाद बनाए पुल खड़े हैं तो इस पुल की हालत महज 25 वर्ष में ही ऐसी क्यों हो गई. याद कीजिए, निर्माण के वक्त ही गंगा नदी की तेज धारा और स्ट्रक्चरल दोष को लेकर यह पुल काफी चर्चा में रहा था.'' इसके समानांतर बनाया जा रहा फोरलेन पुल तो निर्माण के बीच ही तीन बार गिर चुका है. इसका निर्माण करने वाली कंपनी बिहार में नौ हजार करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, आखिर क्यों. वहीं, नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एक वरीय इंजीनियर कहते हैं, ‘‘कमजोर नींव, डिजाइन में त्रुटि, घटिया सामग्री और भ्रष्टाचार का घुन, सब मिलकर निर्माण की गुणवत्ता को ही अंतत: प्रभावित करते हैं. ठेकेदारों-अधिकारियों का कॉकस तोड़ना होगा.''
फिर, पुल के रखरखाव की नीतियों में भी कमियां है. न तो एक्सपेंशन ज्वाइंट की बार-बार सफाई की जाती है और न ही बेयरिंग की समय पर मरम्मत होती है. बेयरिंग बदलने की बात तो दूर रही. अभी तो भारी बारिश और बाढ़ का बहाना भी नहीं किया जा सकता. पुल विशेषज्ञ सत्यव्रत देव कहते हैं, "विक्रमशिला सेतु वाली स्थिति आने की कई वजहें होती हैं. इस परिस्थिति में सभी स्पैन (स्लैब) की जांच जरूरी है. ताकि उसके अनुसार ही मरम्मत या रिप्लेसमेंट किया जा सके. जो स्पैन डैमेज है, उसे तोड़कर गिराना ही उपाय है."
कई और पुलों की हालत खराब
राज्य के पूर्णिया, सहरसा, बांका, कटिहार, खगड़िया, बक्सर, सासाराम, वैशाली, जमुई, लखीसराय तथा पूर्वी व पश्चिम चंपारण में ऐसे कई पुल हैं, जिनकी हालत खस्ताहाल है. इनमें जमुई जिले में खैरा-सोनो मुख्य मार्ग पर दो पुल तो साल 2017 और 2018 में ही बने थे. घटिया निर्माण के कारण 2021 में ही दोनों पुल टूट गए.
क्या भ्रष्टाचार के बोझ से टूट रहे हैं बिहार के पुल
वहीं, दूसरी तरफ वैशाली जिले के हाजीपुर और सारण जिले के सोनपुर को जोड़ने वाला ब्रिटिशकालीन पुराना गंडक पुल 150 साल का हो चुका है. अभी भी दोपहिया और हल्के वाहनों का आवागमन इस पुल से हो रहा है. तभी तो बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं, ‘‘बिहार में 21 वर्षों की एनडीए सरकार में पुल गिरने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है. पिछले दो साल में बिहार में सौ से अधिक पुल-पुलिया गिरे हैं. तभी तो बिहार भ्रष्टाचार में शीर्ष पर है.''
राज्य सरकार ने पुल मेंटेनेंस पॉलिसी के तहत प्रदेश के सभी बड़े पुलों का एसओपी के अनुसार ऑडिट किए जाने का निर्देश दिया है. पुल विशेषज्ञ सत्यव्रत देव कहते हैं कि पुल केवल दो किनारों को ही नहीं जोड़ता है, बल्कि उस क्षेत्र विशेष की लॉजिस्टिक्स, व्यापारिक व औद्योगिक गतिविधियों का एक प्रमुख आधार होता है, जो अंततः: पूरी आर्थिकी को प्रभावित करता है. इसलिए गुणवत्ता निर्माण के साथ ही रखरखाव की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी.













QuickLY