कानून और कोर्ट के आदेशों के बावजूद भारत में क्यों नहीं थमी रैगिंग?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

2009 में रैगिंग के कारण 19 वर्षीय मेडिकल छात्र की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था. जिसके बाद यूजीसी गाइडलाइंस, एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन और कई नियम लागू किए गए. बावजूद इनके रैगिंग की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं.हाल ही में ग्रेटर नोएडा की बेनेट यूनिवर्सिटी में कथित रैगिंग और मारपीट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद खड़ा हो गया. वीडियो यूनिवर्सिटी के हॉस्टल रूम का बताया जा रहा है. कुछ छात्राएं एक लड़की को घेरकर खड़ी हैं. छात्राएं उससे बार-बार 'सॉरी' बोलने को कहती हैं. इसी दौरान एक छात्रा उसे थप्पड़ मारती और अपशब्द बोलते हुए नजर आती है. सोशल मीडिया पर इस घटना को रैगिंग से जोड़कर देखा जा रहा है. पुलिस के अनुसार यह घटना दो हफ्ते पुरानी है. मामले पर विश्वविद्यालय ने शुरुआती तौर पर इसे छात्रों के बीच 'आपसी विवाद' बताया जबकि दादरी पुलिस ने जांच शुरू कर दी है.

दिल्ली स्थित एंटी-रैगिंग संगठन, 'सोसाइटी अगेंस्ट वायलेंस इन एजुकेशन,' (सेव) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 से 2024 के बीच देश में रैगिंग से जुड़ी मौतों के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साल 2022 में रैगिंग से संबंधित 14 मौतें हुईं. अगले ही साल 2023 में यह बढ़कर 17 हो गई, जबकि 2024 में ऐसे मामलों की संख्या 20 तक पहुंच गई. यानी कुल 51 मौतें.

यह रिपोर्ट नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज 3,156 शिकायतों और 1,946 कॉलेजों से आए मामलों के आधार पर तैयार की गई है. मेडिकल कॉलेजों से रैगिंग की सबसे ज्यादा शिकायतें सामने आई हैं. कुल शिकायतों में 38.6 प्रतिशत मामले इन्हीं कॉलेजों से जुड़े हैं.

रैगिंग को लेकर क्या हैं नियम?

नोएडा के कॉलेज में जो हुआ, वह चर्चा में आया पहला मामला नहीं है. लगभग 17 साल पहले 2009 में अमन काचरू की रैगिंग से मौत ने देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया था. वह हिमाचल प्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने गए थे. नवंबर 2024 में गुजरात के एक मेडिकल कॉलेज में 18 वर्षीय छात्र अनिल मेथानिया की हार्ट फेल होने से मौत हो गई. आरोप था कि रैगिंग के दौरान उन्हें लगातार तीन घंटे तक खड़ा रखा गया.

इसी साल 8 अप्रैल को तमिल नाडु के इंदिरा मेडिकल कॉलेज के छात्र एशर इमैनुएल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर सामने आई. परिवार का आरोप है कि घटना वाले दिन उसके साथ मारपीट की गई थी. एशर ने अपने भाई अभिषेक को दोपहर 2 बजे मैसेज भेजा था, 'मुझे मदद चाहिए. सीनियर्स आज शाम मुझे पीटने वाले हैं.' उसने नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर भी शिकायत की थी.

शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग की समस्या से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में केंद्रीय जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक आर. के. राघवन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. समिति ने 2007 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. उन्होंने रैगिंग को 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' बताया. जिसके बाद नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन की शुरुआत हुई.

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इसी समिति की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आधार पर 2009 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने नियम जारी किए. इस ढांचे में 24x7 हेल्पलाइन नंबर, प्रशिक्षित रिस्पॉन्डर्स, रियल-टाइम केस ट्रैकिंग, गुमनाम शिकायत की सुविधा, अभिभावकों को रोजाना ईमेल अपडेट और कॉलेजों में वार्षिक सर्वे जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं. साथ ही कॉलेजों में एंटी-रैगिंग समिति, एंटी-रैगिंग स्क्वॉड और छात्रों से एंटी-रैगिंग शपथ पत्र जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की गईं. पिछले साल यूजीसी ने एंटी-रैगिंग नियमों का पालन न करने पर 89 विश्वविद्यालयों को नोटिस भी जारी किया था.

रैगिंग के बढ़ते आंकड़े

'रैगिंग' का आसान शब्दों में अर्थ है: 'किसी स्टूडेंट के साथ मजाक, बदसलूकी, अपशब्द, डराने-धमकाने या जबरदस्ती ऐसा काम करवाना, जिससे उसे शर्मिंदगी, डर, मानसिक तनाव या शारीरिक तकलीफ महसूस हो.' सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2016 में 515 और 2017 में 901 शिकायतें दर्ज की गईं. 2018 में भी रैगिंग से जुड़ी शिकायतों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा और कुल 1,016 शिकायतें मिलीं. वहीं, 2019 में शिकायतों की संख्या बढ़कर 1,070 तक पहुंच गई.

कोविड-19 के दौरान कॉलेज बंद रहने की वजह से 2020 में इस संख्या में 79.5 प्रतिशत गिरावट आई. उस साल 219 शिकायतें दर्ज हुई. हालांकि संस्थान खुलने के बाद मामलों में एक बार फिर तेजी देखने को मिली. 2021 में 532 शिकायतें आईं. यह 2020 की तुलना में 143 प्रतिशत अधिक थी.

साल 2022 में 883 और 2023 में 962 शिकायतें सामने आईं. 2024 में शिकायतों की संख्या 1,084 तक पहुंच गई. ये आंकड़े नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों के आधार पर है. इसके अलावा कई शिकायतें सीधे कॉलेजों और गंभीर मामलों में पुलिस के पास भी दर्ज होती हैं.

सरकारी आंकड़ें यह भी बताते हैं कि 2019-20 से 2023-24 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में भी इजाफा देखने को मिला है. 2019-20 में 173, 2020-21 में 182 और 2021-22 में 186 शिकायतें रिकॉर्ड की गईं.

एंटी-रैगिंग कानून के बावजूद कई कॉलेजों में होती है लापरवाही

सेव फाउंडेशन की लीगल हेड और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता मीरा कौरा पटेल डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में कहती हैं कि रैगिंग के सबसे आम रूपों में अक्सर नए और जूनियर छात्रों से जबरदस्ती नाचने या गाने के लिए कहा जाता है. वह बताती हैं, "आजकल कई मामलों में छात्रों को अश्लील तरीके से व्यवहार करने के लिए मजबूर किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं. जब किसी छात्र के साथ मारपीट, अपशब्द या जातिसूचक टिप्पणी की जाती है, तो वह न सिर्फ रैगिंग बल्कि आपराधिक मामला भी बन जाता है. उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में रैगिंग संज्ञेय अपराध (कॉग्निजिबल ऑफेंस) है. लेकिन हर राज्य में ऐसा नहीं है. इसी वजह से हर जगह रैगिंग के मामलों में एफआईआर दर्ज करना आसान नहीं होता."

भारत में रैगिंग को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर यूजीसी के नियम लागू हैं. कई राज्यों में अपने अलग एंटी-रैगिंग कानून मौजूद हैं. त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल समेत 12 राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में रैगिंग को लेकर विशेष कानून और सख्त प्रावधान हैं.

छात्रों को एडमिशन लेते समय एंटी-रैगिंग शपथपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाता है. मीरा कौरा का कहना है कि इसके बावजूद कॉलेज प्रशासन की ओर से सख्त निगरानी की कमी देखने को मिलती है. वे बताती हैं, "अपनी छवि को बचाकर रखने के लिए अक्सर रैगिंग के मामलों को 'आपसी मतभेद' बताकर दबा दिया जाता है. कई हॉस्टलों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे होते. कई हॉस्टल वार्डन भी ध्यान नहीं देते. हमारे सामने ऐसे बहुत कम मामले हैं जहां रैगिंग के लिए सजा सुनाई गई हो. इससे छात्रों का हौसला बढ़ जाता है."