ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर विपक्ष की चुप्पी का क्या है राज?
भारत में 2014 के बाद के चुनावों में 'हिंदू वोट की ताकत' का एहसास होने के बाद ज्ञानवापी मस्जिद विवाद ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों को 'कैच 22' की स्थिति में ला दिया है. विपक्षी दल, खासकर उत्तर प्रदेश के लोग, इस मुद्दे पर कोई रुख तय नहीं कर पा रहे हैं.
लखनऊ, 17 सितंबर : भारत में 2014 के बाद के चुनावों में 'हिंदू वोट की ताकत' का एहसास होने के बाद ज्ञानवापी मस्जिद विवाद ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों को 'कैच 22' की स्थिति में ला दिया है. विपक्षी दल, खासकर उत्तर प्रदेश के लोग, इस मुद्दे पर कोई रुख तय नहीं कर पा रहे हैं. यदि वे हिंदू याचिकाकर्ताओं का समर्थन करते हैं, तो वे मुस्लिम समर्थन से हार जाएंगे, और यदि वे मुसलमानों के साथ हैं, तो उन्हें 'हिंदू विरोधी' करार दिया जाएगा. समाजवादी पार्टी, जो उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल है, ने ज्ञानवापी विवाद पर वाराणसी के फैसले पर स्पष्ट रुख अपनाने से परहेज किया है, हालांकि अखिलेश यादव भाजपा पर चुनावी लाभ के लिए सांप्रदायिक मुद्दों को भड़काने का आरोप लगाते रहे हैं.
इससे पहले विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने हिंदुओं में पत्थर रखने और उसकी पूजा करने की प्रवृत्ति के बारे में एक टिप्पणी की थी. उन पर हिंदू धर्म का अपमान करने का आरोप लगाते हुए भाजपा की पूरी टीम उन पर टूट पड़ी. इस तरह के आरोपों की अंतर्निहित शक्ति ने अखिलेश यादव को जल्दबाजी में पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख को पता चलता है कि अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए, उन्हें मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं के समर्थन की जरूत है, और ज्ञानवापी विवाद का पक्ष लेने से उन्हें एक समुदाय या दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाएगा. आजमगढ़ और रामपुर में लोकसभा उपचुनावों में सपा को जो हार का सामना करना पड़ा - दोनों मुस्लिम बहुल सीटें - ने पार्टी नेतृत्व को और परेशान कर दिया है. यह भी पढ़ें : राज्य विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर नहीं होने दूंगा: केरल के राज्यपाल
शफीकुर रहमान बरक और एस.टी. जैसे मुस्लिम सांसदों को छोड़कर सपा के शीर्ष नेताओं में से कोई भी नहीं. हसन ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है. बहुजन समाज पार्टी को भी इसी तरह की दुविधा का सामना करना पड़ रहा है और पार्टी भी देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए भाजपा की आलोचना करते हुए एक प्रथागत बयान जारी करने से आगे नहीं बढ़ी है.
विधानसभा चुनावों के बाद समाजवादी पार्टी से मोहभंग होने के बारे में कहा जाता है कि बसपा मुसलमानों पर जीत हासिल करने के प्रयासों को फिर से शुरू कर रही है. लेकिन जहां बसपा अध्यक्ष मायावती मुस्लिमों को अपनी पार्टी में वापस लाने के लिए प्रयास कर रही हैं, वहीं वाराणसी के फैसले पर उनकी घबराहट और एक स्टैंड लेने में असमर्थता उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भ्रमित कर रही है. बसपा के एक पूर्व मुस्लिम विधायक ने कहा, "जब हम अपने लोगों से बात करते हैं, तो वे काशी और मथुरा पर बसपा के रुख को जानना चाहते हैं और हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है, क्योंकि हमारे नेता अनिर्णीत लगते हैं."
इस स्थिति में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बात भाजपा के सहयोगियों की चुप्पी है, जिन्होंने अब तक इस विवाद में शामिल होने से इनकार किया है. अपना दल और निषाद पार्टी ने ज्ञानवापी मुद्दे पर कोई बयान जारी नहीं किया है, जो यह दशार्ता है कि वे इसे सुरक्षित खेल रहे हैं और अल्पसंख्यकों के साथ अपने जातिगत समीकरणों को भी खराब नहीं करना चाहते हैं. कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है और इसके नेता, जो अक्सर इस तरह के मुद्दों पर अपनी राय देने में उलझे रहते हैं, इस बार चुप दिख रहे हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 17, 2022 03:54 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

