कितनी खतरनाक हैं ईरान की खुफिया एजेंसियां जर्मनी में
ईरान की खुफिया एजेंसियां विदेशों में निर्वासन में रह रहे ईरानी नागरिकों को निशाना बना रही हैं.
ईरान की खुफिया एजेंसियां विदेशों में निर्वासन में रह रहे ईरानी नागरिकों को निशाना बना रही हैं. माना जाता है कि ईरान में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद से यह एजेंसियां हजारों मौतों का कारण रही हैं.ईरान की सरकार बेहद बर्बरता और बेरहमी के साथ दिसंबर में शुरू हुए जनआंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही है. इस कारण दुनिया भर में निर्वासन में रह रहे ईरानी लोग अपने परिवार और दोस्तों की सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं. जर्मनी के संघीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 तक जर्मनी में ईरानी मूल के लगभग 2 लाख 95 हजार लोग रह रहे थे. इनमें से करीब आधी आबादी के पास 2021 में जर्मन नागरिकता थी.
ईरान में रह रहे अपने रिश्तेदारों के साथ-साथ, जर्मनी में रहने वाले कई ईरानी अपनी खुद की सुरक्षा को लेकर भी चिंता में हैं. यह डर खास तौर पर उन लोगों में अधिक है, जो राजनीति या पत्रकारिता में सक्रिय हैं. जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी के मुताबिक, ऐसे लोगों के ईरानी खुफिया एजेंसियों के निशाने पर आने की संभावना अधिक है. ईरानी खुफिया एजेंसियां जर्मनी में काफी सक्रिय हैं और खतरनाक मानी जाती हैं. उनका मकसद विरोधी गतिविधियों को दबाना और लोगों पर दबाव डालकर उनसे सहयोग लेना है, ताकि विदेशों में रह रहे शासन के विरोधियों पर जासूसी की जा सके.
जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी, संघीय संविधान संरक्षण कार्यालय (बीएफवी) ने डीडब्ल्यू के एक सवाल के जवाब में लिखा, "मौजूदा हालात को देखते हुए यह माना जा सकता है कि ईरानी खुफिया एजेंसियां विदेशों में अपनी कार्रवाई और उत्पीड़न अधिक बढ़ा सकती हैं.” एजेंसी के अनुसार, "विदेशों में रह रहे विरोधी संगठनों और प्रवासी समुदाय के लोगों के खिलाफ ईरानी खुफिया एजेंसियां कई तरीके अपनाती हैं. इसमें निशाना बनाकर जासूसी करना, बदनाम करना, डराना-धमकाना, धमकियां देना और यहां तक कि हिंसा का इस्तेमाल भी शामिल है.”
अपहरण और सुनियोजित हत्याएं
ईरान में शासन की बढ़ती हिंसा के मद्देनजर ऐसे आकलन काफी डरावने लगते हैं, लेकिन असल में यही सच्चाई है. कहा जा रहा है कि सरकार विरोधी आंदोलन के सिलसिले में अब तक कई हजार लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि, गिरफ्तारियों और मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है.
पुख्ता तरीके से यह कहना मुश्किल है कि हालिया विरोध प्रदर्शनों के तुरंत बाद ईरानी खुफिया एजेंसियों ने जर्मनी में अपनी गतिविधियां बढ़ाई है या नहीं. हालांकि, बीएफवी के कई सालों की निगरानी का निष्कर्ष आज भी सच है, "ईरानी खुफिया एजेंसियों की जासूसी गतिविधियां अक्सर राज्य-प्रायोजित आतंकवादी कार्रवाइयों की योजना बनाने के लिए होती हैं, जिसमें व्यक्ति विशेष का अपहरण करना या उसकी हत्या करना भी शामिल हो सकता है.”
जर्मन-ईरानी जमशेद शारमाद का अपहरण और हत्या
जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी, बीएफवी ने चेतावनी दी है कि जर्मनी में रहने वाले लोग भी इन कार्रवाइयों का शिकार हो सकते हैं. यह चेतावनी विशेष रूप से एक खास व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में दी गई थी, जिसके पास ईरान और जर्मनी दोनों की नागरिकता थी. 2020 में ईरान के पड़ोसी देश की यात्रा के दौरान जमशेद शारमाद का अपहरण कर लिया गया था. शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, अपहरण के लगभग चार साल बाद उन्हें मौत की सजा दे दी गई थी. हालांकि, बाद में आई रिपोर्टों में कहा गया कि नियोजित तारीख के कुछ समय पहले ही उनकी मौत हो चुकी थी.
बीएफवी का मानना है कि इसमें एक पैटर्न साफ दिखता है. एजेंसी के अनुसार, "यह माना जा सकता है कि ईरान आगे भी पश्चिमी देशों के नागरिकों को झूठे आरोपों में गिरफ्तार करता रहेगा और उन्हें एक तरह की "बंधक-नीति” के तहत दबाव बनाने या सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल करता रह सकता है.”
खतरनाक है ईरान के पड़ोसी देशों में यात्रा
ऐसे मामलों के कारण ही बीएफवी ने ईरान और उसके पड़ोसी देशों की यात्रा करने के खिलाफ कई बार चेतावनी दी है. एजेंसी के अनुसार, "ईरानी खुफिया एजेंसियां ईरान में प्रवेश करने वाले लोगों से जानकारी लेने के लिए आक्रामक और दबाव बनाने वाले तरीकों का इस्तेमाल करती हैं, जिसके कारण लोगों को हिरासत में लिया जाता है और उनसे कई दिनों तक पूछताछ की जाती है.”
2024 में जमशेद शारमाद की मौत के बाद जर्मन सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फ्रैंकफर्ट, म्यूनिख और हैम्बर्ग में स्थित ईरान के तीन कांसुलेट बंद कर दिए थे. जिसके बाद कई राजनयिकों को जर्मनी छोड़ कर जाना पड़ा था. अब जर्मनी में ईरान की केवल एक ही राजनयिक मौजूदगी बची है, जो कि बर्लिन स्थित उसके दूतावास में है.
इन दूतावासों के बंद होने से ईरानी शासन के लिए जर्मनी में राजनयिकों के भेष में जासूस तैनात करना मुश्किल हो गया है. यह तरीका आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है. ईरान पर लंबे समय से लगे आर्थिक प्रतिबंधों के कारण उसके लिए जासूसी करना अहम बन जाता है ताकि वह अपने विवादित परमाणु कार्यक्रम के लिए जरूरी विशेषज्ञता हासिल कर सके.
साइबर हमलों से विपक्ष पर निशाना
बीएफवी के अनुसार, तकरीबन 2013 से साइबर जासूसी ईरानी खुफिया एजेंसियों की रणनीति का हिस्सा रही है. इसमें आर्थिक हितों के साथ-साथ उन लोगों को डराने की कोशिश भी शामिल है, जिन्हें शासन अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है यानी ऐसे लोग, जो अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों की वकालत करते हैं.
बीएफवी ने डीडब्ल्यू को बताया कि इसके जरिए प्रवासी लोगों के निजी ईमेल और सोशल मीडिया अकाउंट्स पर हमले किए जाते हैं. इसके बाद चुराए गए डेटा का इस्तेमाल प्रभावित लोगों की गतिविधियों का ब्यौरा तैयार करने, उनके रोजमर्रा की जिंदगी की जांच करने और उनके निजी व पेशेवर संपर्कों का पता लगाने के लिए किया जाता है.
इस्राएली और यहूदी संस्थानों पर हो सकता है हमला
जर्मनी में ईरान की खुफिया गतिविधियां सिर्फ औद्योगिक जासूसी या ईरान सरकार का विरोध करने वाले प्रवासी पुरुष और महिला ईरानियों की निगरानी तक ही सीमित नहीं हैं.
नवंबर 2022 में नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया के बोखुम शहर में एक यहूदी उपासना स्थल सिनेगॉग के पास स्थित एक स्कूल पर आग लगाने वाला उपकरण फेंका गया, जिससे उसे काफी नुकसान पहुंचा. अगले साल, ड्यूसेलडॉर्फ की उच्च क्षेत्रीय अदालत ने इस मामले में एक व्यक्ति को कई साल की जेल की सजा सुनाई. अदालत ने यह भी पाया कि इस हमले की योजना ईरान की एक सरकारी एजेंसी ने बनाई थी.
(The above story first appeared on LatestLY on Jan 21, 2026 11:20 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

