ओरियो, कैडबरी और टोबलरोन जैसे लोकप्रिय ब्रांडों की निर्माता कंपनी मोंडेलेज़ इंटरनेशनल इन दिनों एक बड़े विवाद में घिर गई है. पशु अधिकार संगठन PETA (People for the Ethical Treatment of Animals) ने कंपनी पर आरोप लगाया है कि वह "पोषण विज्ञान" के नाम पर अब भी हानिकारक पशु परीक्षण को समर्थन दे रही है. का आरोप है कि मोंडेलेज़ चूहों को जबरन मानव मल बैक्टीरिया, रसायन, कांच के मोती और ग्लूकोज खिलाने जैसे प्रयोगों को वित्तपोषित कर रही है. इस तरह के प्रयोगों का न तो कोई वैज्ञानिक आधार है, न ही कोई कानूनी आवश्यकता. यह भी पढ़ें: मेडिकल साइंस में चमत्कार! पानी वैज्ञानिकों ने जीन एडिटिंग से Down Syndrome को दी मात, CRISPR तकनीक का कमाल
1.28 लाख उपभोक्ताओं का विरोध: ‘बिना प्रयोग किए खाएं’ मुहिम को समर्थन
इन खुलासों के बाद, दुनियाभर में उपभोक्ताओं में रोष है. PETA इंडिया सहित PETA US, PETA जर्मनी, PETA यूके, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, लैटिनो और पेटा2 के ज़रिए अब तक 1.28 लाख से अधिक उपभोक्ताओं ने मोंडेलेज़ को पत्र लिखकर पशु परीक्षण बंद करने की मांग की है. इन उपभोक्ताओं ने कंपनी से आग्रह किया है कि वह PETA के ‘Eat Without Experiments’ (बिना प्रयोग किए खाएं) कार्यक्रम में शामिल हो जाए, जैसा कि फेरेरो और यूनिलीवर सहित 400 से ज़्यादा कंपनियां पहले ही कर चुकी हैं.
पुरानी नीति पर सवाल: सीमित प्रतिबंध पर्याप्त नहीं?
मोंडेलेज़ ने 2018 में PETA US के साथ परामर्श के बाद पशु परीक्षण पर सीमित वैश्विक प्रतिबंध लगाया था. कंपनी का दावा है कि वह केवल कानून द्वारा अनिवार्य होने पर ही पशु परीक्षण की अनुमति देती है. हालांकि PETA का कहना है कि कंपनी अब भी "बुनियादी पोषण अनुसंधान" के नाम पर ऐसे परीक्षणों को चालू रखे हुए है, जिनका मानव स्वास्थ्य पर कोई व्यावहारिक प्रभाव नहीं पड़ता और जिन्हें इंसानों पर सुरक्षित तरीके से भी किया जा सकता है.
डॉ. अंजना अग्रवाल का बयान: “यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है”
PETA इंडिया की वैज्ञानिक और अनुसंधान नीति सलाहकार डॉ. अंजना अग्रवाल ने इस मुद्दे पर कड़ा बयान देते हुए कहा, "चूहों को हानिकारक मल बैक्टीरिया, रसायन और कांच के मोती खिलाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इस पर बहुत पहले ही प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए था."उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि ऐसे प्रयोग स्वेच्छा से सहमति देने वाले मानव स्वयंसेवकों पर सुरक्षित रूप से किए जा सकते हैं, जिससे प्रासंगिक वैज्ञानिक परिणाम भी प्राप्त होंगे और पशु क्रूरता से भी बचा जा सकेगा.
ब्रांड की साख पर असर
PETA का मानना है कि इन पशु परीक्षणों को जारी रखने या इनके लिए धन मुहैया कराने से मोंडेलेज़ की ब्रांड छवि को नुकसान हो रहा है. आज के जागरूक उपभोक्ता ऐसे नैतिक मुद्दों पर कड़े रुख के साथ कंपनियों से ज़िम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं. अब यह देखना बाकी है कि क्या मोंडेलेज़ अंतरराष्ट्रीय दबाव और उपभोक्ताओं की भावना को ध्यान में रखते हुए अपनी पशु परीक्षण नीति में बदलाव करता है या नहीं.
एनिमल टेस्टिंग: न्यूट्रीशन और ह्यूमन हेल्थ में कैसे होती है उपयोगी?
1. नए पोषक तत्वों और यौगिकों की सुरक्षा जांच
जब कोई नया फ़ूड इनग्रेडिएंट (खाद्य घटक) या वास्तु निर्मित होता है, तो वैज्ञानिक पहले इसकी जांच कर लें:
क्या यह शरीर के लिए सुरक्षित है?
कहीं यह विषैला (toxic) या हानिकारक तो नहीं?
इसमें जानवरों (जैसे चूहे या बंदर) पर परीक्षण करके यह देखा जाता है कि उस पोषक तत्व से उनका वजन, अंग, ब्लड शुगर, लिवर फ़ंक्शन, आदि पर कोई असर तो नहीं हो रहा.
2. पाचन और अवशोषण की प्रक्रिया का अध्ययन
कुछ प्रयोगों में वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि:
क्या इंसानी शरीर उस पोषक तत्व को पचा और अवशोषित कर पाएगा?
वह पोषक तत्व शरीर में जाकर कैसे काम करेगा?
चूहों जैसे जानवरों का पाचन तंत्र कुछ हद तक इंसानों से मिलता-जुलता होता है, इसलिए उन पर अध्ययन किए जाते हैं.
3. मानव बीमारियों का मॉडल
कभी-कभी वैज्ञानिक डायबिटीज़, मोटापा, या गैस्ट्रिक डिसऑर्डर जैसे रोगों को चूहों में कृत्रिम रूप से उत्पन्न करते हैं, ताकि यह देखा जा सके कि कोई नया फ़ूड या सप्लीमेंट उस पर कैसे असर डालता है.
उदाहरण:
अगर कोई सप्लीमेंट दावा करता है कि वह ब्लड शुगर कम करता है, तो वह पहले डायबिटिक चूहों पर आज़माया जाता है.
लेकिन समस्या कहाँ है? (Why it's controversial)
1. अनावश्यक और क्रूर प्रयोग
कई बार प्रयोग इस हद तक अमानवीय होते हैं जैसे:
जानवरों को जबरन इंसानी मल, रसायन या अन्य घटक खिलाना.
प्रयोग के बाद जानवरों को मारकर आंतरिक अंगों की जांच करना.
इन प्रयोगों का मानव स्वास्थ्य पर कोई स्पष्ट लाभ नहीं होता.
2. इंसानों पर प्रासंगिकता की कमी
जानवरों का शरीर इंसानों से बहुत अलग होता है
इसलिए कई बार जो परिणाम जानवरों पर सही निकलते हैं, वे इंसानों पर बिल्कुल लागू नहीं होते.
3. मानव आधारित विकल्प अब उपलब्ध हैं
आजकल ऐसे अध्ययन इंसानी सेल्स, ऑर्गन-ऑन-चिप, और स्वयंसेवकों पर क्लिनिकल ट्रायल्स से भी संभव हैं, जो कहीं अधिक नैतिक और वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय हैं.
यह मामला केवल एक कंपनी के निर्णय का नहीं, बल्कि एक वैश्विक नैतिक बहस का हिस्सा बन चुका है, जिसमें सवाल यह है कि क्या स्वाद, पोषण और विज्ञान के नाम पर आज भी निर्दोष जानवरों को यातना दी जानी चाहिए?













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