देश और दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की रफ्तार लगातार बढ़ रही है. इसी चिंता पर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन (M. Ravichandran) ने कहा कि भारत को अभी तेजी से बदलती जलवायु परिस्थितियों के प्रभावों से निपटने के लिए और तैयारियां करनी होंगी. गोवा स्थित नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशैनिक रिसर्च द्वारा आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पोलर साइंसेज (NCPS) में उन्होंने यह बातें कहीं.
रविचंद्रन ने कहा कि वर्ष 2047 तक ध्रुवीय क्षेत्रों की स्थिति बेहद अस्थिर हो सकती है. हिमालय में हर दिन पारिस्थितिकी तंत्र और जल भंडारण तेजी से घट रहा है. उन्होंने बताया, “करीब 2 अरब लोग हिमालयी ग्लेशियरों और वहां के जल स्रोतों पर निर्भर हैं. अंटार्कटिका में बर्फ तेजी से टूट रही है और भू-राजनीतिक चुनौतियां भी सामने हैं. हमें अभी से यह सोचने की जरूरत है कि इन बदलावों का सामना कैसे करेंगे.”
जलवायु शोध और आपदा प्रबंधन की जरूरत
रविचंद्रन ने जोर देकर कहा कि भारत को जलवायु परिवर्तन के असर को समझने और उसके अनुसार लचीलापन (resilience) विकसित करने के लिए गहन शोध करना होगा. उन्होंने कहा, “हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर पिघलना, भारी बारिश, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएं अब श्रृंखलाबद्ध तरीके से हो रही हैं. हमें इस पूरी प्रणाली को बेहतर तरीके से समझना होगा और आपदा प्रबंधन से जुड़े ठोस कदम उठाने होंगे.”
अंटार्कटिका में तेजी से बढ़ रहे बदलाव
सम्मेलन के मुख्य वक्ता और साइंटिफिक कमेटी ऑन अंटार्कटिक रिसर्च (SCAR) के अध्यक्ष गैरी विल्सन ने भी चेतावनी दी कि अंटार्कटिका में हो रहे बदलाव चिंताजनक हैं. उन्होंने कहा, “बर्फ का तेज़ी से पिघलना और समुद्र के स्तर में वृद्धि ही नहीं, बल्कि महासागरीय और वायुमंडलीय परिसंचरण में भी बदलाव हो रहा है. इसका असर पेंगुइन जैसे प्रतिष्ठित अंटार्कटिक प्रजातियों से लेकर स्थलीय पर्यावरण तक दिख रहा है.”
भारत की जलवायु रणनीति के लिए अहम संकेत
NCPS हर दो साल में आयोजित होने वाला एक राष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसमें देशभर के वैज्ञानिक उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव और हिमालय (जिसे तीसरा ध्रुव कहा जाता है) पर शोध साझा करते हैं. ये तीनों क्षेत्र पृथ्वी के सबसे बड़े बर्फ और मीठे पानी के भंडार माने जाते हैं.
यह अध्ययन और विशेषज्ञों की राय स्पष्ट करती है कि भारत को अपनी जलवायु नीतियों में तेजी लानी होगी. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, आपदा प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करना और ध्रुवीय क्षेत्रों पर अनुसंधान को बढ़ावा देना ही आने वाले समय में देश को जलवायु संकट से बचाने का रास्ता है.













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