भारतीय सर्राफा बाजार और वैश्विक कमोडिटी मार्केट में पिछले कुछ दिनों से सोने और चांदी की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट देखी जा रही है. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर चांदी की कीमतें अपने रिकॉर्ड उच्च स्तर से लगभग 30-40% तक नीचे आ गई हैं, जबकि सोने की कीमतों में भी भारी सुधार (Correction) दर्ज किया गया है. इस अचानक आई गिरावट ने निवेशकों और खरीदारों के बीच हलचल पैदा कर दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व में नेतृत्व परिवर्तन और भारत के केंद्रीय बजट जैसे कई महत्वपूर्ण कारक जिम्मेदार हैं.
डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व का प्रभाव
कीमती धातुओं के दाम गिरने का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की मजबूती को माना जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा केविन वॉर्श (Kevin Warsh) को अगले फेडरल रिजर्व चेयरमैन के रूप में नामित किए जाने की खबर ने बाजारों में हलचल मचा दी है. वॉर्श को एक 'हॉकिश' (कठोर नीति समर्थक) अर्थशास्त्री माना जाता है, जिससे डॉलर इंडेक्स में उछाल आया है. जब डॉलर मजबूत होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना और चांदी महंगे हो जाते हैं, जिससे उनकी मांग और कीमतों में कमी आती है.
बजट 2026 और घरेलू कारक
भारत में सोने-चांदी की कीमतों पर केंद्रीय बजट 2026 का सीधा असर देखने को मिला है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट में की गई घोषणाओं और आयात शुल्क (Import Duty) में कटौती की संभावनाओं को लेकर बनी अटकलों ने घरेलू बाजार में कीमतों को नीचे धकेला है. इसके अलावा, बजट सत्र के दौरान होने वाली विशेष ट्रेडिंग में भारी बिकवाली देखी गई, जिससे एमसीएक्स (MCX) पर सोने और चांदी के वायदा भाव में बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
भारी मुनाफावसूली और मार्जिन में वृद्धि
कीमतों में इस बड़ी गिरावट का एक तकनीकी कारण 'प्रॉफिट बुकिंग' यानी मुनाफावसूली भी है. जनवरी 2026 में सोने और चांदी ने अपने सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time high) को छू लिया था, जिसके बाद बड़े संस्थागत निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर बिकवाली शुरू कर दी. साथ ही, सीएमई ग्रुप (CME Group) द्वारा सोने और चांदी पर ट्रेडिंग मार्जिन बढ़ाने के फैसले ने भी कारोबारियों को अपनी पोजीशन कम करने पर मजबूर किया, जिससे बाजार में गिरावट और तेज हो गई.
क्या आगे भी जारी रहेगी गिरावट?
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में सोना और चांदी 'ओवरबॉट' ज़ोन से बाहर निकलकर स्थिर होने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव अब भी बने हुए हैं, जो लंबी अवधि में कीमतों को फिर से सहारा दे सकते हैं. फिलहाल, छोटे निवेशकों को बाजार की अस्थिरता को देखते हुए सावधानी बरतने और गिरावट पर धीरे-धीरे निवेश (Staggered investment) करने की सलाह दी जा रही है.













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