नयी दिल्ली, 15 जून इस वक्त जब पूरी दुनिया कोविड-19 के खौफ के साये में जी रही है, देश के बुजुर्गों को इसका डर नहीं सता रहा। उन्हें कुछ परेशान करता है तो वह है अपने ही परिवार से मिली मानसिक यातनाएं और दुर्व्यवहार।
चंपिया जो कुछ वर्षों में 90 साल की हो जाएंगी, उन्हें कोविड-19 से डर नहीं लगता।
उनका कहना है कि अपने बच्चों द्वारा वर्षों तक दी गई मानसिक प्रताड़ना और शारीरिक दुर्व्यवहार ने उन्हें “जीवन में किसी भी परिस्थिति’’ का सामना करने के लिए तैयार किया है।
इस बार के विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरुकता दिवस पर, चंपिया जैसे बुजुर्ग अपने प्रियजन से अलग होने से पहले झेले गए सदमों को याद करते हैं।
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दिल्ली के ‘मन का तिलक’ वृद्धाश्रम की निवासी उन बुरे वाकयों को याद करते हुए कहती हैं, “एक बार, मेरे एक बेटे ने मुझे इतनी जोर का थप्पड़ मारा था कि मुझे एक कान से सुनाई देना बंद हो गया था। मुझे आज भी याद है कि उसने मेरे बाल पकड़कर मुझे मेरे कमरे से बाहर निकाला और मुझे पीटता रहा।”
उन्होंने कहा, “मुझे बस इतना पता था कि समय कट रहा है क्योंकि मैं सूरज को उगते देख रही थी।”
वर्षों के दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के बाद, चंपिया की छोटी पोती ने उन्हें वहां से निकाला और उन्हें वृद्धाश्रम ले आई।
चंपिया ने कहा, “अब मुझे जीवन में किसी चीज का डर नहीं लगता, घातक कोरोना वायरस का भी नहीं।”
नोएडा के एक बेडरूम के अपार्टमेंट में 78 वर्षीय शबाना (परिवर्तित नाम) अकेले रहती हैं। वह पहले अपने बेटे के साथ रहती थी लेकिन दुर्व्यवहार शुरू होने के बाद उन्होंने अलग रहने का फैसला किया।
उन्होंने कहा, “पहले नजरअंदाज करना और फिर शाब्दिक दुर्व्यवहार शुरू हो गया। लेकिन जब उन्होंने मुझे खाना देना बंद कर दिया और मुझे खुद से व्यवस्था करने को कहा तो मैं समझ गई कि मुझे चले जाना चाहिए।”
शबाना ने बताया कि उनके दिवंगत पति ने उनके लिए कुछ पैसे छोड़े थे जिससे उन्होंने अपने लिए घर लिया। पिछले 10 साल से वह अकेले रह रही हैं और अपनी पेंशन पर गुजारा कर रही हैं।
रुक्मणि (70) याद करती हैं कि कैसे वह वृद्धाश्रम में फोन के सामने बैठकर अपने बेटे के फोन का घंटों और कई दिनों तक इंतजार करती रहीं लेकिन फोन की घंटी कभी नहीं बजी।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने छोटे बेटे के साथ रहती थी, लेकिन वह नौकरी ढूंढने के लिए संघर्ष कर रहा था। अंत में,उसने मेरे सामने माना कि वह मेरा ध्यान नहीं रख सकता और उसे मुझे भेजना ही होगा।”
उन्होंने कहा, “रातों रात, मेरी दुनिया बदल गई। मैंने उसके सामने हाथ जोड़कर भीख मांगी कि मैं कुछ भी करुंगी लेकिन उसने एक न सुनी और मुझे वृद्धाश्रम छोड़ गया।”
राजेश (परिवर्तित नाम) को उसके बेटे ने दिसंबर की सर्द रात उसे सड़क पर फेंक दिया था।
वह अब अपनी बहन के साथ रहते हैं लेकिन कहा कि उन्हें अपने बेटे द्वारा पीटे जाने के बुरे सपने अक्सर आते हैं।
उनहोंने उम्मीद जताई कि किसी को भी ऐसी यातनाएं न झेलनी पड़ी और लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता के प्रति करुणा भाव रखें।
मनोचिकित्सक राबिया हसन के मुताबकि, ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि भले ही हर बुजुर्ग के साथ अत्यधिक दुर्व्यवहार न होता हो लेकिन उन्हें किसी न किसी न किसी तरह नजरअंदाज किया जाता है।
हासन सलाह देती हैं कि लोगों को अपने बुजुर्ग परिजन को नियमित कार्यों में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उन्हें लगे कि वे भी परिवार का हिस्सा हैं और उनकी जरूरत है।
उन्होंने कहा कि हम बुजुर्गों को कानूनी दांव-पेंच भी समझाते हैं ताकि वे जागरुक रहें और खुद को दुर्व्यवहार से बचाए रखें।
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