क्यों दुखद है बिना अपनी पहचान बनाए किसी जीवन का मिट जाना
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

समुद्र में नई प्रजातियां लगातार खोजी जा रही हैं, लेकिन कई जीव विज्ञान की किताबों तक पहुंचने से पहले ही खत्म होने की कगार पर हैं. विशेषज्ञ इसे ‘साइलेंट एक्सटिंक्शन’ का नाम दे रहे हैं.वर्ष 1988 में एक नए सूक्ष्म समुद्री जीव की खोज हुई जिसे "प्रोक्लोरोकॉकस” कहा गया. डॉ. सैली चिशोल्म और उनकी टीम ने इसकी खोज की और पाया कि यह समुद्री जीव पृथ्वी पर ऑक्सीजन बनाने और पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं. अगर ऐसी खोजें नहीं की गई होतीं, तो हमें धरती पर मौजूद कई तरह के जीवों के बारे में कभी पता ही नहीं चलता. हम कभी नहीं जान पाते कि ये जीव कहां पाए जाते हैं, कैसे जीवित रहते हैं और प्रकृति में उनका क्या काम है.

एक ओर जर्मनी की गॉटिंगेन यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों द्वारा बनाई गई "प्रोजेक्ट यूरोवर्म” नामक टीम विलुप्त होते समुद्री केंचुओं की खोज कर उन्हें विज्ञान की दुनिया में जगह देना चाहती है. वहीं दूसरी ओर पोलैंड की लॉड्ज यूनिवर्सिटी में बायोलॉजी और एनवायरमेंट प्रोटेक्शन फैकल्टी की प्रोफेसर आन्ना याजदेवस्का ने एम्फिपॉड क्रस्टेशियन(छोटे झींगा जैसे जीव) की 30 से अधिक नई प्रजातियों की खोज की है.

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क्या है प्रोजेक्ट यूरोवर्म?

विशेषज्ञों के मुताबिक, जलवायु में बदलाव, रहने की जगह के खत्म होने और आक्रामक प्रजातियों के बढ़ने के कारण कम अध्ययन की गई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं. बिना पहचान के विलुप्त होते समुद्री केंचुए भी इन प्रजातियों में से एक हैं. समुद्री एनेलिड या समुद्री केंचुए लगभग सभी समुद्री क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे तलछट को मिलाते हैं, पोषक तत्वों को दोबारा उपयोग में लाते हैं, प्रदूषण का संकेत देते हैं और दूसरे जीवों के भोजन का हिस्सा भी होते हैं.

कुछ इसी तरह के जीवों की खोज और पहचान के लिए "यूरोवर्म” नामक एक प्रोजेक्ट टीम बनाई गई है. गॉटिंगेन यूनिवर्सिटी द्वारा मीडिया को जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार यह प्रोजेक्ट यूरोपीय प्रजातियों के लिए खुले जीनोमिक डाटा के जरिए वैश्विक समुद्री एनेलिड जैव विविधता शोध को तेज करने की पहल है. इस परियोजना का नेतृत्व "लाइबनिज इंस्टिट्यूट फॉर द अनैलिसिस ऑफ बायोडाइवर्सिटी चेंज” (एलआईबी) कर रहा है.

शोधकर्ताओं की यह टीम यूरोप के समुद्री एनेलिड्स यानी "खंडित समुद्री केंचुओं” पर एक विस्तृत डाटा तैयार करेगी, जिसे अंतरराष्ट्रीय शोध के लिए मुक्त रूप से उपलब्ध करवाया जाएगा. शोधकर्ता यूरोप से जुटाए गए जीवों की पहचान उनके आकार और बनावट के आधार पर करेंगे. इसके बाद उन केंचुओं की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें ली जाएंगी और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से उनका अध्ययन किया जाएगा. इस अध्ययन का लक्ष्य है समुद्री एनेलिड जीवों की जीन के आधार पर सूची बनाना. इन समुद्री केंचुओं को उनकी तस्वीरों और जीनोमिक डाटा के साथ हैम्बर्ग के नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में स्थित एलआईबी और सेंकेनबर्ग नैचुरल हिस्ट्री म्यूजीयम के संग्रह में शामिल किया जाएगा. इससे दुनिया भर के शोधकर्ता, एलाईबी और सेनकेनबर्ग के डिजिटल पोर्टलों के जरिए नमूने उधार ले सकेंगे और डेटा तक पहुंच बना सकेंगे.

परियोजना प्रमुख डॉ. जेना मूर (एलआईबी) के अनुसार, यूरोपीय प्रजातियों से जुड़े आंकड़ों की तुलना से नई प्रजातियों की खोज को गति मिलेगी और वैश्विक जैव विविधता अनुसंधान को बल मिलेगा. इससे समुद्री प्रजातियों की ‘साइलेंट एक्सटिंक्शन' यानी मौन विलुप्ति को रोकने में मदद भी मिल सकती है.

नए एम्फीपॉड्स की खोज

पोलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉड्ज द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर आन्ना याजदेवस्का और टैमी हॉर्टन की टीम ने प्रशांत महासागर के "क्लेरिअन क्लिपर्टन” जोन से लगभग 24 नए छोटे झींगा जैसे समुद्री जीव की खोज की है. करीब 4,500 मीटर की गहराई में स्थित क्लेरिअन क्लिपर्टन वह विशाल क्षेत्र है जहां पहुंचना मुश्किल है और गहरा अंधेरा भी होता है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि यहां जीवन फिर भी पनपता है. इस इलाका इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि इसे दुर्लभ धातुओं(रेयर अर्थ मेटल) से भरपूर माना जाता है.

प्रोफेसर याजदेवस्का ने वर्ष 2019 में जर्मनी के "सेंटर फॉर मरीन बायोडाइवर्सिटी रिसर्च” में तीन महीने बिताए. वहां उन्होंने क्लेरिअन क्लिपर्टन जोन से मिले छोटे एम्फिपॉड जीवों के एक खास संग्रह पर काम किया. उनके इस अध्ययन के दौरान कुल 207 अलग-अलग प्रजातियों का पता चला, और उनमें से 30 प्रजातियां तो विज्ञान के लिए बिल्कुल नई हैं. हालांकि, कुछ नमूनों के पर्याप्त रूप से सुरक्षित न होने की वजह से 30 में से 24 जीवों को ही पहचान मिल पाई.

एम्फिपॉड छोटे आकार के जलीय जीव होते हैं, जिनकी लंबाई आमतौर पर एक सेंटीमीटर के आसपास होती है. विशेषज्ञों के अनुसार, ये समुद्री पर्यावरण में कई भूमिकाएं निभाते हैं, जैसे छोटे जीवों को खाते हैं और साथ ही बड़े जीवों का खाना भी बनते हैं. साथ ही पानी को छानकर समुद्र साफ रखने में भी मदद करते हैं. प्रोफेसर याजदेवस्का रिपोर्ट में बताती हैं, "एम्फीपॉड्स हर उस जगह मौजूद हैं जहां कोई जीव या तो किसी को खाता है या किसी और के द्वारा खाया जाता है.”

कैसे की जाती है पहचान और क्यों जरुरी है यह?

यूनिवर्सिटी ऑफ लॉड्ज की रिपोर्ट के मुताबिक, नई प्रजाति को पहचानना किसी पहेली से कम नहीं है. वैज्ञानिक पहले तो माइक्रोस्कोप के नीचे जीव की बनावट का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं, इसमें शामिल है उस जीव का एंटेना, हाथ-पैर और पीठ. उसके बाद इस जीव की तुलना पहले से जानी‑पहचानी प्रजातियों के विवरण और चित्रों से की जाती है. अगर यह किसी भी ज्ञात प्रजाति से मेल नहीं खाता, तो इसे नई प्रजाति माना जाता है. फिर विस्तृत विवरण, चित्र, आनुवंशिक जानकारी और नाम के साथ इसे वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया जाता है, जिसके बाद यह जीव आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है.

जीवों को पहचान मिलना उनके संरक्षण की तरफ पहला कदम है. जब किसी जीव के नामकरण की बात आती है, तो प्रोफेसर याजदेवस्का कहती हैं, "जिसे नाम नहीं दिया जाता, लोग अक्सर उसे अस्तित्वहीन मान लेते हैं.”

अंत में प्रोफेसर याजदेवस्का रिपोर्ट में बताती हैं कि नए जीवों की समझ हमें प्रकृति को बेहतर पहचानने और संरक्षित करने में मदद करती है. यह खासकर उन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो पहचान के बिना ही विलुप्त होने की कगार पर हैं.