नयी दिल्ली, चार जून जगमग गगनचुंबी इमारतें, मॉल, मेट्रो, वैश्विक कंपनियों के दफ्तर और बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ के पेंट हाउस, ये सब पहचान हैं देश की ‘मिलेनियम सिटी’ गुडगांव की। लेकिन इसे इसका आधुनिक स्वरूप देने वाले डीएलएफ के कुशल पाल सिंह को मलाल है कि अब भी यह उनके सपनों वाला भविष्य का शहर नहीं बन सका है।
वर्ष 1961 में सेना की नौकरी छोड़कर डीएलएफ में काम शुरू करने वाले सिंह बृहस्पतिवार को 90 वर्ष की आयु में कंपनी के चेयरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने कंपनी की अब सारी जिम्मेदारी अपने बेटे राजीव को सौंप दी है।
डीएलएफ (दिल्ली लैंड एंड फाइनेंसिंग लिमिटेड) को सिंह के ससुर ने 1946 में शुरू किया था। सिंह ने अपने जीवन के छह दशक डीएलएफ को दिए और इसे देश की सबसे बड़ी सूचीबद्ध रियल्टी कंपनी में तब्दील करने में अहम भूमिका अदा की।
डीएलएफ को गुड़गांव का और केपी सिंह को डीएलएफ का पर्यायवाची माना जाता है।
बृहस्पतिवार को कंपनी के निदेशक मंडल की बैठक में राजीव को कंपनी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। वहीं सिंह मानद चेयरमैन बने रहेंगे।
सिंह ने दिल्ली से सटे गुड़गांव के एक छोटे गांव को वर्ष 1979 के दौरान एक बड़े उपनगर के तौर पर विकसित करने की योजना बनायी। वह इसे सिंगापुर की तरह एक उपनगर बनाना चाहते थे जहां दुनियाभर की कंपनियां आकर अपना परिचालन करें। इसके लिए उन्होंने गुड़गांव में करीब 3,500 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया और इसे डीएलएफ सिटी के नाम से विकसित करना शुरू किया।
हालांकि अब गुडगांव का नाम बदलकर गुरुग्राम किया जा चुका है।
उन्होंने कहा, ‘‘ पूरा विचार (गुड़गांव को बसाने का) था कि जब आप योजना बनाएं तो वह दशकों के हिसाब से ना बनाकर सदियों के लिए बनाएं। बड़ी सड़कें, बड़ी जल निकासी प्रणाली और हर चीज मुख्य राजमार्ग से जुड़ी हो।’’
सिंह ने जूम के माध्यम से पीटीआई- से एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘शहर (गुड़गांव) की परिकल्पना यही थी लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसा नहीं कर सके।’’
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