हाल के सालों में रैगिंग के बढ़ते मामलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या उच्च शिक्षा वाले परिसरों में हिंसा और उत्पीड़न रोकने के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं प्रभावी तरीके से काम कर रही हैं? देखिए आंकड़े क्या दिखाते हैं.करीब 17 साल पहले राजेंद्र काचरू का बेटा अमन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था. 8 मार्च 2009 को रैगिंग के दौरान लगी चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई. उस समय अमन काचरू की उम्र केवल 19 साल थी. इस मामले में उसके चार सीनियर छात्रों को 2010 में चार साल जेल की सजा सुनाई गई थी. इसके बाद अमन के पिता राजेंद्र काचरू ने 'अमन मूवमेंट' नाम से एनजीओ की शुरुआत की थी.
प्रोफेसर राजेंद्र काचरू ने 2009 यूजीसी एंटी-रैगिंग नियमों तथा नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी. इस ढांचे में 24x7 हेल्पलाइन, प्रशिक्षित रिस्पॉन्डर्स, रियल-टाइम केस ट्रैकिंग, गुमनाम शिकायत की सुविधा, अभिभावकों को रोजाना ईमेल अपडेट और कॉलेजों में वार्षिक सर्वे जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं. उन्होंने इस प्रणाली पर नजर रखने वाला सॉफ्टवेयर भी डिजाइन किया था. वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एंटी-रैगिंग टास्क फोर्स के सदस्य भी रह चुके हैं.
हाल ही में ग्रेटर नोएडा की बेनेट यूनिवर्सिटी में कथित रैगिंग और फिर मौत का मामला सामने आने के बाद देश में रैगिंग के बढ़ते आंकड़ों पर एक बार फिर ध्यान गया है. साल 2022 से 2024 के बीच देश में रैगिंग से जुड़ी 51 मौतें दर्ज की गईं. कुल शिकायतों में सबसे ज्यादा 38.6 प्रतिशत मामले मेडिकल कॉलेजों में सामने आए.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2017 में 901, 2018 में 1,016 और 2019 में 1,070 शिकायतें आईं. साल 2020 में कोविड महामारी के कारण इनमें 79.5 प्रतिशत की तेज गिरावट आई और आंकड़ा घटकर 219 रह गया. अगले साल कॉलेज फिर से खुलने लगे और इसी के साथ रैगिंग के मामलों में तेज इजाफा भी देखने को मिला. 2021 में 532 और 2022 में 883 शिकायतें आईं. साल 2023 में 962 शिकायतें मिलीं. 2024 में 1,084 शिकायतें दर्ज हुईं, जो इस अवधि में सबसे अधिक हैं. साल 2022 से 2024 के बीच दर्ज कुल शिकायतों में से 38.6 प्रतिशत शिकायतें मेडिकल संस्थानों से संबंधित थीं. ये आंकड़े एजुकेशन, वीमेन, यूथ एंड स्पोर्ट्स की संसदीय स्थायी समिति ने मुहैया कराए थे.
डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में राजेंद्र काचरू ने कहा कि उन्हें लगता है कि साल 2022 के बाद से एंटी-रैगिंग सिस्टम के कई अहम प्रावधानों को धीरे-धीरे कमजोर या खत्म करने की कोशिश की जा रही है. कोविड-19 के बाद यूजीसी प्रशासन की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है. उन्होंने बताया, "नेशनल एंटी-रैगिंग सेंटर चलाने के लिए कॉन्टैक्ट पर निजी एजेंसियों का चयन किया गया. पहले यह नामांकन के जरिए होता था. ऐसी कई व्यवस्थाएं कथित तौर पर बंद कर दी गईं. हेल्पलाइन केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गई है. संस्थानों की निगरानी नहीं हो रही है.”
डीडब्ल्यू हिंदी ने इस मामले में यूजीसी को अपना पक्ष रखने के लिए सवाल भेजे हैं और उन पर लगाए गए आरोपों और रैगिंग के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों को लेकर जवाब मांगा है. इस लेख के प्रकाशित होने तक उनका जवाब नहीं मिल पाया था. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
यूजीसी के खिलाफ अदालत में याचिका
पिछले साल 'अमन मूवमेंट' ट्रस्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. आरोप लगाया गया कि 2009 में अमन काचरू की मौत के बाद देश में जो एंटी-रैगिंग व्यवस्था बनाई गई थी, उसे 2022 के बाद लचर करने का प्रयास किया गया. जिनसे कॉलेजों की जवाबदेही तय होती थी. याचिका में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा नेशनल रैगिंग प्रिवेंशन प्रोग्राम को एक एनजीओ ‘सेंटर फॉर यूथ (C4Y)' को सौंपने के फैसले पर भी सवाल उठाए गए. ट्रस्ट का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं और चुनी गई संस्था के पास जरूरी अनुभव नहीं है. C4Y अभी भी राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग मॉनिटरिंग एजेंसी के तौर पर सक्रिय है.
प्रोफेसर राजेंद्र काचरू बल देते हुए कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि इस काम के लिए एजेंसी का चयन नामांकन के जरिए होना चाहिए, न कि टेंडर प्रक्रिया से. लेकिन यूजीसी इस पर अड़ा रहा." एंटी-रैगिंग प्रणाली की दिक्कतों के बारे में काचरू कहते हैं, "अब एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन केवल शिकायतें रिसीव करके कॉलेजों को बताने का काम करता है. गुप्त शिकायत करने की सुविधा में बदलाव आया है. सर्वे के जरिए कार्रवाई की व्यवस्था बंद हो गई है.”
उस दौरान हाई कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं और रैगिंग के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए स्वीकारा कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मजबूत और प्रभावी एंटी-रैगिंग सिस्टम की तुरंत जरूरत है. साथ ही इस बात पर नाराजगी जताई कि एंटी-रैगिंग पहलों पर केवल 44 लाख रुपये खर्च किए गए. हालांकि, कोर्ट ने 'सेंटर फॉर यूथ' को दिए गए कॉन्ट्रैक्ट में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. लेकिन अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए बड़े मुद्दों, जैसे एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन का कमजोर होना, निगरानी व्यवस्था खत्म होना और रैगिंग मामलों में वृद्धि की जांच सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स को करनी चाहिए.
पिछले साल यूजीसी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वह रैगिंग रोकने के लिए कदम उठा रहा है. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए नई एडवाइजरी भी जारी की गई है.
रैगिंग के बढ़ते मामलों पर कैसे लगेगी रोक
समस्या एंटी-रैगिंग दिशानिर्देशों के लागू होने में है. दिल्ली स्थित एंटी-रैगिंग संगठन, 'सोसाइटी अगेंस्ट वायलेंस इन एजुकेशन' (सेव) की लीगल हेड और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता मीरा कौरा पटेल डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में कहती हैं कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में रैगिंग से निपटने के लिए अलग कानून मौजूद हैं. राष्ट्रीय स्तर पर अब तक सिर्फ दिशानिर्देश हैं. इसी वजह से कई मामलों में कार्रवाई कॉलेज प्रशासन की इच्छा पर निर्भर करती है.
वह अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं, "कॉलेजों में एंटी-रैगिंग समिति और एंटी-रैगिंग स्क्वॉड बनाया जाता है. इन सदस्यों का चयन कॉलेज स्वयं करता है. अधिकतर मामलों में देखा गया कि कॉलेज ऐसा करते वक्त पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं. कॉलेज प्रशासन अपनी छवि बचाने के लिए रैगिंग के मामलों को 'आपसी विवाद' बताकर दरकिनार कर देता है. इसका छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है और कई मामलों में यह आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं तक भी पहुंच जाता है."
रैगिंग पर लगाम कैसे लगाई जाए? इस पर मीरा जवाब देती हैं, "पीड़ित छात्र पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जाता है. ऐसे हालात में रैगिंग साबित करने की जिम्मेदारी भी अक्सर उसी पर आ जाती है. रैगिंग जैसे मामलों में जिम्मेदारी का बोझ पीड़ित पर नहीं, बल्कि आरोपी पर होना चाहिए. जांच पूरी होने तक आरोपित छात्रों को अस्थायी रूप से निलंबित किया जाना चाहिए. इन नियमों के सही तरीके से लागू होने की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाने पर विचार करना होगा."
राजेंद्र काचरू भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि रैगिंग अब कई कॉलेजों में कैंपस 'संस्कृति' का हिस्सा बन चुकी है और इससे छुटकारा पाने के लिए लगातार और गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है. भारत में उच्च शैक्षिक संस्थानों में 4 करोड़ से भी अधिक छात्र पढ़ते हैं. केवल कानून या गाइडलाइंस पर्याप्त नहीं हैं. वह सुझाव देते हैं कि रैगिंग को स्पष्ट रूप से अपराध मानने के लिए एक राष्ट्रीय कानून बनाया जाए.












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