कुछ संकरे समुद्री रास्ते अब व्यापार ही नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन के केंद्र बन गए हैं. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ताइवान और मलक्का के जलडमरूमध्य अब दबाव की इस नई रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं.क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली. उन्होंने कहा, "अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है."
बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी. इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है.
फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, "होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति‑निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है."
खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं. यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है.
समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम
मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं. पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया. इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं. नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के जरिए लंबा रास्ता चुन रही हैं, जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है.
ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं." उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी तीन बातों पर टिकी होती है. वह तीन बातें हैं, ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति. जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है.
भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार
होर्मुज जलडमरुमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है. लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए. उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा. ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरुमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है.
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में 'भूगोल की वापसी' हो रही है. होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं. इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है. इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं.
विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में ‘फ्री ट्रांजिट' यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है. इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं, क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र के तौर पर चिन्हित किया गया है. इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा.
समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं. इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती. यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे कृत्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है.
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पर बढ़ता दबाव
लेकिन शोलिक कहते हैं कि असली चुनौती राजनीतिक वास्तविकताएं हैं. उनके मुताबिक, " अंतरराष्ट्रीय कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब उनमें शामिल देश उन्हें मानने को तैयार हों." और ऐसा हमेशा नहीं होता. ऐसा ही एक उदाहरण है दक्षिण चीन सागर का, जहां चीन ने फिलीपींस के हक में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय फैसले को नहीं माना.
दूसरी ओर, विशेषज्ञों का कहना है कि आज के दौर में बड़ी सैन्य ताकत ही सब कुछ नहीं है. शोलिक का कहना है, "अब किसी जलडमरूमध्य को बाधित करने के लिए बड़ी नौसेना की जरूरत नहीं है." ईरान का उदाहरण देते हुए वह बताते है कि कैसे ईरान ने छोटी तेज नावों, मिसाइलों और ड्रोन के जरिए भी प्रभावी दबाव बनाया है.
हालांकि, विर्थ का यह भी कहना है कि किसी जलडमरूमध्य की पूरी नाकाबंदी करने से उसे रोकने वाले देश को भी बड़ा नुकसान होता है. खास तौर पर ऐसा करने वाले देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचता है. ऐसे में अगर ताइवान और मलक्का जलडमरुमध्य में तनाव कि स्थिति बनती है, तो चीन को इसका भारी खामियाजा भुगतना होगा.
विर्थ बताते हैं कि दक्षिण‑पूर्व एशिया में कुछ दूसरे समुद्री रास्ते भी हैं, जैसे सुंडा जलडमरूमध्य जो सुमात्रा और जावा के बीच स्थित है. उसी तरह लोम्बोक जलडमरूमध्य भी एक ऐसा समुद्री मार्ग है जो लोम्बोक और बाली से होकर गुजरता है. हालांकि इन मार्गों से गुजरना ज्यादा लंबा और खर्चीला है, लेकिन अगर ताइवान या मलक्का जलडमरूमध्य में रुकावट आती है, तो इन मार्गों के होने की वजह से वैश्विक व्यापार कम से कम पूरी तरह नहीं रुकेगा.
समुद्री रास्तों के अहम बिंदु
दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ रही है. शोलिक "जस्ट‑इन‑टाइम” सप्लाई चेन का जिक्र करते हैं, जिसके मुताबिक कंपनियां ज्यादा सामान स्टॉक में नहीं रखतीं. ऐसे में छोटी‑सी आपूर्ति रुकावट भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है.
इसी वजह से, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक लक्षण है, कोई अपवाद नहीं. इसका मतलब यह कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कुछ चुनिंदा समुद्री मार्गों पर टिकी हुई है. अगर इनमें से किसी भी मार्ग में रुकावट आती है, तो इसके नतीजे पूरी दुनिया में महसूस होते हैं.
यही एक बड़ी वजह है कि मलक्का जलडमरूमध्य पर चल रही बहस सिर्फ दक्षिण‑पूर्व एशिया तक सीमित नहीं है. जिस तरह सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया ने टोल या ट्रांसिट शुल्क की बात पर कड़ा विरोध जताया, यह दिखाता है कि भौगोलिक नियंत्रण का इस्तेमाल राजनीतिक और आर्थिक दबाव के रूप में करना कितना आकर्षक हो सकता है. लेकिन अहम मार्गों में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को चुनौती देना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है.













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