गर्भवती महिलाओं में डाउन सिंड्रोम की जांच के लिए होने वाले ब्लड टेस्ट को लेकर जर्मन संसद में बहस चल रही है. जानिए कि इस पर बात करना क्यों जरूरी है?जर्मन संसद के निचले सदन बुंडेसटाग में गर्भावस्था के दौरान होने वाले एक ब्लड टेस्ट पर बहस हुई. चर्चा के केंद्र में जो टेस्ट है उससे ट्राइसोमी 21 के जोखिम की जांच की जाती है. एक सर्वदलीय प्रस्ताव में सांसदों ने मांग की है कि ऐसे टेस्ट की प्रक्रिया की बारीकी से निगरानी की जानी चाहिए.
असल में 'डाउन सिंड्रोम' को 'ट्राइसोमी 21' के नाम से भी जाना जाता है. इस सिंड्रोम में शरीर की कोशिकाओं में क्रोमोसोम नंबर 21 में आमतौर पर दो होने की बजाय तीन प्रतियां मौजूद होती हैं. यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि जन्मजात या संयोग से होने वाला बदलाव है. हालांकि, यह अक्सर कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और अलग-अलग स्तर की बौद्धिक (कॉग्निटिव) चुनौतियों के साथ जुड़ा होता है. इस दौरान कई बार शारीरिक विकार भी विकसित हो सकते हैं जैसे आंखें तिरछी होना वगैरह.
कैसे होता है इसका परीक्षण?
जर्मनी में जुलाई 2022 से कुछ शर्तों के तहत स्वास्थ्य बीमा (कानूनी बीमा) तथाकथित नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट (एनआईपीटी) का खर्च उठाता है. इस टेस्ट के जरिए अजन्मे बच्चे में ट्राइसोमी 13, 18 और 21 (डाउन सिंड्रोम) की संभावना का पता लगाया जा सकता है. इससे पहले यह टेस्ट सेल्फ-पे हुआ करता था.
जर्मनी के संयुक्त संघीय समिति के अनुसार, "ऐसा ब्लड टेस्ट केवल तब स्वास्थ्य बीमा के खर्च पर किया जा सकता है, जब गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर की देखभाल में यह सवाल उठ रहे हों कि क्या भ्रूण में ट्राइसोमी हो सकती है या फिर अगर यह अनिश्चितता महिला के लिए असहनीय मानसिक बोझ बन रही हो.”
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परीक्षण के दौरान क्या होता है?
प्रेग्नेंसी के 10वें महीने तक महिला के एक ब्लड टेस्ट के जरिए ही ट्राइसोमी की आशंका का पता लगाया जा सकता है. इसके लिए गर्भवती महिला की बांह की नस से खून लेकर जांच की जाती है. संयुक्त संघीय समिति के अनुसार, "ट्राइसोमी जांचने के लिए नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट के दौरान महिला के खून में मौजूद कोशिका-मुक्त भ्रूणीय डीएनए का मॉलिक्यूलर जेनेटिक तरीकों से जांचा जाता है.” अगर यह टेस्ट नेगेटिव आता है तो इस बात की ‘बहुत कम संभावना' होती है कि बच्चे में ट्राइसोमी 13, 18 या 21 विकसित हो.
संयुक्त संघीय समिति के अनुसार, "अगर टेस्ट का परिणाम असामान्य आता है तो यह एक मजबूत संकेत है कि बच्चे में ट्राइसोमी हो सकती है.” हालांकि उनके अनुसार, "परिणाम गलत भी हो सकता है.” इसके लिए पॉजिटिव परिणाम आने पर आगे की पुष्टि के लिए एम्नियोसेंटेसिस जैसे और टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है. हालांकि, यह टेस्ट थोड़ा जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि इससे गर्भपात की संभावना थोड़ी बढ़ सकती है.
यह बहस का मुद्दा क्यों?
आलोचकों का मानना है कि 'नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट' का इस्तेमाल अब बहुत व्यापक रूप से किया जाने लगा है. सेंटर-राइट पार्टी सीएसयू के स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ श्टेफान पिलजिंगर ने बुंडेसटाग में कहा, "जो शुरुआत में एक लक्षित जांच के रूप में सोचा गया था, वह धीरे-धीरे एक व्यापक स्तर के स्क्रीनिंग कार्यक्रम में बदलता जा रहा है.”
जर्मन संस्था लेबेन्सहिल्फे की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जर्मनी की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री, उला श्मिट के अनुसार, "वर्तमान आंकड़े दिखाते हैं कि यह जांच अब गर्भावस्था देखभाल में एक नियमित जांच बन चुकी है.” इस जांच को स्वास्थ्य बीमा के खर्च पर सामान्य रूटीन जांच के रूप में नहीं बल्कि केवल जोखिम वाली गर्भावस्थाओं में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. कई मामलों में ट्राइसोमी 21 (डाउन सिंड्रोम) की भारी आशंका होने पर गर्भपात (अबॉर्शन) का निर्णय लिया जाता है, जो कि इस बहस का एक संवेदनशील और विवादास्पद पहलू भी है.
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बुंडेसटाग के सांसदों के प्रस्ताव में स्वास्थ्य बीमा कंपनी बारमेर के आंकड़ों का हवाला दिया गया है. इनके अनुसार 2024 में लगभग 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं ने इस जांच को कराया जबकि एक साल पहले तक यह आंकड़ा 32 प्रतिशत था. सीडीयू-सीएसयू, एसपीडी, ग्रीन्स और लेफ्ट के 109 सांसदों द्वारा समर्थित समूह को चिंता है कि अगर यह परीक्षण एक नियमित प्रक्रिया बन गया, तो महिलाओं पर इसे करवाने और संभावित रूप से विकलांग बच्चे के खिलाफ निर्णय लेने का दबाव बढ़ सकता है. सांसदों ने एक विशेषज्ञ समिति और मॉनिटरिंग की मांग की है ताकि यह समझा जा सके कि इन परीक्षणों का उपयोग इतनी तेजी से क्यों बढ़ा है.
एक बेहतर समाज के लिए क्या है जरूरी?
जर्मनी के प्राइवेट प्रीनेटल मेडिसिन विशेषज्ञों के संघ के अनुसार इस नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट का सावधानी से और अलग-अलग परिस्थितियों में मूल्यांकन करना चाहिए. संघ के थोमास फॉन ऑस्ट्रोव्स्की कहते हैं कि संयुक्त संघीय समिति ने इस जांच को मातृत्व दिशानिर्देशों में सामान्य स्क्रीनिंग या रूटीन जांच के रूप में शामिल नहीं किया है बल्कि इसे केवल विशिष्ट और ठोस कारण वाले मामलों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति है. हालांकि असल में जमीनी हकीकत कुछ और है. उन्होंने कहा, "नियमित डाटा से पता चलता है कि इस जांच को अब ऐसे पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है, जो वास्तव में सामान्य स्क्रीनिंग के बराबर हो गया है.”
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एसपीडी पार्टी की सांसद कार्मेन वेगा ने समाचार एजेंसी ईपीडी से कहा कि यह प्रस्ताव यह जांचने की बात करता है कि क्या ये परीक्षण माता-पिता के फैसलों को प्रभावित करते हैं.
जर्मनी के जनरल डिसेबिलिटी एसोसिएशन के अध्यक्ष, मार्कुस ग्राउबनर के अनुसार यह बहस काफी जरूरी है. चूंकि, समाज विविधतापूर्ण है और इसमें विकलांग जीवन भी शामिल है. उनके अनुसार, "हमें ऐसे समाज की आवश्यकता है, जिसमें ट्राइसोमी 21 वाले बच्चों को कलंक के रूप में नहीं बल्कि समाज के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाए.”













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