कैसे आया कोविड वैक्सीन बनाने वाली कंपनी बायोनटेक का बुरा दौर
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

कभी कोविड-19 वैक्सीन की वजह से कोरोना काल का हीरो रही बायोनटेक कंपनी आज मुश्किल दौर में है. वैक्सीन की मांग घट गई है, कंपनी के ढांचे में बदलाव हो रहा है और इसके मुख्य संस्थापक भी साथ छोड़ रहे हैं.करीब छह साल पहले की बात है. पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही थी. लाखों लोगों की मौत हो रही थी. हर तरफ लॉकडाउन लगा था. लोगों का घरों से निकलना तक बंद हो गया था. किसी को उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी. उसी दौरान, जर्मनी की एक कंपनी ‘बायोनटेक' ने दुनिया की पहली मान्यता प्राप्त एमआरएनए कोविड-19 विकसित की और एक वैश्विक महामारी का रुख बदल दिया. इससे पहले, इस कंपनी को दुनिया में बहुत कम लोग ही जानते थे. कोरोना वैक्सीन विकसित करने के बाद, यह कंपनी उस दौर में हर जगह छा गई.

दशकों तक कैंसर उपचार के लिए एमआरएनए तकनीक पर शोध करने वाली बायोनटेक को शुरुआत में कोई खास व्यावसायिक सफलता नहीं मिली थी. हालांकि, महामारी के दौरान फाइजर के साथ साझेदारी में रिकॉर्ड समय में ‘कोमिरनाटी' कोरोना वायरस वैक्सीन लॉन्च करके कंपनी ने इतिहास रच दिया. इस उपलब्धि ने न केवल कंपनी को बल्कि इसके संस्थापकों को भी रातों-रात पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया. लेकिन जर्मनी के माइंत्स शहर में स्थित यह बायोटेक कंपनी अब फिर से मुश्किल दौर से गुजर रही है.

कंपनी ने इसी हफ्ते घोषणा की है कि वह जर्मनी और सिंगापुर में अपने प्रोडक्शन प्लांट बंद कर रही है. 53.2 करोड़ यूरो (करीब 62.7 करोड़ डॉलर) के तिमाही घाटे के बाद कंपनी खर्चों में कटौती कर रही है. साथ ही, कंपनी अपने दूरदर्शी संस्थापकों, उगुर साहीन और ओजलेम तुरेची के जाने की तैयारी भी कर रही है. कुल मिलाकर, लगभग 1,860 नौकरियों पर तलवार लटक रही है.

वह कंपनी जिसने कभी वैक्सीन की करोड़ों डोज बनाई, जिसे लाखों लोगों की जान बचाने और लॉकडाउन में फंसी अर्थव्यवस्थाओं को फिर से खोलने का श्रेय दिया गया, अब उस पर केवल ‘एक ही कामयाबी' वाली कंपनी के रूप में याद किए जाने का खतरा मंडरा रहा है.

मुश्किल में क्यों है बायोनटेक

वित्तीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि बायोनटेक की मुश्किलें इसलिए बढ़ी हैं, क्योंकि कोरोना वैक्सीन से होने वाली अचानक और भारी कमाई अब उम्मीद के मुताबिक खत्म हो गई है. 2020 के आखिर से अब तक, कंपनी ने वैक्सीन बेचकर जो अरबों यूरो कमाए थे, वह कमाई का एक अस्थायी जरिया था.

बायोनटेक की स्थिति दिखाती है कि केवल एक सुपरहिट प्रोडक्ट के भरोसे रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है. बायोटेक्नोलॉजी सेक्टर में रिसर्च और डेवलपमेंट में वैसे ही बहुत जोखिम होता है. अब जर्मनी की आर्थिक मुश्किलें, जैसे कि महंगे श्रमिक, बिजली का भारी खर्च और सरकारी कागजी कार्रवाई में होने वाली देरी ने इस खतरे को और भी साफ तौर पर उजागर कर दिया है.

बायोनटेक की कोविड वैक्सीन ‘कोमिरनाटी' की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से खत्म हो गई. 2026 की पहली तिमाही में कंपनी का राजस्व गिरकर 11.8 करोड़ यूरो रह गया, जो पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 35 फीसदी कम है. नतीजों की घोषणा करते हुए, कंपनी ने लिखा कि उसे "2025 की तुलना में कोविड-19 वैक्सीन से होने वाली कमाई में कमी की उम्मीद है. इसकी वजह यूरोप और अमेरिका, दोनों ही बाजारों में आई गिरावट है.”

जानकारों का कहना है कि कंपनी ने तेजी के दौर में उत्पादन की क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ा ली थी. अब उसके प्लांट बेकार पड़े हैं. नतीजतन, बायोनटेक का कहना है कि वह कोविड से जुड़ा अपना सारा उत्पादन फाइजर को सौंप देगी. कंपनी को जर्मनी की सरकार से भी करोड़ों यूरो की मदद मिली. इसका फायदा उसे अपने कैंसर रिसर्च और वैक्सीन प्रोग्राम को तेज करने, दोनों में हुआ.

क्योरवैक के अधिग्रहण से भी बढ़ी मुश्किलें

दिसंबर 2025 में अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी ‘क्योरवैक' को 1.25 अरब डॉलर (1.06 अरब यूरो) में खरीदने के फैसले को लेकर भी कंपनी विवादों में घिर गई. क्योरवैक ने अपनी खुद की एक कोविड वैक्सीन विकसित की थी, जिसका असर काफी कम निकला और उसका उत्पादन बंद करना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद, कंपनी ने 2022 में बायोनटेक और फाइजर पर मुकदमा कर दिया. क्योरवैक का दावा था कि उनकी ‘कोमिरनाटी' वैक्सीन ने उसके कई एमआरएनए पेटेंट का उल्लंघन किया है.

अपने प्रतिद्वंद्वी और उसके पेटेंट को खरीदकर, बायोनटेक सभी कानूनी मुकदमों को खत्म करने और अरबों यूरो के संभावित नुकसान से बचने में सफल रहा. हालांकि, बात तब और बिगड़ गई जब इस हफ्ते बायोनटेक ने छंटनी और प्लांट बंद करने की घोषणा की. हैरानी की बात यह है कि स्टुटगार्ट के पास ट्यूबिंगन में स्थित ‘क्योरवैक' के वे प्लांट भी उन इकाइयों में शामिल हैं, जिन्हें बंद किया जा रहा है.

रिपोर्ट: कोविड-19 वैक्सीन ने पैदा किए नौ नए खरबपति

ट्यूबिंगन के मेयर बोरिस पालमेर ने कंपनी पर ‘पहले खरीदो, फिर खत्म करो' वाली रणनीति अपनाने का आरोप लगाया. उन्होंने आगे कहा कि प्लांट का बंद होना उन ‘कई बेहद काबिल कर्मचारियों के लिए बहुत बड़ा झटका है, जिन्होंने सालों तक क्योरवैक को संभाला है.'

आईजी बीसीई ट्रेड यूनियन ने इस कदम को ‘सोची-समझी कटौती और बर्बादी की रणनीति' करार दिया. यूनियन ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि ‘अल्पकालिक वित्तीय कारणों' से जर्मनी के बायोटेक हब की मजबूती को नुकसान पहुंचेगा. स्थानीय चैंबर ऑफ कॉमर्स ने एक बयान में चेतावनी दी कि प्लांट बंद होने से ‘कुशल दिमाग, पेटेंट और रिसर्च व डेवलपमेंट के नतीजों के रूप में मौजूद तकनीकी जानकारी खत्म हो जाएगी.'

क्या बायोनटेक अपने संस्थापकों के बिना आगे बढ़ सकती है?

साहीन और तुरेची ने मार्च में घोषणा की थी कि वे साल के आखिर तक कंपनी छोड़ देंगे, ताकि एक महत्वाकांक्षी नया बायोटेक वेंचर शुरू कर सकें. वे दोनों सिर्फ बायोनटेक के संस्थापक ही नहीं थे, बल्कि कंपनी की सफलता के पीछे की असली ताकत भी थे.

उनकी अहम भूमिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस घोषणा के बाद बायोनटेक के शेयर करीब 18 फीसदी गिर गए. हेल्थ सेक्टर पर नजर रखने वाले और बोस्टन स्थित निवेश बैंक ‘लीरिंक पार्टनर्स' ने यह सवाल उठाया है कि क्या उनके बिना कंपनी अपनी नई और अनोखी सोच को बरकरार रख पाएगी? लीरिंक के विश्लेषकों ने अपनी एक रिसर्च रिपोर्ट में सवाल उठाया, "क्या यह कंपनी अपने संस्थापकों की गहरी समझ और अनुभव के बिना, क्लिनिकल डेटा को समझने और अपनी कार्यप्रणाली को आगे बढ़ाने का काम प्रभावी ढंग से कर पाएगी?”

अब सबकी नजरें इनके कैंसर वैक्सीन के परीक्षण पर टिकी हैं. बायोनटेक अब अपना पूरा ध्यान कैंसर के लिए एमआरएनए ट्रीटमेंट के अंतिम चरण के परीक्षणों पर लगा रही है. इसमें ‘ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब' के साथ मिलकर स्तन, फेफड़े और अन्य प्रकार के कैंसर के लिए विकसित की जा रही नई थेरेपी भी शामिल हैं. अपनी हालिया तिमाही रिपोर्ट में कंपनी ने कहा कि उसे उम्मीद है कि साल के आखिर तक कैंसर के 15 बेहद अहम फेज 3 ट्रायल चल रहे होंगे.

निवर्तमान सीईओ साहीन ने कहा कि बायोनटेक "अपने मुख्य रणनीतिक कार्यक्रमों में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखेगी, क्योंकि हम अपने इस लक्ष्य पर अडिग हैं कि वैज्ञानिक शोध को कैंसर पीड़ितों के लिए जीवनदान में बदल सकें. कोविड वैक्सीन का उत्पादन फाइजर को सौंपकर और कुछ प्लांट बंद करके, बायोनटेक का लक्ष्य 2029 तक हर साल लगभग 50 करोड़ यूरो बचाना है. कंपनी का कहना है कि वह अपने संस्थापकों द्वारा शुरू किए जा रहे नए स्टार्टअप में छोटी हिस्सेदारी रखेगी. यह नया स्टार्टअप अगली पीढ़ी की एमआरएनए तकनीक पर काम करेगा.