गोली लगने के बाद गंभीर हालत में स्लोवाक प्रधानमंत्री
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

स्लोवाक गणराज्य के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको को कई गोलियां लगने के बाद गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती किया गया है. लोकलुभावन नेता पर रूस के करीब होने के आरोप लगते हैं.बुधवार को रॉबर्ट फिको पर तब हमला हुआ जब वह एक सरकारी बैठक में हिस्सा लेने के बाद निकल रहे थे. हांदलोवा के अखबार द डेनीक एन का कहना है कि उसके रिपोर्टर ने हांदलोवा के मध्य हिस्से में गोली चलने की कई आवाजें सुनीं और उसके बाद सुरक्षा गार्डों को जमीन पर गिरे प्रधानमंत्री को कार में डालते देखा. अखबार ने यह भी खबर दी है कि पुलिस ने संदिग्ध बंदूकधारी को हिरासत में लिया है.

सरकार की तरफ से सोशल मीडिया पर डाली गई पोस्ट में कहा गया है, "आज हांदलोवा में सरकार की एक बैठक के बाद स्लोवाक रिपब्लिक के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको पर जानलेवा हमला हुआ है." उन्हें हेलिकॉप्टर से 29 किलोमीटर दूर बांस्का बिस्ट्रिका ले जाया गया है क्योंकि राजधानी ब्रातिस्लावा तक जाने में ज्यादा समय लगता. पुलिस प्रवक्ता ने भी फिको पर हमले की पुष्टि की है. यूरोपीय संघ के प्रमुख ने इस हमले की निंदा की है.

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक हांदलोवा के हाउस ऑफ कल्चर के बाहर चार गोलियां चलीं. फिको के पेट में गोली लगने की बात कही जा रही है. हांदलोवा राजधानी से करीब 150 किलोमीटर दूर है और प्रधानमंत्री यहां समर्थकों के साथ बैठक के लिए आए थे.

कौन हैं रॉबर्ट फिको

चार बार देश के प्रधानमंत्री रहे फिको स्लोवाकिया के राजनीतिक दिग्गजों में गिने जाते हैं. उनका मौजूदा कार्यकाल पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुआ. उन्होंने स्लोवाक गणराज्य की विदेश नीति में रूस समर्थित विचारों को ज्यादा महत्व दिया है. उन्होंने देश के अपराध कानून और मीडिया में सुधारों की भी शुरूआत की है, जिनसे कानून का शासन कमजोर पड़ने की आशंका जताई जाती है.

तीन दशक लंबे करियर में 59 साल के फिको ने बड़ी कुशलता से यूरोप समर्थक मुख्यधारा और अमेरिका और ब्रसेल्स विरोधी सोच के बीच खुद के लिए रास्ता बनाया है. वह लोगों की राय या फिर बदली राजनीतिक सच्चाइयों के हिसाब से रास्ता बदलने की इच्छा दिखाते रहे हैं.

पिछले चार सालों में उन्होंने ज्यादा कड़ा रुख अपना लिया है, जिसमें पश्चिमी देशों की कड़ी आलोचना भी शामिल है. उन्होंने यूक्रेन को सैन्य सहायता रोकने की शपथ ली, रूस पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया और यूक्रेन को नाटो की सदस्यता के लिए आमंत्रण को वीटो करने की धमकी दी.

उनके गठबंधन ने स्लोवाक अधिकारियों को यूक्रेन में आधिकारिक तौर पर हथियार भेजने से रोका और वह ऐसी बातें करते रहे हैं कि जंग में पश्चिमी देशों का प्रभाव स्लाविच देशों को एक दूसरे की हत्या करने की ओर ले जाएगा.

"नॉट ए सिंगल राउंड फॉर यूक्रेन" नाम के उनके अभियान ने 55 लाख की आबादी वाले इस देश में लोगों को लुभाया. यह नाटो के उन अल्पसंख्यक सदस्यों में है जो कि यूक्रेन युद्ध में रूस की गलती नहीं देखते. विश्लेषक मानते हैं कि फिको हंगरी के विक्टर ओरबान से प्रेरित हैं. वह जंग को खत्म करना चाहते हैं लेकिन उनके दिल में स्लोवाकिया का हित सबसे पहले हैं.

जनता की नब्ज

कहा जाता है कि फिको हमेशा ओपिनियन पोल पर नजर रखते हैं और समाज में क्या हो रहा है इसकी थाह लगा लेते हैं. समाज की जीवनशैली की रक्षा के वादे के साथ उन्होंने अपना करियर आगे बढ़ाया है. यह देश बाकी यूरोपीय देशों के साथ अपना जीवनस्तर सुधार पाने में धीमा है. बहुत से लोग यहां आज भी साम्यवादी दौर को याद कर आहें भरते हैं.

मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए फिको ने 1986 में कानून की डिग्री ली और सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए. 1989 में कम्युनिस्ट शासन खत्म होने के बाद उन्होंने सरकारी वकील के रूप में काम किया. इसके बाद उन्होंने नए नाम से आई कम्युनिस्ट पार्टी के जरिए संसद की सदस्यता हासिल कर ली. उन्होंने यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में स्लोवाकिया का प्रतिनिधित्व किया.

1999 से फिको एसएमईआर- सोशल डेमोक्रैसी पार्टी चला रहे हैं. मध्य दक्षिणपंथी कैबिनेट का विरोध कर उन्होंने इस पार्टी को स्थापित किया है. उदार आर्थिक सुधारों से असंतुष्टि जता कर उन्होंने 2006 में अपनी पहली जीत की इबारत लिखी. हालांकि उन्होंने राष्ट्रवादियों के साथ सरकार बनाने के बावजूद 2009 में यूरो को अपनाने की राह पर देश को चलने दिया. दो साल बाद मध्य दक्षिणपंथी गठबंधन टूटने के बाद उनकी दूसरी कैबिनेट को जीत मिली और प्रवासियों के खिलाफ कठोर रुख ने उन्हें 2016 में दोबारा जीत दिलाई. इस जीत के बाद उन्होंने यूरोपीय संघ में फ्रांस और जर्मनी की तरह शामिल होने का एलान किया.

2018 में फिको के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल कर रहे पत्रकार जान कुचियाक और उनकी मंगेतर मार्टिना कुसनिरोवा की सुपारी किलर के हाथों हुई हत्या के बाद उनके राजनीति पर ग्रहण लग गया. इसके बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के दबाव में फिको को इस्तीफा देना पड़ा. 2020 के चुनावों में उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और भ्रष्टाचार दूर करने वाली पार्टियों को जीत मिली. इसके बाद उनकी पार्टी टूट गई.

एनआर/आईबी (एएफपी, रॉयटर्स)