ग्रीस शरणार्थी संकट: सात साल की कानूनी लड़ाई के बाद सहायता कार्यकर्ता बाइज्जत बरी
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

ग्रीस में शरणार्थी संकट के दौरान प्रवासियों की सहायता करने वाले जिन कार्यकर्ताओं पर सात साल से मुकदमा चलाया जा रहा था, उन सभी को बरी कर दिया गया है.सात साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, गुरुवार (15 जनवरी) को ग्रीस के लेसबोस द्वीप पर मानवीय कार्यकर्ताओं की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े. अदालत ने उन सभी 24 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया, जिन पर समुद्र में लोगों की जान बचाने के लिए संगीन अपराधों के आरोप लगाए गए थे. अगर वे दोषी पाए जाते, तो उन्हें 20 साल तक की जेल हो सकती थी. इस मुकदमे को "यूरोप में एकजुटता को अपराध बनाने का सबसे बड़ा मामला” कहा जा रहा था.

जैसे ही फैसला सुनाया गया, पूरा कोर्ट रूम तालियों और खुशी की चीखों से गूंज उठा. बरी होने के बाद सारा मर्दिनी ने कहा, "लोगों की जान बचाना कोई अपराध नहीं है.”

यूरोपीय संसद ने इसे 'यूरोप में एकजुटता को अपराध ठहराने का सबसे बड़ा मामला' बताया था. इसलिए, सभी आरोपियों का पूरी तरह बरी होना एक बड़ी बात है, लेकिन शायद इतना ही काफी नहीं है. अभियोजन पक्ष ने संगीन अपराध के आरोपों को जारी रखने का फैसला तब किया था, जब एक दूसरी अदालत पहले ही इन आरोपों को खारिज कर चुकी थी.

क्रूज टूरिस्टों पर ग्रीस ने लगाया टैक्स

इस फैसले के बाद ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, "ग्रीस की सरकार के लिए लोगों की जान बचाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. उसे बरी किए गए कार्यकर्ताओं से माफी मांगनी चाहिए और यह साफ कर देना चाहिए कि वह अब मदद करने वालों पर मुकदमा नहीं चलाएगी. सरकार को उस नए प्रस्तावित प्रवासन विधेयक को भी रद्द कर देना चाहिए, जो एनजीओ और उनके सदस्यों पर कठोर दंड और पंजीकरण की शर्तें थोपता है. उसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ दमनकारी कार्रवाई बंद करनी चाहिए.”

फैसला सुनाए जाने से पहले डच नागरिक पीटर विटेनबर्ग ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "मुझे किसी चीज की उम्मीद नहीं है, लेकिन मैं हर चीज के लिए तैयार हूं.” विटेनबर्ग उन 24 लोगों में से एक हैं जिन पर ग्रीक द्वीप लेसबोस में उन शरणार्थियों की मदद करने के लिए मुकदमा चल रहा था जो तुर्की से ग्रीस तक समुद्र के रास्ते आ रहे थे.

इस मामले की सुनवाई 15 जनवरी को लेसबोस की राजधानी माइतिलेने में फिर से हुई. इस मुकदमे को अब ‘मर्दिनी केस' के नाम से जाना जाने लगा था, क्योंकि इसमें मुख्य आरोपियों में से एक सीरिया की मशहूर तैराक और कार्यकर्ता सारा मर्दिनी थीं.

सारा मर्दिनी कौन हैं?

2015 में सारा मर्दिनी अपनी छोटी बहन युसरा के साथ सीरिया से भाग गईं थीं. दोनों ने तुर्की से लेसबोस तक नाव से एजियन सागर पार किया. उस समय दोनों बहनों की उम्र 19 साल और 17 साल थी. दोनों ही मंझी हुई तैराक थीं. जब उनकी खचाखच भरी नाव डूबने लगी, तो दोनों बहनों ने पानी में छलांग लगा दी. वे तीन घंटे तक समुद्र में तैरती रहीं और अपने पीछे उस नाव को खींचकर ग्रीस के तट तक ले आईं. ऐसा करके उन्होंने दूसरे यात्रियों की जान बचाई. बाद में बहनों ने ‘बाल्कन रूट' कहे जाने वाले रास्ते से जर्मनी तक अपनी यात्रा जारी रखी, जहां उन्होंने शरण के लिए आवेदन किया.

युसरा मर्दिनी 2016 के रियो ओलंपिक खेलों में रिफ्यूजी ओलंपिक टीम के हिस्से के तौर पर शामिल हुई थीं. उनकी प्रेरणादायक कहानी ने दुनिया का ध्यान खींचा और यह नेटफ्लिक्स फिल्म ‘द स्विमर्स' और मशहूर फैशन मैगजीन के लेख का विषय बनी, जिन्होंने उन्हें नए रोल मॉडल के तौर पर पेश किया.

2016 में, सारा मर्दिनी दूसरे शरणार्थियों की मदद करने के लिए एनजीओ ‘इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेंटर इंटरनेशनल' (ईआरसीआई) के साथ काम करने के लिए लेसबोस लौट आईं. दो साल बाद, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर कई अपराधों का आरोप लगाया गया.

मर्दिनी का मुकदमा क्यों मायने रखता है?

मुकदमे का सामना कर रहे 24 सहायता कर्मियों में से पांच को सुनवाई शुरू होने से पहले ही तीन महीने की हिरासत में रखा गया था. इन पांच लोगों में सारा मर्दिनी भी शामिल थीं.

मर्दिनी और दूसरे आरोपियों पर जासूसी, स्मगलिंग नेटवर्क की मदद करने, आपराधिक संगठन का सदस्य होने और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोप लगाए गए थे. अगर वे दोषी पाए जाते, तो उन्हें 20 साल तक की जेल हो सकती थी. इस मामले को ‘यूरोप में एकजुटता को अपराधी बनाने का सबसे बड़ा मामला' कहा जा रहा था.

अगर इन कार्यकर्ताओं को सजा होती, तो यह न केवल मानवीय कार्यों के लिए एक बड़ा झटका होता, बल्कि मौलिक मानवाधिकारों के लिए भी बहुत बुरा होता. इस मुकदमे की सुनवाई ऐसे समय में हुई जब यूरोपीय संघ और ग्रीस, प्रवासियों को लेकर अपनी नीतियां पहले से कहीं ज्यादा सख्त बना रहे हैं.

इस मामले से यह भी संदेश गया कि शरणार्थियों की मदद करने पर आपराधिक आरोप लग सकते हैं, भले ही अब अदालत ने आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है.

सात साल से ज्यादा समय तक अनिश्चितता में गुजरी जिंदगी

सारा मर्दिनी को 21 अगस्त 2018 को जर्मनी-आयरलैंड के नागरिक सीन बिंडर और ग्रीक नागरिक नासोस कराकित्सोस के साथ गिरफ्तार किया गया था. उन्हें तीन महीने के लिए जेल भेज दिया गया था और फिर 2018 के अंत में जमानत पर रिहा कर दिया गया था.

दुनिया में पहली बार कहां हुआ था औद्योगिक प्रदूषण

इसके बाद उन पर जासूसी, मनी लॉन्ड्रिंग, रेडियो फ्रीक्वेंसी का अवैध इस्तेमाल और दस्तावेजों में हेराफेरी का आरोप लगाया गया. जनवरी 2023 में, माइतिलीन की ‘मिसडेमीनर कोर्ट' ने सबूतों की कमी और प्रक्रिया में खामियों के कारण इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

गिरफ्तारी के सात साल बीत जाने के बाद, बचाव पक्ष का कहना था कि जो शुरुआती सबूत पेश किए गए थे, वे कहां से आए और कानूनी तौर पर कितने सही हैं, इस बारे में अब भी शक बना हुआ है.

दिसंबर 2025 की शुरुआत में, लेसबोस की 'नॉर्थ एजियन कोर्ट ऑफ अपील्स' ने अतिरिक्त आरोपों पर सुनवाई शुरू की. इनमें मानव तस्करी और आपराधिक संगठन का सदस्य होने जैसे गंभीर आरोप शामिल थे.

सबूत क्या थे?

5 दिसंबर, 2025 को मुकदमे की सुनवाई के दूसरे दिन डॉयचे वेले से बात करते हुए शॉन बिंडर ने कहा, "किसी ने भी यही सोचा होगा कि महीनों की जांच और सात साल की देरी के बाद, हमारे खिलाफ सबूतों का ढेर होगा और एक ठोस तर्क होगा कि आखिर हम दोषी क्यों हैं.”

शॉन बिंडर ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा था कि सरकारी वकील का मुख्य गवाह एक कोस्ट गार्ड अधिकारी था. उसने ‘अभियोजन पक्ष के पूरे केस की बुनियाद को ही हिला कर रख दिया, क्योंकि उसने खुद इस बात की पुष्टि की कि हमने उसके साथ पूरा सहयोग किया था.'

अभियोजन पक्ष का तर्क था कि मर्दिनी और अन्य लोगों ने अपने मानवीय कार्यों का इस्तेमाल केवल एक दिखावे के रूप में किया, ताकि वे मानव तस्करी करने वाले गिरोहों की मदद कर सकें.

वहीं मर्दिनी के बचाव पक्ष ने कहा कि आपराधिक इरादे का कोई सबूत नहीं है. उनके काम का मकसद सिर्फ खुले समुद्र में लोगों की जान बचाना और मुश्किल में फंसे लोगों को मदद पहुंचाना था.

सारा मर्दिनी के वकील जकारियास केसेस ने यह भी तर्क दिया कि जिस मानवीय मिशन में सारा शामिल थीं, वह ग्रीक तटीय अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में था और उनके साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान करता था.

क्या मदद जरूरी थी?

लेसबोस की पत्रकार एंथी पाजियानोउ पिछले एक दशक से वहां के शरणार्थी संकट को कवर कर रही हैं. वह 2015 के दौरान द्वीप के हालातों से बखूबी वाकिफ हैं, जब ग्रीस पहुंचने वाले सीरियाई नागरिकों की संख्या सबसे ज्यादा थी.

पाजियानोउ इस बात पर जोर देती हैं कि उस समय मानवीय कार्य बहुत जरूरी थे, क्योंकि शरणार्थियों के लिए सरकारी संस्थाओं की ओर से कोई खास मदद नहीं मिल रही थी और समुद्र के रास्ते आने वाले शरणार्थियों की भारी संख्या से द्वीप पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ गया था.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "वॉलंटियर्स ने शरणार्थियों के खाने और उनके दस्तावेजों का इंतजाम किया और वे पुलिस के साथ सीधे संपर्क में थे.”

मुकदमे की तीखी आलोचना कर रहे थे एनजीओ

लेसबोस के एक सामाजिक कार्यकर्ता मिखालिस बकास कहते हैं, "लोगों को मरने के लिए छोड़ देना एक अपराध है. यह पागलपन है कि इतने सालों से इतने सारे लोग इस मुकदमे की वजह से परेशान हो रहे हैं.”

पिछले सात सालों से, एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई मानवाधिकार समूह इस मामले पर करीब से नजर रख रहे थे. एमनेस्टी इंटरनेशनल की बेल्जियम फ्लैंडर्स ब्रांच के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर वीज डी ग्रेव ने फैसले से पहले कहा था, "आरोप बेबुनियाद हैं और उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए.”

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "यह मुकदमा होना ही नहीं चाहिए था. हम बहुत चिंतित हैं. हम जो देख रहे हैं, वह एकजुटता का अपराधीकरण है.” डीडब्ल्यू से बात करते हुए एमनेस्टी इंटरनेशनल ग्रीस के क्रिस्टोस डिमोपोलोस ने कहा कि "यह मामला दिखाता है कि ग्रीस और यूरोप फिलहाल शरणार्थियों के मुद्दे को किस तरह देख रहे हैं. इससे मानवाधिकारों को लेकर एक ऐसी छवि बन रही है जो बिल्कुल भी अच्छी नहीं है.”

जर्मनी: आप्रवासन पर सख्त नीतियों के समर्थन में बड़ी आबादी

ह्यूमन राइट्स वॉच ने उन बचाव अभियानों को आपराधिक ठहराने की कड़ी निंदा की जिनमें सारा मर्दिनी शामिल थीं. इसके साथ ही, यूरोपीय संसद ने 2023 में यह मांग की थी कि यूरोपीय संघ को समुद्र में लोगों की जान बचाने के लिए और भी कड़े कदम उठाने चाहिए.

ग्रीस में प्रवासियों के आने-जाने पर शोध करने वाली स्वतंत्र रिसर्चर सोफिया कौफोपोलो पिछले 20 से अधिक वर्षों से लेसबोस आने वाले शरणार्थियों की स्थिति पर नजर रख रही हैं. उनके मुताबिक, पूरे यूरोप और खास तौर पर ग्रीस में, प्रवासन को लेकर लोगों और सरकार का नजरिया अब पूरी तरह बदल गया है.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "2015 में जब हम जर्मनी और ग्रीस में एकजुटता और मानवीय सहायता की बात करते थे, तब स्वयंसेवकों यानी वॉलंटियर के काम की बहुत तारीफ होती थी. लेकिन अब हम एक ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां खुद ग्रीस के प्रवासन मंत्री प्रवासियों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो एक कथित सेंटर-राइट सरकार के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है.

बचाव पक्ष ने की ग्रीक न्यायपालिका की आलोचना

बचाव पक्ष ने दावा किया था कि न तो सरकारी वकील ने और न ही कोर्ट ऑफ अपील्स के प्रेसिडेंट ने केस की ठीक से समीक्षा या जांच की थी. उनका कहना था कि दोनों ही यह देख पाने में पूरी तरह नाकाम रहे कि उनके पास आरोपियों के खिलाफ कोई भी सबूत मौजूद नहीं है.

सारा मर्दिनी के वकील केसेस ने डीडब्ल्यू को बताया कि ‘यह मामला कोर्ट तक पहुंचना ही नहीं चाहिए था क्योंकि यह जरूरी शर्तों को पूरा नहीं करता. इसमें से ज्यादातर पर 2023 में ही फैसला हो चुका है.' उन्होंने इस बात की भी आलोचना की कि ग्रीक न्यायपालिका मर्दिनी के मामले को तेजी से और असरदार तरीके से निपटाने में नाकाम रही.

आप्रवासियों की ज्यादा आबादी का मतलब ज्यादा अपराध नहीं

आरोपी भी मुकदमा खत्म होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि यह सात साल से चल रहा था और इससे उन्हें काफी मानसिक तनाव झेलना पड़ा. मुकदमे में आरोपी नासोस कराकित्सोस ने फैसले से पहले डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा था, "हमें बस 15 और 16 जनवरी का इंतजार है, ताकि इस कड़वे अनुभव से हमेशा के लिए पीछा छूट सके. पिछले कई सालों से हम जिस मानसिक तनाव और कानूनी लड़ाई से गुजर रहे हैं, वह किसी डरावने सपने से कम नहीं है.”

कराकित्सोस ने इस बात पर जोर दिया था कि इसका फैसला उन लोगों के पक्ष में आना जरूरी है. वे कहते हैं, "यह न केवल हमारे लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए अच्छा होगा जो इन सालों में द्वीपों पर आए और लोगों की मदद की.”

अब फैसला आ गया है. सभी आरोपी बाइज्जत बरी कर दिए गए हैं. हालांकि, एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इन मुकदमों का बहुत बुरा असर पड़ा है. संस्था ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, "एजियन सागर में सर्च एंड रेस्क्यू ग्रुप्स ने अपना काम बंद कर दिया है. कई लोग डूब गए हैं, जिनमें एक 7 साल की लड़की भी शामिल है जिसका शव 8 जनवरी को मिला था. सबसे जरूरी बात यह है कि सरकार को सीमाओं पर होने वाली 'पुशबैक' (शरणार्थियों को जबरन वापस धकेलना) की हिंसक कार्रवाई को तुरंत रोकना चाहिए. साथ ही, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी को भी अवैध रूप से खतरे में वापस न भेजा जाए.”