पुणे, 29 मई: पुणे (Pune) स्थित भारतीय सेना के विशेष अस्पताल 'आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो-थोरैसिक साइंसेज' (AICTS) के सैन्य डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल और आपातकालीन प्रक्रिया के जरिए 9 महीने के एक मासूम बच्चे को जीवनदान दिया है. इस बच्चे ने खेलने के दौरान अनजाने में नुकीले और संक्षारक (जंग लगाने वाले) तारों से जुड़े एक छोटे लाइट-एमिटिंग डायोड (LED) बल्ब को निगल लिया था, जो उसके बाएं फेफड़े (Left Lung) के मुख्य वायुमार्ग में गहराई से फंस गया था। सैन्य डॉक्टरों की टीम ने तत्परता दिखाते हुए एक आपातकालीन, न्यूनतम आक्रामक (Minimally Invasive) प्रक्रिया के जरिए इस घातक वस्तु को सुरक्षित बाहर निकाला और बच्चे को श्वास नली के गंभीर अवरोध से बचा लिया. यह भी पढ़ें: Lucknow: तीन साल के मासूम के सिर और कंधे से निकाली लोहे की रॉड, डॉक्टर अंकुर बजाज ने किया असंभव को संभव
ओपन-चेस्ट सर्जरी के बजाय चुनी गई जटिल 'ब्रोंकोस्कोपी'
पीड़ित बच्चे को गंभीर सांस फूलने और अत्यधिक श्वसन संकट (Respiratory Distress) की स्थिति में इस विशेष सैन्य चिकित्सा केंद्र में लाया गया था. शुरुआती एक्स-रे और डायग्नोस्टिक इमेजिंग से पता चला कि निगला गया इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर बाएं फेफड़े के मुख्य वायुमार्ग के भीतर फंसा हुआ था. बल्ब से जुड़े खुले तारों की संक्षारक प्रकृति के कारण बच्चे के फेफड़े के भीतर रासायनिक जलन (Chemical Burns) और ऊतकों के नष्ट होने का तत्काल गंभीर खतरा मंडरा रहा था.
मामले की संवेदनशीलता और समय की कमी को देखते हुए, AICTS के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने पारंपरिक ओपन-चेस्ट (खुली छाती) सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाने के बजाय एक उन्नत 'ब्रोंकोस्कोपी' (Bronchoscopy) तकनीक को चुना। इस विशेष प्रक्रिया में एक बेहद पतली और लचीली ट्यूब को, जिसके शीर्ष पर एक हाई-डेफिनिशन कैमरा और सूक्ष्म उपकरण लगे होते हैं, ऊपरी श्वसन मार्ग के जरिए फेफड़े तक पहुंचाया जाता है और बिना कोई बड़ा चीरा लगाए अवरोध को सीधे देख कर बाहर निकाल लिया जाता है.
पुणे में डॉक्टरों ने बचाई शिशु की जान
Specialists at Army Institute of Cardio-Thoracic Sciences (#AICTS), Pune successfully saved the life of a 9-month-old infant after removing a hazardous LED bulb with corrosive wires lodged deep inside the airway of the left lung through a highly complex bronchoscopic procedure.… pic.twitter.com/iraVg0kJmc
— Southern Command INDIAN ARMY (@IaSouthern) May 28, 2026
आर्मी सदर्न कमांड ने जारी किया आधिकारिक बयान
इस सफल और जीवन रक्षक ऑपरेशन की भारतीय सेना के क्षेत्रीय सैन्य नेतृत्व ने जमकर सराहना की है. भारतीय सेना की दक्षिणी कमान (Southern Command) ने सोशल मीडिया पर एक आधिकारिक बयान जारी कर इस चिकित्सकीय सफलता की जानकारी साझा की.
दक्षिणी कमान ने अपने बयान में कहा, "पुणे के आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो-थोरैसिक साइंसेज (#AICTS) के विशेषज्ञों ने एक अत्यंत जटिल ब्रोंकोस्कोपिक प्रक्रिया के माध्यम से बाएं फेफड़े की श्वास नली में गहराई से फंसे संक्षारक तारों वाले एक खतरनाक एलईडी बल्ब को हटाकर 9 महीने के मासूम बच्चे की जान सफलतापूर्वक बचाई है."
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, बच्चे की नन्ही श्वास नली के भीतर से इस नुकीली वस्तु को निकालना आसान नहीं था. इसके लिए अत्यधिक सटीकता की आवश्यकता थी, क्योंकि थोड़ी सी भी चूक से बल्ब के नुकीले तार श्वास नली की दीवारों (Bronchial Walls) को फाड़ सकते थे या फेफड़े को पूरी तरह से डैमेज कर सकते थे. सेना ने आगे कहा कि जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली इस आपातकालीन स्थिति को, जिसमें फेफड़े के सिकुड़ने (Airway Collapse) का खतरा शामिल था, बिना किसी जटिलता के पूरी तरह नियंत्रित कर लिया गया है और बच्चे की सांसें अब सामान्य हैं.
चिकित्सकीय परिणाम और माता-पिता के लिए सुरक्षा चेतावनी
सफल निष्कर्षण के बाद, अस्पताल प्रशासन ने चिकित्सा इमेजरी जारी की है जिसमें बच्चे के फेफड़े से निकाले गए नुकीले, लाल रंग के इलेक्ट्रॉनिक घटक (LED बल्ब) को साफ देखा जा सकता है. इसके साथ ही ऑपरेशन से पहले और बाद के छाती के एक्स-रे भी साझा किए गए हैं, जो पुष्टि करते हैं कि बच्चे के फेफड़े का कार्य और श्वास नली की संरचना अब पूरी तरह से ठीक हो चुकी है.
संस्थान के बाल रोग सर्जनों (Pediatric Surgeons) ने इस घटना के बाद माता-पिता के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा चेतावनी जारी की है. डॉक्टरों ने नोट किया कि एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं में अनजाने में छोटी वस्तुओं को सांस के जरिए अंदर खींच लेना या निगल जाना (Foreign Body Aspiration), घरेलू दुर्घटनाओं और चोटों का एक प्राथमिक कारण है. मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल के अनुसार, यदि बच्चा बैटरी, तांबे के तार या रासायनिक घटकों वाली किसी वस्तु को निगल लेता है, तो आंतरिक ऊतकों (Mucosal Tissues) को गंभीर रासायनिक क्षति से बचाने के लिए उसे तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता दी जानी चाहिए. फिलहाल, पूरी तरह स्वस्थ हो चुका यह बच्चा डॉक्टरों की नियमित निगरानी में है.










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